भारत ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने तथा जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता को कम करने और वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को प्राप्त करने के उद्देश्य से भू-तापीय ऊर्जा को नवीकरणीय ऊर्जा के एक विश्वसनीय स्रोत के रूप में विकसित कर रहा है।
हाल ही में लद्दाख की पुग़ा घाटी में भारत के सबसे गहरे भू-तापीय ऊर्जा केंद्र का उद्घाटन इस अप्रयुक्त ऊर्जा संसाधन के दोहन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।
भू-तापीय ऊर्जा के बारे में
भू-तापीय ऊर्जा नवीकरणीय ऊर्जा का वह स्रोत है, जिसमें पृथ्वी की सतह के नीचे संचित ऊष्मा का उपयोग विद्युत उत्पादन और प्रत्यक्ष रूप से ऊष्मा प्रदान करने के उद्देश्य से किया जाता है।
“भू-तापीय” शब्द दो यूनानी शब्दों से मिलकर बना है—
जियो = पृथ्वी
थर्मल = ऊष्मा
सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत, भू-तापीय ऊर्जा पूरे वर्ष निरंतर विद्युत आपूर्ति कर सकती है।
पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा के स्रोत
पृथ्वी की आंतरिक ऊष्मा को मुख्यतः दो स्रोतों से प्राप्त की जाती है।
अवशिष्ट ऊष्मा
अवशिष्ट ऊष्मा वह ऊष्मा है जो लगभग 4.5 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी के निर्माण के समय से उसके भीतर संचित है।
यह प्रारंभिक ऊष्मा आज भी पृथ्वी के आंतरिक भाग में विद्यमान है।
रेडियोधर्मी क्षय
पृथ्वी की भूपर्पटी और मेंटल में उपस्थित यूरेनियम तथा थोरियम जैसे रेडियोधर्मी तत्त्व निरंतर प्राकृतिक रूप से क्षय होते रहते हैं।
इस क्षय से ऊष्मा उत्पन्न होती है, जो पृथ्वी की आंतरिक तापीय ऊर्जा में महत्त्वपूर्ण रूप से योगदान देती है।
भू-तापीय ऊर्जा का उत्पादन कैसे किया जाता है?
इस प्रक्रिया में निम्नलिखित चरण शामिल हैं—
पृथ्वी की सतह के नीचे स्थित भू-तापीय जलाशयों तक गहरे कुएँ खोदे जाते हैं।
भूमिगत फँसे हुए गर्म जल या भाप को सतह पर लाया जाता है।
उच्च दाब वाली भाप टरबाइन को घुमाती है, जो जनरेटर से जुड़ी होती है।
जनरेटर यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में परिवर्तित करता है।
ठंडा होने के बाद जल को पुनः जलाशय में भेज दिया जाता है ताकि सततता बनी रहे।
पुग़ा घाटी में भारत द्वारा भू-तापीय ऊर्जा के लिए की जाने वाली प्रमुख पहलें निम्नलिखित हैं :
हालिया विकास
लद्दाख के उपराज्यपाल ने पुग़ा घाटी में भारत के सबसे गहरे भू-तापीय कुओं का उद्घाटन किया।
इस परियोजना का कार्यान्वयन ओएनजीसी ऊर्जा केंद्र द्वारा किया गया है।
मुख्य विशेषताएँ
दो भू-तापीय कुएँ खोदे गए हैं।
नियोजित ड्रिलिंग गहराई 1,000 मीटर है।
परियोजना लगभग 14,000 फीट की ऊँचाई पर स्थित है।
लगभग 400 मीटर की गहराई पर 135°C तापमान दर्ज किया जा चुका है।
यह 1 मेगावाट की पायलट परियोजना है, जिसका उद्देश्य व्यावसायिक व्यवहार्यता का प्रदर्शन करना है।
पुग़ा घाटी परियोजना का महत्त्व
यह भारत में भविष्य की भू-तापीय परियोजनाओं के लिए एक रोल मॉडल के रूप में कार्य करेगी।
यह लद्दाख की कार्बन-तटस्थ विकास रणनीति को समर्थन देगी।
दूरस्थ हिमालयी क्षेत्रों में डीजल आधारित विद्युत उत्पादन पर निर्भरता कम होगी।
पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में स्वच्छ एवं विश्वसनीय ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा मिलेगा।
यह भारत के नवीकरणीय ऊर्जा परिदृश्य को मजबूती प्रदान करेगी।
पुग़ा घाटी भू-तापीय ऊर्जा के लिए महत्त्वपूर्ण क्यों है?
