संदर्भ:
भारत का लक्ष्य उच्च और सतत आर्थिक विकास प्राप्त करके एक विकसित भारत का निर्माण करना है। हालाँकि, केवल GDP वृद्धि को बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है।
- उद्देश्य केवल “विकास” से हटकर “उत्पादकता” में सुधार पर केंद्रित होना चाहिए, क्योंकि दीर्घकालिक आर्थिक प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि श्रम, पूँजी, प्रौद्योगिकी और संस्थानों जैसे संसाधनों का कितनी कुशलता से उपयोग किया जाता है।
- भारत ने 2024–25 में लगभग 6.5% की वास्तविक GDP वृद्धि दर दर्ज की, जिससे यह विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बन गया। यह वृद्धि निम्नलिखित कारकों द्वारा समर्थित थी:
- मजबूत घरेलू मांग
- नियंत्रित मुद्रास्फीति
- राजकोषीय संतुलन (Fiscal Consolidation)
- स्थिर वित्तीय क्षेत्र और घटते NPA
इसके बावजूद, कम उत्पादकता, कमजोर विनिर्माण और अपर्याप्त रोजगार सृजन को लेकर चिंताएँ विद्यमान हैं।
उत्पादकता वृद्धि से ज़्यादा महत्वपूर्ण क्यों है?
- उत्पादकता में सुधार के बिना आर्थिक विकास स्थायी नहीं है।
- उदाहरण के लिए, यदि कोई छात्र अध्ययन के समय को 3 घंटे से बढ़ाकर 6 घंटे कर देता है, लेकिन प्रभावी सीख केवल 1 उत्पादक घंटे तक ही सीमित रहती है, तो प्रयास में हुई वृद्धि बेहतर परिणामों में परिवर्तित नहीं होती।
- इसी प्रकार, कोई अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ सकती है, लेकिन यदि उसकी कार्यकुशलता और उत्पादकता कम बनी रहती है, तो दीर्घकालिक विकास कठिन हो जाता है।
उच्च उत्पादकता के परिणामस्वरूप निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- बेहतर वेतन
- प्रतिस्पर्धी उद्योग
- नवाचार और अनुसंधान एवं विकास (R&D)
- सतत दीर्घकालिक विकास
- अधिक रोजगार सृजन
इसलिए विकसित राष्ट्र बनने के लिए उत्पादकता वृद्धि अत्यंत आवश्यक है।
संरचनात्मक परिवर्तन में “मिसिंग ब्रिज (Missing Bridge)”
कालडोर सिद्धांत(Kaldor Principle) के अनुसार, किसी देश की प्रगति काफी हद तक उसके विनिर्माण क्षेत्र पर निर्भर करती है। अधिकांश सफल अर्थव्यवस्थाओं (यूके, अमेरिका, चीन, दक्षिण कोरिया) ने कृषि से विनिर्माण और अंततः सेवा क्षेत्र की ओर जाने का मार्ग अपनाया है।
- भारत का असंतुलित मार्ग: भारत ने प्रभावी रूप से विनिर्माण के “पुल” को छोड़कर सीधे कृषि से सेवा क्षेत्र में प्रवेश कर लिया।
- परिणाम: यद्यपि सेवा क्षेत्र महत्वपूर्ण संपत्ति और GDP का सृजन करता है, इसमें उच्च कौशल की आवश्यकता होती है और कृषि से बाहर निकल रहे लाखों लोगों के लिए “बड़े पैमाने पर रोजगार” सृजित नहीं कर सकता। इससे ग्रामीण भारत और किसान पीछे रह जाते हैं क्योंकि श्रम-प्रधान विनिर्माण क्षेत्र कमजोर बना रहता है।
मध्यम आकार की फर्मों का संकट
भारत की औद्योगिक संरचना बीच से “खोखली” है। ताइवान और दक्षिण कोरिया जैसे पूर्वी एशियाई देशों के विपरीत, जहाँ वैश्विक स्तर पर निर्यात करने वाली मध्यम आकार की कंपनियों की संख्या अधिक होती है, भारत में मुख्यतः या तो बहुत छोटी (सूक्ष्म) इकाइयाँ हैं या बहुत बड़ी कॉरपोरेट कंपनियाँ है।
- “छोटा बने रहने” का जाल: भारत में छोटी कंपनियाँ बड़ी होने से डरती हैं क्योंकि उन्हें बड़े उद्यमों पर लागू श्रम कानूनों और अनुपालन बोझ का सामना करना पड़ता है।
- नवाचार करने में विफलता: ये छोटे उद्यम अक्सर “छोटे ही समाप्त” हो जाते हैं क्योंकि उनके पास अनुसंधान एवं विकास (R&D) और आधुनिक तकनीक में निवेश करने के लिए आवश्यक पैमाने का अभाव होता है, जिससे कम उत्पादकता बनी रहती है।
