संदर्भ:
विशेषज्ञों द्वारा भारत को पाकिस्तान के साथ संवाद करने की बार-बार सलाह दिए जाने के बावजूद, इतिहास यह दर्शाता है कि भारत की शांति पहलों का अक्सर जवाब राज्य-प्रायोजित आतंकवाद के रूप में मिला है।
प्रमुख शब्दावलियाँ
- जिहादी तंजीम: आतंकवादी संगठन जिन्हें पाकिस्तान रणनीतिक साधन के रूप में उपयोग करता है।
- कम्पोज़िट डायलॉग: ऐसा ढाँचा जिसमें आतंकवाद, जल विवाद, कश्मीर आदि सभी द्विपक्षीय मुद्दों पर एक साथ चर्चा की जाती है।
- मोडस विवेंडी (Modus Vivendi): ऐसा व्यावहारिक समाधान जिसमें मतभेद बने रहने के बावजूद दोनों देश शांतिपूर्वक सह-अस्तित्व स्वीकार करें।
- इर्रेडेंटिज़्म (Irredentism): ऐसी विचारधारा जिसमें कोई देश पड़ोसी देश के किसी क्षेत्र पर दावा करता है, जैसे पाकिस्तान का कश्मीर के प्रति आग्रह।
कम्पोज़िट डायलॉग के अंतर्गत मुद्दे
मुद्दों को व्यापक रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया था
- सहयोग संबंधी मुद्दे: व्यापार, संस्कृति, जन-से-जन संपर्क और आर्थिक सहयोग।
- मानवीय मुद्दे: कैदी, मछुआरे, विभाजित परिवार और सीमा-पार आवागमन।
- संघर्ष संबंधी मुद्दे: कश्मीर, आतंकवाद, सुरक्षा चिंताएँ और सैन्य तनाव।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
- अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका और पाकिस्तान ने सोवियत संघ के विरुद्ध लड़ने के लिए मुजाहिदीन समूहों का समर्थन किया।
- सोवियत वापसी के बाद, इन उग्रवादी नेटवर्कों में से कई आगे चलकर तालिबान जैसे कट्टरपंथी संगठनों में परिवर्तित हो गए।
- पाकिस्तान ने महसूस किया कि ऐसे समूहों का उपयोग जम्मू-कश्मीर में भी किया जा सकता है।
- परिणामस्वरूप, पाकिस्तान ने कश्मीर में आतंकवाद और उग्रवाद को समर्थन देना शुरू कर दिया।
असफल शांति प्रयासों की समयरेखा
- 1997-1999: संवाद प्रक्रिया को तीन श्रेणियों में व्यवस्थित करने के प्रयास शुरू हुए — सहयोग (व्यापार/संस्कृति), मानवीय मुद्दे (मछुआरे) और संघर्ष संबंधी मुद्दे (कश्मीर/आतंकवाद)।
- वाजपेयी काल: वर्ष 1999 की लाहौर बस यात्रा के तुरंत बाद कारगिल युद्ध हुआ। वर्ष 2001 का आगरा शिखर सम्मेलन इसलिए विफल हो गया क्योंकि पाकिस्तान का नेतृत्व कश्मीर मुद्दे से आगे बढ़ने को तैयार नहीं था। इसके उपरांत दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हमला हुआ।
- मनमोहन सिंह का काल: “मोडस विवेंडी” तक पहुँचने के लिए बैक-चैनल वार्ताओं का प्रयास किया गया। हालाँकि, संयुक्त आतंकवाद कार्रवाई बल की बैठक के केवल दस दिन बाद वर्ष 2008 के मुंबई आतंकी हमले हुए।
- मोदी काल: वर्ष 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नवाज़ शरीफ को अपने शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया।
- वर्ष 2015 में दोनों नेताओं की रूस के उफ़ा शहर में मुलाकात हुई और एक संयुक्त वक्तव्य पर सहमति बनी।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2015 में लाहौर का दौरा भी किया, जो एक महत्वपूर्ण सद्भावना संकेत माना गया।
- हालाँकि, वर्ष 2016 में पठानकोट हमला और उसी वर्ष उरी हमला होने से दोनों देशों के संबंधों में तीव्र गिरावट आई।
- उरी हमले के बाद भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक की।
- बाद में, वर्ष 2019 के पुलवामा हमले के बाद भारत ने एयर स्ट्राइक भी की।
