ओस्लो शिखर सम्मेलन

ओस्लो शिखर सम्मेलन 18 May 2026

संदर्भ:

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन से पहले नॉर्डिक देशों का दौरा किया। यह शिखर सम्मेलन रूस-यूक्रेन संघर्ष और आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ते सैन्यीकरण के कारण हो रहे बड़े भू-राजनीतिक बदलावों के बीच आयोजित किया जा रहा है।

नॉर्डिक देश कौन-से हैं?

  • नॉर्डिक देशों में नॉर्वे, स्वीडन, फ़िनलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड शामिल हैं।
  • ये पाँच अत्यधिक विकसित राष्ट्र हैं, जो उत्कृष्ट मानव विकास सूचकांक, उच्च खुशहाली रैंकिंग और अत्याधुनिक नवाचार के लिए प्रसिद्ध हैं।
  • ये हरित ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी हैं तथा यहाँ जीवन स्तर बहुत ऊँचा है।

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पिछले दो शिखर सम्मेलन

  • पहला शिखर सम्मेलन (2018): स्टॉकहोम में आयोजित।
  • दूसरा शिखर सम्मेलन (2022): कोपेनहेगन, डेनमार्क में आयोजित।
    • केंद्रित उद्देश्य: इन सम्मेलनों का मुख्य उद्देश्य “सॉफ्ट” मुद्दों पर था, जैसे: जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण, हरित ऊर्जा, प्रौद्योगिकी साझाकरण और ब्लू इकोनॉमी (महासागरीय संसाधनों का सतत उपयोग)।
  • ओस्लो शिखर सम्मेलन (2026)
    • तीसरा शिखर सम्मेलन रूस–यूक्रेन युद्ध के कारण काफी बदले हुए भू-राजनीतिक वातावरण में आयोजित हो रहा है।
    • पिछले शिखर सम्मेलनों के विपरीत, अब उद्देश्य सुरक्षा, रक्षा समन्वय और महत्त्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं की सुरक्षा की ओर स्थानांतरित हो गया है।
    • विशेष कार्यों में डेनमार्क जैसे क्षेत्रों से महत्त्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना तथा आर्कटिक क्षेत्र के बढ़ते सैन्यीकरण की चुनौती का समाधान करना शामिल है।

आर्कटिक परिषद (Arctic Council)

  • आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग को सुगम बनाने के लिए वर्ष 1996 में ओटावा घोषणा के माध्यम से इसकी स्थापना की गई थी।
  • सदस्य: इसमें आठ सदस्य देश शामिल हैं: अमेरिका, रूस, कनाडा, डेनमार्क, फिनलैंड, आइसलैंड, नॉर्वे और स्वीडन।
  • भारत की भूमिका: भारत इसका सदस्य नहीं है, लेकिन वर्ष 2013 से एक पर्यवेक्षक देश के रूप में शामिल है।
  • वर्त्तमान संकट: यूक्रेन युद्ध के बाद यह परिषद तेजी से ध्रुवीकृत हो रही है (NATO बनाम रूस), क्योंकि आठ में से सात सदस्य अब नाटो का हिस्सा हैं।

आर्कटिक महासागर भारत के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है?

  • जलवायु प्रभाव: आर्कटिक क्षेत्र विश्व के अन्य भागों की तुलना में तीन गुना तेज़ी से गर्म हो रहा है। बर्फ के पिघलने से मानसून के पैटर्न प्रभावित होते हैं, जो भारत की खाद्य सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।
  •  नए व्यापार मार्ग: बर्फ के पिघलने से उत्तरी समुद्री मार्ग (NSR) का निर्माण हो रहा है, जो यूरोप पहुँचने के लिए स्वेज़ नहर मार्ग की तुलना में काफ़ी छोटा है। भारत इसे चेन्नई-व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे से जोड़ना चाहता है।
  • तटीय सुरक्षा: बर्फ के पिघलने से समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, जिससे मुंबई जैसे भारतीय तटीय शहरों को खतरा है।
  • मौजूदा अनुसंधान: भारत पहले से ही हिमाद्री (स्वालबार्ड, नॉर्वे), IndARC (जल के नीचे की वेधशाला), और ग्रुवेबाडेट (Gruvebadet) वायुमंडलीय प्रयोगशाला जैसे अनुसंधान केंद्र संचालित कर रहा है।

भारत को नॉर्डिक देशों से होने वाले लाभ

  • नॉर्वे: गहरे समुद्र में खनन (डीप-सी माइनिंग) के लिए विशेषज्ञता और तकनीक प्रदान करता है।
  • डेनमार्क: ग्रीनलैंड के साथ अपने संबंधों के ज़रिए महत्त्वपूर्ण खनिजों तक पहुँच प्रदान करता है।
  • स्वीडन और फिनलैंड: 5G, 6G, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर्स और अवसंरचना जैसी अगली पीढ़ी की तकनीकों में अग्रणी हैं।
  • आइसलैंड: भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) में विशेषज्ञता रखता है, जो हिमालय जैसे दुर्गम क्षेत्रों में बिजली उत्पादन में भारत की मदद कर सकता है।

भारत क्या प्रदान कर सकता है?

  • विशाल बाजार: भारत अपनी बड़ी जनसंख्या के कारण नॉर्डिक उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार उपलब्ध कराता है।
  • मानव संसाधन: भारत के पास उत्कृष्ट इंजीनियरिंग प्रतिभा का विशाल भंडार है।
  • रणनीतिक साझेदार: भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक विश्वसनीय साझेदार है, जो रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखता है और चीन जैसी बड़ी शक्तियों के दबाव में आसानी से नहीं आता।

आगे की राह

  • आइस-ब्रेकर जहाज़: भारत को 2030-31 तक कम-से-कम पाँच आइस-ब्रेकर जहाज़ों की आवश्यकता होगी, ताकि आर्कटिक क्षेत्र में प्रभावी अन्वेषण और नौवहन किया जा सके।
  • आर्थिक मंच: जहाज़ निर्माण, मानव संसाधन और अवसंरचना के संबंध में आर्कटिक देशों के साथ सीधे सहयोग के लिए भारत-आर्कटिक आर्थिक मंच की स्थापना करना।
  • डेटा कॉरिडोर: मानसून पर प्रभावों के संयुक्त अनुसंधान के लिए आर्कटिक–हिमालय जलवायु डेटा कॉरिडोर का निर्माण करना।
  • राजनयिक प्रतिनिधित्व: भारत को चीन और जापान की तरह आर्कटिक परिषद हेतु एक विशेष दूत (Special Envoy) नियुक्त करना चाहिए।
  •  सह-विकास (Co-development): भारत को केवल तकनीक खरीदने के बजाय नॉर्डिक देशों के साथ मिलकर तकनीक विकसित करनी चाहिए, ताकि रणनीतिक स्वायत्तता सुनिश्चित हो सके।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न: 

प्रश्न: आर्कटिक क्षेत्र वैज्ञानिक सहयोग के मंच से बदलकर भू-राजनीतिक एवं रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में परिवर्तित हो रहा है। इस संदर्भ में भारत-नॉर्डिक शिखर सम्मेलन (ओस्लो) के महत्त्व का विश्लेषण कीजिए तथा आर्कटिक क्षेत्र में भारत के दीर्घकालिक हितों की सुरक्षा हेतु आवश्यक उपाय सुझाइए।

(15 अंक, 250 शब्द)

ओस्लो शिखर सम्मेलन

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