स्थान विशेष के आधार पर महत्ता : पुग़ा घाटी लद्दाख के लेह जिले में चांगथांग क्षेत्र के अंतर्गत स्थित है।
भूवैज्ञानिक महत्व: यह हिमालयी भू-तापीय पट्टी का हिस्सा है।
भारतीय प्लेट और यूरेशियन प्लेट में टकराव से यहाँ अनुकूल भू-तापीय स्थितियाँ निर्मित हुई हैं।
इस क्षेत्र की भूपर्पटी अपेक्षाकृत पतली है।
गर्म मैग्मा पृथ्वी की सतह के अधिक निकट स्थित है।
सक्रिय भू-तापीय गतिविधियों के स्पष्ट प्रमाण —
भाप उत्सर्जन छिद्र
गर्म जल स्रोत
कीचड़ कुंड
गंधक के निक्षेप इत्यादि पाए जाते हैं।
ये सभी सक्रिय भू-तापीय पारिस्थितिकी तंत्र की उपस्थिति का संकेत देते हैं।
भू-तापीय ऊर्जा के लाभ
निरंतर विद्युत आपूर्ति: भू-तापीय ऊर्जा 24×7 आधारभूत विद्युत आपूर्ति प्रदान करती है, जबकि सौर और पवन ऊर्जा मौसम पर निर्भर होती हैं।
नवीकरणीय एवं स्वच्छ ऊर्जा: यह नवीकरणीय ऊर्जा का स्रोत है तथा इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन अत्यंत कम होता है।
ऊर्जा सुरक्षा: आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम होती है।
इसके इस्तेमाल से ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा ।
बहुउद्देशीय उपयोग
विद्युत उत्पादन के अतिरिक्त भू-तापीय ऊर्जा का उपयोग—
भवनों को गर्म रखने
ग्रीनहाउस कृषि
मत्स्य पालन
औद्योगिक ताप
जिला ताप प्रणाली इत्यादि में किया जा सकता है।
आइसलैंड: वैश्विक भू-तापीय ऊर्जा सफलता के उदाहरण के रूप में
1970 के दशक के तेल संकट के बाद आइसलैंड ने भू-तापीय संसाधनों में व्यापक निवेश कर अपनी ऊर्जा व्यवस्था में परिवर्तन किया।
उसकी लगभग 65% प्राथमिक ऊर्जा जरूरतें भू-तापीय स्रोतों के माध्यम से प्राप्त होती है।
लगभग 90% घरों को भू-तापीय ऊर्जा से गर्म रखा जाता है।
आइसलैंड यह दर्शाता है कि राजनीतिक प्रतिबद्धता और भौगोलिक अनुकूलता मिलकर एक सतत ऊर्जा प्रणाली का निर्माण कर सकते हैं।
विश्व में भू-तापीय ऊर्जा की स्थिति
विश्व की स्थापित भू-तापीय ऊर्जा क्षमता तकरीबन 17 गीगावाट से अधिक है।
वैश्विक विद्युत उत्पादन में भू-तापीय ऊर्जा का योगदान लगभग 1% से भी कम है।
प्रमुख उत्पादक देश हैं—
संयुक्त राज्य अमेरिका
इंडोनेशिया
फिलीपींस
भारत में भू-तापीय ऊर्जा की संभावनाएँ
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के भू-तापीय एटलस (2022) के अनुसार—
भारत में लगभग 10,600 मेगावाट भू-तापीय ऊर्जा की संभावित क्षमता है।
देशभर में 381 संभावित भू-तापीय स्थलों की पहचान की गई है।
भारत का पहला परिचालित भू-तापीय विद्युत संयंत्र
भारत का पहला परिचालित भू-तापीय पायलट संयंत्रसिंगरेनी कोलियरिज कंपनी लिमिटेड द्वारा तेलंगाना के मनुगुरु में स्थापित किया गया है।
इसकी क्षमता 20 किलोवाट है।
कार्बनिक रैंकिन चक्र (Organic Rankine Cycle-ORC)
