भारत का रक्षा क्षेत्र: वास्तविक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता

भारत का रक्षा क्षेत्र: वास्तविक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता 18 May 2026

संदर्भ:

प्रयागराज में आयोजित ‘नॉर्थ टेक संगोष्ठी’ के दौरान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान स्वदेशी रक्षा प्रणालियों की सफल तैनाती पर प्रकाश डाला।

  • हालाँकि, आत्मनिर्भर भारत पहल के अंतर्गत प्रगति के बावजूद भारत अब भी विदेशी रक्षा आयातों पर काफी हद तक निर्भर बना हुआ है।

भारत की रक्षा आयात पर निर्भरता

  • भारत आज भी विश्व के सबसे बड़े रक्षा उपकरण आयातकों में से एक है।
  • देश अभी भी कई महत्त्वपूर्ण रक्षा तकनीकों के लिए विदेशी देशों पर निर्भर है, जिनमें शामिल हैं:
    • जेट इंजन
    • उन्नत सेमीकंडक्टर
    • मिसाइल गाइडेंस सिस्टम
    • पनडुब्बी प्रणोदन प्रणाली

हालाँकि अब कुछ असेंबली और विनिर्माण कार्य देश के भीतर होने लगे हैं, फिर भी भारत कोर रक्षा तकनीकों में पूर्ण तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल नहीं कर पाया है।

स्वदेशी रक्षा विकास में विद्यमान चुनौतियाँ

  • तकनीकी बाधाएँ: भारत की कई स्वदेशी रक्षा परियोजनाएँ अभी भी गंभीर तकनीकी और परिचालन चुनौतियों का सामना कर रही हैं, जिनमें शामिल हैं:
    • धीमी विकास एवं परीक्षण प्रक्रिया के कारण परियोजनाओं में देरी
    • बार-बार संशोधन और लंबी समयसीमा के कारण लागत में वृद्धि
    • जेट इंजन, प्रणोदन प्रणाली और उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सीमाएँ
    • उदाहरण: द कावेरी इंजन प्रोजेक्ट दशकों के निवेश, अनुसंधान और विकास प्रयासों के बावजूद परिचालन सफलता हासिल करने में विफल रहा।
      • इस परियोजना ने उन्नत एयरो-इंजन तकनीक में भारत की सीमाओं को उजागर किया।
  • रक्षा अनुसंधान एवं विकास (R&D) में कम निवेश: भारत रक्षा अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर तुलनात्मक रूप से कम खर्च करता है, जबकि अमेरिका और चीन जैसी प्रमुख शक्तियाँ इस क्षेत्र में अधिक निवेश करती हैं।
    • प्रभाव: सीमित दीर्घकालिक निवेश निम्न क्षेत्रों को कमजोर करता है:
      • नवाचार क्षमता
      • स्वदेशी तकनीकी विकास
      • महत्त्वपूर्ण रक्षा तकनीकों में आत्मनिर्भरता
  • इंजीनियरिंग प्रतिभा का पलायन (ब्रेन ड्रेन): भारत को रक्षा अनुसंधान क्षेत्र में शीर्ष इंजीनियरिंग प्रतिभा को बनाए रखने में एक गंभीर चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IITs) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के स्नातक अक्सर रणनीतिक संस्थानों जैसे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन में शामिल होने के बजाय निजी क्षेत्र में रोजगार या विदेशों में करियर के अवसरों को प्राथमिकता देते हैं। यह प्रवृत्ति मुख्यतः निम्न कारणों से प्रेरित है:
    • निजी क्षेत्र में अधिक वेतन
    • बेहतर अनुसंधान अवसंरचना
    • अधिक नवाचार के अवसर
    • विदेशों में तेज़ करियर विकास
  • नौकरशाही देरी और लालफीताशाही: भारत की रक्षा खरीद प्रणाली अक्सर अत्यधिक केंद्रीकरण, फाइलों की धीमी गति, बार-बार होने वाली प्रक्रियात्मक देरी और भ्रष्टाचार के आरोपों से प्रभावित रहती है, जिससे प्रभावी निर्णय-निर्माण में गंभीर बाधा उत्पन्न होती है।
    • परिणाम:
      • खरीद प्रक्रिया में अत्यधिक विलंब
      • सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण में देरी
      • धीमी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण रक्षा तैयारी प्रभावित
  • अवास्तविक खरीद आवश्यकताएँ: सशस्त्र बल कभी-कभी अत्यधिक महत्वाकांक्षी गुणात्मक आवश्यकताएँ (QRs) निर्धारित करते हैं। कई विनिर्देश मौजूदा बाजार क्षमताओं या घरेलू तकनीकी क्षमता से मेल नहीं खाते।
  • प्रभाव:
    • खरीद प्रक्रिया लंबी और जटिल हो जाती है
    • बार-बार संशोधन से:
      • लागत बढ़ती है
      • देरी होती है
      • अनिश्चितता बढ़ती है
    • स्वदेशी निर्माताओं के लिए अपेक्षाएँ पूरी करना कठिन हो जाता है।

