भारत की आर्थिक स्थिति और सुधारों की आवश्यकता

भारत की आर्थिक स्थिति और सुधारों की आवश्यकता 19 May 2026

संदर्भ:

भारत एक गंभीर आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है, जो नागरिकों से ईंधन बचाने और किसानों से रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से बचने की प्रधानमंत्री की सार्वजनिक अपीलों से प्रमाणित होता है।

वर्तमान आर्थिक चिंताएँ

  • GDP रैंकिंग में गिरावट: भारत की वैश्विक GDP रैंकिंग में कथित रूप से गिरावट आई है, जिससे देश की आर्थिक गति को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।
    • आर्थिक रैंकिंग मायने रखती है क्योंकि यह भारत की वैश्विक सौदेबाजी की क्षमता (Bargaining Power) और रणनीतिक प्रभाव को प्रभावित करती है।
    • GDP में गिरावट: वैश्विक GDP रैंकिंग में भारत छठे स्थान पर खिसक गया है।
  • पूँजी पलायन (Capital Flight): विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय बाजारों से बड़ी मात्रा में धनराशि वापस निकाल ली है।
    • पूंजी पलायन (Flight of Capital): विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने वर्ष 2026 की पहली तिमाही में ही भारत से 20 अरब डॉलर की राशि निकाल ली।
  • बढ़ता व्यापार घाटा: उच्च आयात और तुलनात्मक रूप से कमजोर निर्यात के कारण भारत का व्यापार घाटा बढ़ गया है।
    • एक प्रमुख कारण तेल आयात की बढ़ती लागत है, विशेषकर पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव के दौरान।
  • मुद्रा संकट: रुपया 96–97 प्रति अमेरिकी डॉलर के स्तर के आसपास बना हुआ है और पाकिस्तान तथा बांग्लादेश जैसी पड़ोसी मुद्राओं की तुलना में कमजोर प्रदर्शन कर रहा है।
  • शेयर बाजार का खराब प्रदर्शन: कमजोर बाजार प्रदर्शन निवेशकों की धारणा (Sentiment) को प्रभावित करता है।
    • यह धन सृजन को भी कम करता है और दीर्घकालिक निवेश को हतोत्साहित करता है।

नीतिगत गंभीर विफलताएँ

  • अप्रभावी सुधार: सरकार ने औपनिवेशिक काल के कानूनों को अपराधमुक्त करने जैसे छोटे बदलावों पर ध्यान केंद्रित किया है, जिन्हें स्रोत के अनुसार मूलभूत आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं माना जाता है।
  • राज्य-स्तरीय भ्रष्टाचार: अत्यधिक “अनापत्ति प्रमाण पत्र” (NOC) आवश्यकताओं और अनुमतियों के कारण कारखाने स्थापित करना मुश्किल बना हुआ है, जो रिश्वतखोरी के अवसर के रूप में कार्य करते हैं।
  • प्रतिस्पर्धात्मकता की कमी: PLI (उत्पादन आधारित प्रोत्साहन) योजना पर्याप्त नहीं है। वियतनाम, इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे प्रतिस्पर्धी अधिक कर प्रोत्साहन और कम अनुपालन लागत प्रदान करते हैं, जिससे चीन से बाहर निकलने वाली कंपनियाँ उन्हीं देशों की ओर आकर्षित हो रही हैं।
  • फीडबैक का अभाव: सरकार अपनी परिचालन चुनौतियों के संबंध में बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs), घरेलू फर्मों और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) से प्रतिक्रिया लेने में विफल रहती है।

राज्य-स्तरीय विनियामक बाधाएं (Regulatory Bottlenecks)

  • कई उद्योगों को राज्य स्तर पर अत्यधिक अनुमति आवश्यकताओं का सामना करना पड़ता है।
  • बहु-स्तरीय अनुमतियाँ और अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOCs) प्रक्रियाओं में देरी करते हैं और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं।
  • प्रत्येक अतिरिक्त अनुमति अधिकारियों द्वारा किराया-वसूली (Rent-Seeking) का अवसर बन सकती है।
  • व्यापार सुगमता (Ease of doing business) में न केवल केंद्रीय स्तर पर, बल्कि राज्य और जिला स्तरों पर भी सुधार होना चाहिए।

उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजना: लाभ और सीमाएं

  • उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना ने घरेलू विनिर्माण को प्रोत्साहित करके कुछ क्षेत्रों की मदद की है।
  • हालाँकि, वियतनाम, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देशों द्वारा दिए जाने वाले प्रोत्साहनों की तुलना में इसका प्रभाव सीमित है।
  • चीन से निकलने वाली कई कंपनियाँ दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को इसलिए प्राथमिकता देती हैं क्योंकि वहाँ बेहतर कर लाभ, सस्ती लॉजिस्टिक्स और निवेशकों के लिए अधिक प्रभावी सुविधा उपलब्ध होती है।

फीडबैक-आधारित शासन (Feedback-Based Governance) की आवश्यकता

सरकार को सक्रिय रूप से निम्नलिखित से प्रतिक्रिया लेनी चाहिए

  • बहुराष्ट्रीय कंपनियां: वैश्विक निवेश चुनौतियों को समझने के लिए।
  • बड़ी घरेलू फर्में: कराधान और विनियामक मुद्दों की पहचान करने के लिए।
  • एमएसएमई (MSMEs): अनुपालन बोझ और ऋण-संबंधित कठिनाइयों को समझने के लिए।
  • निर्यातक: वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार करने के लिए।

अर्थव्यवस्था और वैश्विक शक्ति

  • एक मजबूत अर्थव्यवस्था अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव की नींव होती है।
  • यदि भारत की अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, तो इसका कूटनीतिक और रणनीतिक महत्व भी कम हो जाएगा।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और अन्य प्रमुख शक्तियां जैसे देश आर्थिक रूप से मजबूत राष्ट्रों के साथ गंभीरता से जुड़ते हैं।

डेंग शियाओपिंग (Deng Xiaoping) से सबक

  • डेंग शियाओपिंग ने व्यावहारिक आर्थिक सुधार (pragmatic economic reforms) पेश करके चीन को बदल दिया।
  • उन्होंने चीन को कठोर कम्युनिस्ट आर्थिक नीतियों से दूर किया और बाजार-उन्मुख विकास को प्रोत्साहित किया।
  • भारत को भी वृद्धिशील परिवर्तनों (Incremental Changes) के बजाय साहसिक सुधारों (Bold Reforms) की आवश्यकता है।

आगे की राह

  • भारत को गहरे संरचनात्मक सुधारों (Structural Reforms) पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
  • राज्य-स्तरीय विनियामक सुधारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • भारत को वैश्विक विनिर्माण को आकर्षित करने के लिए प्रतिस्पर्धी प्रोत्साहन प्रदान करना चाहिए।
  • कराधान और अनुपालन प्रणालियों (Compliance Systems) को सरल बनाया जाना चाहिए।
  • MSMEs को आसान ऋण, कम अनुपालन बोझ और बेहतर बाजार पहुंच प्राप्त होनी चाहिए।
  • राजनीतिक नेतृत्व को मुख्य रूप से आर्थिक विकास और रोजगार सृजन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

निष्कर्ष

  • भारत एक मजबूत और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के बिना एक प्रमुख वैश्विक शक्ति नहीं बन सकता है। वर्तमान चुनौतियों के लिए छोटे सुधार अपर्याप्त हैं।
  • निवेश को आकर्षित करने, निर्यात बढ़ाने, विनिर्माण को मजबूत करने और रोजगार सृजित करने के लिए भारत को केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर साहसिक, समन्वित और फीडबैक-आधारित सुधारों की आवश्यकता है।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:

प्रश्न: भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति का विश्लेषण करते हुए प्रमुख समस्याओं की पहचान कीजिए। साथ ही, समावेशी एवं सतत आर्थिक विकास सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक समाधान एवं नीतिगत उपाय सुझाइए।

 (15 अंक, 250 शब्द)

भारत की आर्थिक स्थिति और सुधारों की आवश्यकता

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