कार्बनिक रैंकिन चक्र ऐसी तकनीक है, जिसका उपयोग उस दौरान किया जाता है जबकि भू-तापीय जल का तापमान प्रत्यक्ष रूप से भाप उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त नहीं होता।
भू-तापीय जल की ऊष्मा को कम क्वथनांक वाले दूसरे द्रव में स्थानांतरित किया जाता है।
यह द्वितीयक द्रव वाष्पित होकर टरबाइन को घुमाता है, जिससे विद्युत उत्पादन होता है।
भू-तापीय ऊर्जा के विकास के क्षेत्र में उपस्थित परमुख चुनौतियाँ
उच्च प्रारंभिक निवेश: गहरी ड्रिलिंग के लिए अधिक मात्रा में पूँजी निवेश की आवश्यकता होती है।
भूवैज्ञानिक अनिश्चितता: ड्रिलिंग के बाद व्यावसायिक रूप से उपयोगी भू-तापीय भंडार मिलने की कोई निश्चितता नहीं होती।
तकनीकी सीमाएँ: भारत के पास गहरी ड्रिलिंग तकनीकों में सीमित विशेषज्ञता है।
सीमित संसाधन अन्वेषण: उन्नत 3D भू-तापीय सर्वेक्षण अभी पर्याप्त नहीं हैं।
दूरस्थ स्थान: अधिकांश भू-तापीय संसाधन कठिन पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित हैं, जिससे लागत बढ़ जाती है।
नीतिगत अभाव: भारत के पास अभी तक समर्पित राष्ट्रीय भू-तापीय ऊर्जा नीति नहीं है।
आगे की राह
राष्ट्रीय भू-तापीय ऊर्जा नीति तैयार किया जाए, जिसमें वित्तीय प्रोत्साहन, कर लाभ और अनुदान शामिल हों।
सार्वजनिक–निजी भागीदारी को बढ़ावा दिया जाए।
आइसलैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देशों के साथ प्रौद्योगिकी सहयोग को मजबूत की जाने की आवश्यकता है ।
सफल पायलट परियोजनाओं का विस्तार कर उन्हें व्यावसायिक स्तर के विद्युत संयंत्रों में परिवर्तित की जाने की आवश्यकता है ।
राष्ट्रीय विद्युत ग्रिड में भू-तापीय ऊर्जा को आधारभूत नवीकरणीय ऊर्जा के रूप में शामिल किया जाना चाहिए ।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण तथा ओएनजीसी ऊर्जा केंद्र जैसी संस्थाओं को अनुसंधान एवं उन्नत अन्वेषण के लिए अधिक वित्तीय सहायता प्रदान की जानी चाहिए ।
मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारत में ऊर्जा सुरक्षा तथा वर्ष 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य की प्राप्ति में भू-तापीय ऊर्जा की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। इसके विकास की संभावनाओं, चुनौतियों तथा आवश्यक नीतिगत उपायों पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)
प्रश्न: निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
भू-तापीय ऊर्जा पृथ्वी के आंतरिक भाग में संचित ऊष्मा से प्राप्त होती है।
भू-तापीय ऊर्जा सौर एवं पवन ऊर्जा की भाँति मौसम पर अत्यधिक निर्भर होती है।
भारत में भू-तापीय ऊर्जा की संभावनाओं की पहचान के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा भू-तापीय एटलस प्रकाशित किया गया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 2 और 3
(d) 1, 2 और 3
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