चीन से सीख

  • चीन की रक्षा रणनीति: चीन ने 1960 के दशक से रक्षा क्षेत्र में स्वदेशीकरण को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाया, जिसके लिए उसने निम्नलिखित कदम उठाए:
    • R&D में भारी निवेश
    • घरेलू विनिर्माण तंत्र का निर्माण
    • तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहन
    • दीर्घकालिक औद्योगिक क्षमता का विकास
  • परिणाम: आज चीन उन्नत रक्षा तकनीकों का प्रमुख निर्यातक बन चुका है।

युद्ध की बदलती प्रकृति

  • हाल के संघर्ष, विशेषकर रूस-यूक्रेन युद्ध, ने दिखाया है कि कम लागत वाले ड्रोन महंगे सैन्य प्लेटफॉर्म और उन्नत रक्षा प्रणालियों को प्रभावी रूप से निष्क्रिय कर सकते हैं।
  • इस संघर्ष ने यह स्पष्ट किया है कि आधुनिक युद्ध अब तेजी से निम्नलिखित पर निर्भर होता जा रहा है:
    • स्वॉर्म ड्रोन
    • स्वायत्त प्रणालियाँ
    • इलेक्ट्रॉनिक युद्ध
    • साइबर युद्ध
  • यह समकालीन सैन्य रणनीति में तकनीक-आधारित, लागत-प्रभावी और असममित युद्ध क्षमताओं के बढ़ते महत्त्व को दर्शाता है।

सरकारी पहलें

  • रणनीतिक साझेदारी (SP) मॉडल: रणनीतिक साझेदारी (SP) मॉडल भारतीय निजी क्षेत्र की कंपनियों को विदेशी रक्षा निर्माताओं के साथ मिलकर पनडुब्बियों, लड़ाकू विमानों और अन्य उन्नत सैन्य प्रणालियों जैसे महत्त्वपूर्ण रक्षा प्लेटफार्मों के उत्पादन में सहयोग करने में सक्षम बनाता है।
    • इस मॉडल का मुख्य उद्देश्य आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण के तहत प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, स्वदेशी विनिर्माण, क्षमता निर्माण और रक्षा क्षेत्र में दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है।
  • रक्षा क्षेत्र में FDI उदारीकरण: भारत ने रक्षा विनिर्माण में विदेशी कंपनियों की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित करने के लिए स्वचालित मार्ग (Automatic Route) के माध्यम से 74% तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की अनुमति दी है।
    • इस नीति का उद्देश्य विदेशी निवेश, उन्नत तकनीक, आधुनिक विनिर्माण प्रक्रियाओं और वैश्विक विशेषज्ञता को आकर्षित करना है, जिससे भारत की स्वदेशी रक्षा उत्पादन क्षमताएँ मजबूत हों और इस क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिले।
  • निजी क्षेत्र के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ: निजी रक्षा निर्माता कई प्रकार की बाधाओं का सामना करते हैं, जिनमें शामिल हैं:
    • भुगतान में देरी
    • अत्यधिक दस्तावेज़ीकरण की आवश्यकताएँ
    • समान अवसरों की कमी
    • रक्षा सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (DPSUs) को प्राथमिकता देना

