संदर्भ:
भारत-यूरोपीय संघ (EU) के संबंधों को ‘अधूरी क्षमता’ के बार-बार किए जाने वाले दावों से आगे बढ़कर ठोस परिणामों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, क्योंकि विश्व भू-आर्थिक विखंडन, शस्त्रीकृत निर्भरता, आपूर्ति-श्रृंखला असुरक्षा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का सामना कर रही है।
भारत-यूरोपीय संघ संबंधों के बारे में:
- रणनीतिक साझेदारी: भारत और यूरोप ने लंबे समय से अपने संबंधों को रणनीतिक बताया है, हालाँकि वास्तविक रणनीतिक संबंधों को भविष्य की संभावनाओं की बजाय परिणामों से मापा जाना चाहिए।
- पूरक शक्तियाँ: यूरोप पूँजी, प्रौद्योगिकी, अनुसंधान क्षमता और औद्योगिक विशेषज्ञता लाता है, जबकि भारत पैमाना, प्रतिभा, माँग, विकास तथा कार्यान्वयन क्षमता में विस्तार करता है।
- भारत का विकास: भारत अब केवल भविष्य के लिए एक अवसर मात्र ही नहीं रह गया है, क्योंकि यह मजबूत विकास, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) तथा बढ़ती वैश्विक माँग के साथ एक वर्तमान आर्थिक वास्तविकता बन गया है।
- सह-सृजन की आवश्यकता: भारत और यूरोपीय संघ के सहयोग को निर्देशात्मक तथा रक्षात्मक परिदृश्य से हटकर संयुक्त डिजाइन, साझा स्वामित्व तथा पारस्परिक रूप से लाभकारी परियोजनाओं की ओर आगे बढ़ना चाहिए।
परिवर्तित वैश्विक संदर्भ:
- भू-आर्थिक पुनर्गठन : विश्व एक बड़े भू-आर्थिक बदलाव का साक्षी बन रहा है, जहाँ व्यापार, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, आपूर्ति श्रृंखला तथा महत्त्वपूर्ण खनिजों का उपयोग रणनीतिक शक्ति के साधनों के रूप में तेजी से किया जा रहा है।
- निर्भरता का शस्त्रीकरण: आर्थिक निर्भरता, जिसे कभी शांति का स्रोत माना जाता था, अब एक संवेदनशीलता के रूप में देखी जाती है, क्योंकि यह लाभ उठाने का अवसर तथा रणनीतिक दबाव उत्पन्न करती है।
- विनिमय आधारित व्यवस्था : वैश्विक अर्थव्यवस्था कम सार्वभौमिक, नियम-आधारित और अधिक जोखिम-आधारित होती जा रही है, जो भारत और यूरोप को विश्वसनीय तथा विविध साझेदारियाँ तलाशने के लिए बाध्य कर रही है।
- रणनीतिक स्वायत्तता: भारत गुटीय राजनीति नहीं चाहता है, जबकि यूरोप तेजी से यह स्वीकार कर रहा है कि रणनीतिक स्वायत्तता के लिए विशेष जुड़ाव की बजाय विविध साझेदारियों की आवश्यकता है।
भारत-यूरोपीय संघ सहयोग का महत्त्व:
- मुक्त व्यापार समझौता: भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता (FTA) रणनीतिक प्रशंसा को एक वास्तविक आर्थिक साझेदारी में बदलने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
- आपूर्ति-श्रृंखला : भारत और यूरोप के प्रमुख क्षेत्रों में विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखलाओं का निर्माण करके किसी भी एक भूगोल पर अधिक निर्भरता को कम कर सकते हैं।
- हरित संक्रमण: यूरोप के पास डीकार्बोनाइजेशन प्रौद्योगिकियाँ हैं, जबकि भारत के पास बड़े पैमाने पर परिनियोजित (Deployment) हरित प्रौद्योगिकियों को व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए आवश्यक पैमाना स्थित है।
- अवसंरचनात्मक विकास: भारत द्वारा बंदरगाहों, हवाई अड्डों, लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर, औद्योगिक समूहों, डिजिटल बुनियादी ढाँचे तथा शहरी प्रणालियों का विस्तार यूरोपीय वित्त तथा प्रौद्योगिकी के लिए आवश्यक अवसर की उपलब्धता सुनिश्चित करता है।