“ज़ॉम्बी कंपनियों(Zombie Firm)” का खतरा
उत्पादकता के मार्ग में एक प्रमुख बाधा “ज़ॉम्बी फर्मों” का अस्तित्व है—ऐसी अक्षम, अनुत्पादक और रचनात्मकता से रहित कंपनियाँ जो सामान्यतः समाप्त हो जानी चाहिए थीं, लेकिन उन्हें कृत्रिम रूप से जीवित रखा जाता है।
- रचनात्मक विनाश (Creative Destruction): एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था में “रचनात्मक विनाश” की अवधारणा यह दर्शाती है कि अनुत्पादक फर्मों को समाप्त हो जाना चाहिए, ताकि उनके संसाधन (श्रम और पूँजी) नवीन और नवाचारी नई फर्मों की ओर स्थानांतरित हो सकें।
- बैंक की विफलताएँ: भारत में बैंक अक्सर इन असफल “ज़ॉम्बी” फर्मों को ऋण देना जारी रखते हैं ताकि उनकी अपनी बैलेंस शीट “स्वच्छ” दिखाई दे और ऋणों को गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPAs) के रूप में दर्ज करने से बचा जा सके।
- आर्थिक लागत: ये ज़ॉम्बी फर्में उन संसाधनों (ऋण और श्रम) का उपभोग करती हैं, जो वास्तव में नए युग के स्टार्टअप्स और अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर केंद्रित कंपनियों को मिलना चाहिए, जिससे देश की समग्र उत्पादकता में गिरावट आती है।
मुख्य रणनीति: चार प्राथमिक हस्तक्षेप
- वैश्विक एकीकरण: भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में गहराई से जुड़ना होगा। केवल असेंबली (जैसे वर्तमान iPhone उत्पादन) तक सीमित रहने के बजाय, भारत को वैश्विक विनिर्माण का प्रमुख केंद्र बनना होगा।
- निकास में सुगमता: अनुत्पादक “ज़ॉम्बी” फर्मों को बाजार से शीघ्र बाहर निकलने की अनुमति देने के लिए दिवाला एवं दिवालियापन संहिता (IBC) को मजबूत करना चाहिए, ताकि उनके संसाधनों का पुनः उपयोग किया जा सके।
- श्रम और भूमि सुधार: भूमि को अधिक सुलभ बनाने तथा बढ़ती कंपनियों के लिए श्रम कानूनों को कम दंडात्मक बनाने हेतु सुधार लागू करने चाहिए, जिससे छोटे उद्यम मध्यम और बड़े स्तर तक विकसित होने के लिए प्रोत्साहित हों।
- ऋण पुनर्विनियोजन: यह सुनिश्चित करना चाहिए कि बैंकिंग प्रणाली “ज़ॉम्बी” कंपनियों पर पूँजी बर्बाद करने के बजाय नई, उत्पादक और नवाचारी फर्मों को ऋण देने को प्राथमिकता दे।
निष्कर्ष
भारत की वर्त्तमान आर्थिक सफलता एक मजबूत आधार प्रदान करती है, लेकिन यह भविष्य की समृद्धि की गारंटी नहीं है। “विकसित भारत” की ओर संक्रमण के लिए केवल उच्च GDP आंकड़े पर्याप्त नहीं हैं; इसके लिए अर्थव्यवस्था के संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता है। विनिर्माण के “मिसिंग ब्रिज” का निर्माण करके, अनुत्पादक “ज़ॉम्बी” फर्मों को समाप्त करके, और ऐसा वातावरण विकसित करके जहाँ छोटे उद्यम बिना डर के विस्तार कर सकें, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि उसकी वृद्धि न केवल तेज़ हो, बल्कि उत्पादक और समावेशी भी हो तथा पूरी आबादी के लिए लाभकारी सिद्ध हो।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: वर्ष 2047 तक विकसित भारत की दिशा में भारत की यात्रा केवल GDP वृद्धि बनाए रखने पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके विनिर्माण क्षेत्र में मौजूद संरचनात्मक सुस्ती को दूर करने पर भी आधारित है। ‘ज़ॉम्बी फर्मों’ तथा संसाधनों के पुनः आवंटन (Reallocation of Resources) में आई रुकावट की समस्या के विशेष संदर्भ में विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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