आगे की राह

  • हाइब्रिड मॉडल: भारत को अमेरिका (पेंटागन) जैसे मॉडल पर विचार करना चाहिए, जहाँ सरकार रणनीतिक प्राथमिकताएँ निर्धारित करती है और वित्तपोषण प्रदान करती है, जबकि निजी कंपनियाँ नवाचार और विनिर्माण का कार्य संभालती हैं।
  • रणनीतिक खरीदार की भूमिका: सरकार को निर्माता की बजाय “रणनीतिक खरीदार” की भूमिका निभानी चाहिए, ताकि PSU और निजी कंपनियों के बीच निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित हो सके।
  • रक्षा R&D व्यय में वृद्धि: भारत को रक्षा अनुसंधान एवं विकास (R&D) में दीर्घकालिक निवेश को उल्लेखनीय रूप से बढ़ाने की आवश्यकता है, ताकि स्वदेशी नवाचार, उन्नत प्रौद्योगिकी विकास और रणनीतिक क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता को मजबूत किया जा सके।
    • अधिक R&D व्यय महत्त्वपूर्ण रक्षा तकनीकों के विकास को तेज करेगा और विदेशी आयात पर निर्भरता को कम करेगा।
  • शीर्ष इंजीनियरिंग प्रतिभा को बनाए रखना: भारत को बेहतर वेतन, अनुसंधान प्रोत्साहन और नवाचार-आधारित पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना चाहिए, ताकि रक्षा तकनीक और उन्नत विनिर्माण जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में अत्यधिक कुशल इंजीनियरों को आकर्षित और बनाए रखा जा सके।
    • स्वदेशी रक्षा अनुसंधान में करियर के अवसरों को मजबूत करने से प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन) को कम करने में मदद मिलेगी और राष्ट्रीय तकनीकी क्षमताएँ बढ़ेंगी।
  • सरकार की भूमिका में परिवर्तन: सरकार को रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष निर्माता के बजाय मुख्य रूप से एक रणनीतिक खरीदार और नीति-निर्माता के रूप में कार्य करना चाहिए।
    • इस दृष्टिकोण से निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी, प्रतिस्पर्धा, दक्षता और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा, जबकि सरकार को विनियमन, खरीद प्रक्रिया और दीर्घकालिक रणनीतिक योजना पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा।

निष्कर्ष

  • भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक स्वायत्तता वास्तविक रक्षा आत्मनिर्भरता प्राप्त करने पर निर्भर करती है। एक प्रमुख रक्षा शक्ति के रूप में उभरने के लिए भारत को स्वदेशी R&D को मजबूत करना होगा, आयात निर्भरता कम करनी होगी, निजी क्षेत्र के नवाचार को प्रोत्साहित करना होगा तथा वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना होगा।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न: 

प्रश्न: वैश्विक संघर्षों की बदलती प्रकृति, विशेषकर मानव रहित हवाई वाहनों (UAVs) के व्यापक उपयोग, ने भारत के रक्षा विनिर्माण तंत्र में व्यापक सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया है। भारत की रक्षा खरीद प्रणाली में विद्यमान बाधाओं का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए तथा बताइए कि किस प्रकार एक “हाइब्रिड इकोसिस्टम” रणनीतिक तैयारी सुनिश्चित कर सकता है।

 (15 अंक, 250 शब्द)

भारत का रक्षा क्षेत्र: वास्तविक आत्मनिर्भरता की आवश्यकता

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