संदर्भ:
वर्तमान भू-राजनीतिक स्थिति, विशेष रूप से ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संघर्ष ने पश्चिम एशिया से प्राकृतिक गैस आयात करने की भारत की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि प्राकृतिक गैस यूरिया निर्माण में प्रयुक्त होने वाला एक प्राथमिक घटक है।
भारत की उर्वरक निर्भरता
- यूरिया: भारत अपनी यूरिया आवश्यकता का लगभग 80% घरेलू स्तर पर उत्पादित करता है।
- लगभग 20% आयात किया जाता है।
- यूरिया उत्पादन के लिए प्राकृतिक गैस की आवश्यकता होती है, जिसका एक बड़ा हिस्सा आयात किया जाता है।
- फॉस्फेटिक उर्वरक: भारत डीएपी (DAP) जैसे फॉस्फेटिक उर्वरकों के लिए आयात पर अत्यधिक निर्भर है।
- भारत में रॉक फॉस्फेट (Rock Phosphate) के पर्याप्त भंडार का अभाव है।
- मोरक्को और जॉर्डन जैसे देश इसके महत्वपूर्ण आपूर्तिकर्ता हैं।
भू-राजनीतिक तनावों का प्रभाव
- पश्चिम एशिया में युद्ध या अस्थिरता तेल, गैस और उर्वरक आपूर्ति को बाधित कर सकती है।
- यदि भारत प्राकृतिक गैस या फॉस्फेटिक उर्वरकों का सुचारू रूप से आयात नहीं कर पाता है, तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
- उर्वरकों की कमी का सीधा प्रभाव किसानों की उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा पर पड़ सकता है।
उर्वरक सब्सिडी की समस्या
- भारत उर्वरक सब्सिडी पर बहुत बड़ी राशि खर्च करता है।
- हालाँकि, उर्वरकों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वास्तव में फसलों को लाभ नहीं पहुँचाता है।
- उर्वरक अक्सर निम्नलिखित कारणों से नष्ट हो जाते हैं:
- भूजल में निक्षालन (Leaching into groundwater)।
- जल निकायों में अपवाह (Runoff into water bodies)।
- वायुमंडल में वाष्पीकरण या वाष्पीभवन (Evaporation or volatilisation)।
- यह दक्षता को कम करता है और पर्यावरणीय क्षति का कारण बनता है।
उर्वरक जाल (Fertiliser Trap)
- ‘उर्वरक जाल’ उस चक्र को संदर्भित करता है जहाँ अत्यधिक उर्वरक उपयोग मृदा के कार्बनिक पदार्थ (Soil Organic Matter) को कम कर देता है।
- मृदा का कार्बनिक पदार्थ एक स्पंज की तरह कार्य करता है जो जल और पोषक तत्वों को धारण करता है।
- जब रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग किया जाता है, तो कार्बनिक पदार्थ में गिरावट आती है।
यह जाल कैसे कार्य करता है?
- अत्यधिक उर्वरक का उपयोग मृदा के कार्बनिक पदार्थ को नष्ट करता है।
- खराब कार्बनिक पदार्थ पोषक तत्वों के अवशोषण (Nutrient Absorption) को कम करता है।
- तब किसानों को लगता है कि फसलों को अधिक उर्वरक की आवश्यकता है।
- वे और भी अधिक उर्वरक का प्रयोग करते हैं।
- इससे मृदा को और अधिक नुकसान होता है।
- यह चक्र जारी रहता है और किसान उच्च इनपुट लागत और निम्न मृदा स्वास्थ्य के जाल में फंस जाते हैं।
मौजूदा नीतियों के साथ समस्याएं
- पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (Nutrient Based Subsidy):
- पोषक तत्व आधारित सब्सिडी एक उपयोगी विचार था।
- हालाँकि, यूरिया को इसके ढाँचे से बाहर रखा गया।
- नतीजतन, यूरिया कृत्रिम रूप से सस्ता बना रहा।
- किसानों ने यूरिया का अत्यधिक उपयोग किया, जिससे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम के आदर्श पोषक तत्व संतुलन में गड़बड़ी हुई।
- नीम लेपित यूरिया (Neem-Coated Urea):
- नीम-लेपित यूरिया (Neem-coated urea) को दुरुपयोग कम करने और पोषक तत्वों के धीमे उत्सर्जन के लिए निर्मित किया गया था।
- इसने कुछ हद तक मदद की।
- हालाँकि, यह अमोनिया के वाष्पीकरण के माध्यम से नाइट्रोजन की हानि को पूरी तरह रोक नहीं सका।
- फॉस्फेटिक उर्वरक की हानि:
- फॉस्फेटिक उर्वरक अक्सर अपवाह (Runoff) के माध्यम से जल निकायों में प्रवेश कर जाते हैं।
- यह सुपोषण (Eutrophication) और शैवाल प्रस्फुटन (Algal Bloom) का कारण बन सकता है।
- इस प्रकार का प्रदूषण जलीय पारिस्थितिक तंत्र और जल की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।
उर्वरक असंतुलन में MSP की भूमिका
- सरकार कई फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की घोषणा करती है, लेकिन प्रभावी खरीद मुख्य रूप से चावल, गेहूं और गन्ने के लिए होती है।
- यह किसानों को इन फसलों को बार-बार उगाने के लिए प्रोत्साहित करता है।
- यह फसल विविधीकरण (Crop Diversification) को हतोत्साहित करता है।