पाकिस्तान शांति से क्यों बचता है? (तीन मुख्य कारण)
- पहचान का संकट: यदि कश्मीर भारत में शांतिपूर्ण और समृद्ध रहता है, तो पाकिस्तान का “दो-राष्ट्र सिद्धांत” कमजोर पड़ जाता है।
- गहरी इर्रेडेंटिस्ट (Irredentism) मानसिकता: कश्मीर को लेकर पाकिस्तान की मानसिकता इतनी प्रबल है कि वह अपनी अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुँचाने को तैयार रहता है।
- पाकिस्तानी सेना की भूमिका: सेना एक आर्थिक-राजनीतिक शक्ति के रूप में कार्य करता है। भारत से शांति होने पर उसका बजट और प्रभाव कम हो सकता है।
भारत की वर्तमान नीति
- भारत अब बिना किसी शर्त के बातचीत करने की नीति से धीरे-धीरे दूर हट रहा है।
- भारत अब इस बात पर बल देता है कि बातचीत और आतंकवाद, दोनों एक साथ नहीं चल सकते।
- संधियों का निलंबन: दबाव बनाने के लिए भारत ने सिंधु जल संधि के तहत होने वाली बातचीत को भी निलंबित कर दिया है।
- सीमित जुड़ाव: विशेषज्ञों का सुझाव है कि भारत को अब पाकिस्तान के साथ केवल मानवीय मुद्दों पर ही बातचीत करनी चाहिए—जैसे कि कैदियों या मछुआरों की अदला-बदली—क्योंकि व्यापक राजनीतिक मुद्दों का समाधान फिलहाल संभव नहीं है।
- सक्रिय जवाबी कार्रवाई: सर्जिकल स्ट्राइक और हवाई हमलों का इस्तेमाल करके भारत यह संदेश देता है कि अब वह पाकिस्तानी सरकार और उसके द्वारा समर्थित आतंकवादियों के बीच कोई फ़र्क नहीं करता।
वर्ष 1998 का डरबन शिखर सम्मेलन
- 1998: परमाणु युग
- सितंबर 1998 तक, भारत और पाकिस्तान दोनों ने परमाणु परीक्षण कर लिए थे।
- इन परमाणु परीक्षणों से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया।
- प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने डरबन में NAM शिखर सम्मेलन में भाग लिया।
- अंतिम रूपरेखा: वाजपेयी ने भारतीय वार्ताकारों को पाकिस्तान के साथ बातचीत की प्रक्रिया को अंतिम रूप देने का निर्देश दिया।
- एक होटल के कमरे में आमने-सामने बातचीत का एक लंबा सत्र हुआ।
- यह सत्र पाकिस्तान के राजनयिक तारिक अल्ताफ़ के साथ हुआ।
- इस बैठक से बातचीत की प्रक्रिया के लिए अंतिम रूपरेखा तैयार करने में मदद मिली।
- समग्र वार्ता की घोषणा
- बाद में, नवाज़ शरीफ़ और अटल बिहारी वाजपेयी न्यूयॉर्क में मिले।
- इस बैठक के बाद, समग्र वार्ता (CD) की आधिकारिक घोषणा की गई।
निष्कर्ष
- भारत ने पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के लिए कई प्रयास किए हैं, लेकिन प्रत्येक प्रमुख शांति पहल के बाद आतंकवाद या सैन्य शत्रुता देखने को मिली है।
- मुख्य बाधा संवाद की कमी नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की भारत-विरोधी शत्रुता, आतंकवाद और कश्मीर मुद्दे पर संरचनात्मक निर्भरता है।
- इसलिए, भारत की नीति में सख्त प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) के साथ सीमित मानवीय संवाद का संयोजन होना चाहिए।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: पिछले दशक में पाकिस्तान के प्रति भारत का दृष्टिकोण ‘स्ट्रैटेजिक रिस्ट्रेंट’ से ‘काइनेटिक डिटरेंस’ की ओर परिवर्तित हुआ है। इस परिवर्तन के कारणों का विश्लेषण कीजिए तथा क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करने में इसकी प्रभावशीलता का मूल्यांकन कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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