- प्रौद्योगिकी आधारित शासन : यूरोप की नियामक विशेषज्ञता और भारत का डिजिटल डिलीवरी अनुभव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, डिजिटल पहचान और सीमा पार डिजिटल सेवाओं के लिए नए ढाँचे के सृजन में भूमिका निभा सकते हैं।
- वैश्विक दक्षिण के साथ संबंध: भारत यूरोप और एशिया, अफ्रीका तथा व्यापक ग्लोबल साउथ में विकास के उभरते केंद्रों के मध्य एक पुल के रूप में कार्य कर सकता है।
भारत और यूरोपीय संघ के मध्य संबंधों में उपस्थित प्रमुख चुनौतियाँ:
- पुरानी मानसिकता: यूरोप कभी-कभी भारत को विकास सहायता तथा विनियामक शर्तों के माध्यम से, जबकि भारत अक्सर यूरोप को बाजार पहुँच विवादों तथा अनुपालन बोझ के माध्यम से देखता है।
- कार्यान्वयन अंतराल: समझौतों पर वार्ता करना उन्हें लागू करने से आसान है, और भारत-यूरोपीय संघ के संबंधों की सफलता घोषणाओं को परियोजनाओं में बदलने पर निर्भर करेगी।
- विनियामक मतभेद: कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM), डिजिटल विनियमन, स्थिरता मानकों, औद्योगिक नीति तथा बाजार तक पहुँच को लेकर मतभेद की स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं।
- विश्वास की कमी : दोनों पक्षों को असहमतियों को परिपक्वता से प्रबंधित करने की आवश्यकता है, ताकि व्यक्तिगत विवाद संबंधों को परिभाषित न कर सकें ।
- विखंडित वैश्विक अर्थव्यवस्था: विश्व का प्रतिस्पर्धी आर्थिक और रणनीतिक क्षेत्रों में विभाजन भारत-यूरोपीय संघ सहयोग को जटिल बना सकता है।
आगे की राह
- परिणाम-आधारित साझेदारी: भारत और यूरोपीय संघ को शिखर सम्मेलनों की घोषणाओं से आगे बढ़कर व्यापार, बुनियादी ढाँचे, प्रौद्योगिकी, जलवायु कार्रवाई और आपूर्ति-श्रृंखला लचीलेपन में व्यावहारिक सहयोग की ओर बढ़ना चाहिए।
- संयुक्त मंच : दोनों पक्षों को बुनियादी ढाँचा वित्तपोषण, हरित औद्योगिकीकरण, प्रौद्योगिकी साझेदारी और आपूर्ति-श्रृंखला विविधीकरण के लिए एक परिचालन तंत्र निर्मित करना चाहिए।
- विवाद प्रबंधन: नीतिगत संघर्ष को कम करने के लिए भारत तथा यूरोप को कार्बन नियमों, स्थिरता मानकों, डिजिटल नियमों तथा बाजार तक पहुँच पर संवाद को संस्थागत बनाना चाहिए।
- एकसमान साझेदारी: संबंध सहायता-आधारित, अनुपालन-आधारित या निर्देश-संचालित दृष्टिकोण की बजाय सह-सृजन, साझा जोखिमों और संयुक्त नवाचार पर आधारित होने चाहिए।
- पुल-निर्माण की भूमिका : भारत और यूरोप को कठोर भू-राजनीतिक गुटों का हिस्सा बनने की बजाय एक विखंडित विश्व में पुल-निर्माताओं के रूप में सहयोग करना चाहिए।
निष्कर्ष
निष्कर्षतः भारत और यूरोप को क्षमता पर चर्चा करना बंद कर परिणाम आधारित कार्यों को प्रारंभ करना चाहिए। उनकी साझेदारी एक विखंडित वैश्विक व्यवस्था में केवल कार्यान्वयन, सह-सृजन, परिपक्व विवाद प्रबंधन तथा पुल-निर्माण के माध्यम से ही रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण हो सकती है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. भारत-यूरोपीय संघ का संबंध लंबे समय से ‘क्षमता जाल’ से पीड़ित रहा है। ‘निर्भरता शस्त्रीकरण’ के युग में, आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए, कि दोनों क्षेत्र रणनीतिक प्रशंसकों से वास्तविक आर्थिक भागीदारों में किस प्रकार परिवर्तित हो सकते हैं।
(15 अंक, 250 शब्द)
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