- दलहन पर्याप्त रूप से नहीं उगाई जाती हैं क्योंकि किसानों को कमजोर खरीद का डर रहता है।
- इससे नाइट्रोजन उर्वरकों पर निर्भरता बढ़ती है।
दलहन का महत्व
- दलहन की जड़ों की ग्रंथियों (Root Nodules) में राइजोबियम (Rhizobium) बैक्टीरिया पाए जाते हैं।
- राइजोबियम वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मृदा में स्थिर करता है।
- यदि अनाज के साथ फसल चक्र (Crop Rotation) में दलहन उगाई जाती है, तो अगली फसल को कम नाइट्रोजन उर्वरक की आवश्यकता होती है।
- इसलिए, दलहन मृदा की उर्वरता में सुधार करती है और उर्वरक निर्भरता को कम करती है।
जल प्रतिबल (Water Stress) और चावल की खेती
- भारत आवश्यकता से अधिक चावल का उत्पादन करता है और एक बड़ी मात्रा का निर्यात करता है।
- चावल की खेती में बहुत अधिक जल की आवश्यकता होती है।
- चावल का उत्पादन और निर्यात करने का अप्रत्यक्ष अर्थ भूजल (Groundwater) का निर्यात करना है।
- चावल का उपयोग एथेनॉल उत्पादन के लिए भी समस्याग्रस्त है क्योंकि यह खाद्य फसलों और अधिक जल-उपयोग वाली उपज को ईंधन की ओर मोड़ देता है।
दलहन आत्मनिर्भरता मिशन
- सरकार ने दलहन में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए एक मिशन शुरू किया।
- इसका उद्देश्य MSP पर अरहर, उड़द और मसूर जैसी दालों की खरीद सुनिश्चित करना था।
- हालाँकि, दलहन की खेती के रकबे में वृद्धि सीमित रही है।
- इसके बेहतर कार्यान्वयन की आवश्यकता है क्योंकि दलहन पोषण, मृदा स्वास्थ्य और आयात में कमी के लिए महत्वपूर्ण हैं।
आगे की राह
- कार्बनिक पदार्थों पर ध्यान: किसानों को मृदा के स्वास्थ्य को बहाल करने के लिए खाद (Compost), जैविक खाद (Manure) और बायोगैस अवशेषों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- सौंदर्यशास्त्र के बजाय गुणवत्ता: छिड़काव के लिए ड्रोन के उपयोग जैसे “सौंदर्यशास्त्र” पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, सरकार को उच्च उपज वाली फसल किस्मों के विकास को प्राथमिकता देनी चाहिए।
- नीतिगत समन्वय: कृषि, उर्वरक और वित्त मंत्रालयों के बीच समन्वय सुनिश्चित करने के लिए अंतर-मंत्रालयी राष्ट्रीय नाइट्रोजन संचालन समिति को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।
- बेसल डोज़ (आधारभूत खुराक) चरण में रासायनिक उर्वरक कम करना: बुवाई के समय, किसानों को रासायनिक उर्वरकों के बजाय जैविक खाद का उपयोग करना चाहिए।
- इससे उपज कम किए बिना उर्वरक का उपयोग कम किया जा सकता है।
- फसल की किस्मों में सुधार: भारत को उच्च उपज वाली और जलवायु-अनुकूल (Climate-Resilient) फसल किस्मों में निवेश करना चाहिए।
- वैज्ञानिक अनुसंधान को उन फसलों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जिन्हें कम जल और उर्वरक की आवश्यकता होती है।
- दलहन और फसल चक्र को बढ़ावा: सुनिश्चित खरीद के माध्यम से दलहन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
- मृदा की उर्वरता बहाल करने के लिए फसल चक्र को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- राष्ट्रीय नाइट्रोजन संचालन समिति को पुनर्जीवित करें: अंतर-मंत्रालयी राष्ट्रीय नाइट्रोजन संचालन समिति को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए।
- कृषि मंत्रालय, उर्वरक मंत्रालय और वित्त मंत्रालय को नाइट्रोजन की बर्बादी कम करने तथा उर्वरक दक्षता बढ़ाने के लिए समन्वय करना चाहिए।
निष्कर्ष
- भारत की उर्वरक नीति को आपूर्ति विस्तार से हटकर दक्षता, स्थिरता (Sustainability) और मृदा स्वास्थ्य की ओर स्थानांतरित होना चाहिए। अत्यधिक उर्वरक उपयोग ने एक ‘उर्वरक जाल’ निर्मित किया है, मृदा के कार्बनिक पदार्थ को नुकसान पहुंचाया है, और सब्सिडी के व्यय को बढ़ावा दिया है।
- एक संतुलित नीति को जैविक इनपुट, दालों की खेती, फसल विविधीकरण, उर्वरकों के कुशल उपयोग और समन्वित शासन को बढ़ावा देना चाहिए।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:
प्रश्न: अनाज-केंद्रित खाद्य सुरक्षा की निरंतर खोज ने अनजाने में भारतीय कृषि को ‘उर्वरक जाल’ (Fertilizer Trap) में धकेल दिया है। इस कथन का विश्लेषण करें और फसल विविधीकरण तथा पर्यावरणीय स्थिरता को बढ़ावा देने में ‘दलहन आत्मनिर्भरता मिशन’ की भूमिका का मूल्यांकन करें।
(15 अंक, 250 शब्द)
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