संदर्भ:
वैश्विक शासन पर चीन का हालिया श्वेत पत्र (white paper) बहुपक्षवाद के रक्षक के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करते हुए, अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अंतर्निहित मानदंडों को नया आकार देने के उसके प्रयास को दर्शाता है।
- विघटनकारी अमेरिकी विदेश नीति और सहयोगियों के अलगाव ने चीन को स्वयं को एक उत्तरदायी महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत करने के लिए, रणनीतिक स्थान प्रदान किया है।
वैश्विक व्यवस्था के प्रति चीन का दृष्टिकोण
- चीन का चयनात्मक संशोधनवाद : चीन युद्ध के बाद की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को पूरी तरह से उखाड़ फेंकना नहीं चाहता है, बल्कि अपने रणनीतिक हितों के अनुरूप इसमें चयनात्मक रूप से संशोधन कर रहा है।
- संस्थागत निरंतरता: चीन संयुक्त राष्ट्र (UN), डब्ल्यूटीओ (WTO) तथा बहुपक्षीय मंचों जैसे संस्थानों का समर्थन करना जारी रखता है, क्योंकि वे वैधता तथा प्रभाव प्रदान करते हैं।
- समानांतर संस्थान: चीन ने मौजूदा प्रणाली के भीतर अपने अधिकार का विस्तार करने के लिए एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक (AIIB), न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) तथा शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे प्लेटफॉर्म बनाए हैं।
- संस्थागत संशोधनवाद: चीन की रणनीति संस्थागत क्रांति नहीं, बल्कि मौजूदा वैश्विक संस्थानों के भीतर और उनके साथ-साथ चीनी प्रभाव का विस्तार करना है।
संस्थागत बनाम मानक व्यवस्था
- संस्थागत व्यवस्था : संस्थागत व्यवस्था में संयुक्त राष्ट्र प्रणाली, ब्रेटन वुड्स संस्थान तथा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित बहुपक्षीय संरचना शामिल है।
- मानक व्यवस्था : मानक व्यवस्था में संप्रभुता, गैर-हस्तक्षेप, मानवाधिकार, लोकतंत्र, मुक्त बाजार और विधि का शासन जैसे सिद्धांत शामिल हैं।
- चीन की रणनीति: चीन वैश्विक व्यवस्था के संस्थागत ढाँचे का समर्थन करता है, जबकि इसके मानक आधारों को नया आकार देने का प्रयास करता है।
चीन की मानक आकांक्षाएँ
- वैश्विक स्तर पर की गई पहल : चीन की वैश्विक विकास पहल (GDI), वैश्विक सुरक्षा पहल (GSI), वैश्विक सभ्यता पहल (GCI) और वैश्विक शासन पहल (GGI) चीन को एक नियम-निर्धारक शक्ति के रूप में पेश करने का प्रयास करती है।
- विकासात्मक आख्यान : GDI स्वयं को सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के साथ जोड़ता है, ताकि चीन को ग्लोबल साउथ के एक भागीदार के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।
- सुरक्षात्मक आख्यान: GSI संप्रभुता और गैर-हस्तक्षेप पर बल देता है, लेकिन यूक्रेन जैसे देशों के संप्रभु विकल्पों को कमजोर करने के लिए “वैध सुरक्षा चिंताओं” के विचार का उपयोग करता है।
- सभ्यता संबंधी आख्यान : GCI सभ्यतागत विविधता को बढ़ावा देता है, लेकिन इसका उपयोग सार्वभौमिक मानवाधिकारों को सांस्कृतिक रूप से सापेक्ष बनाकर उन्हें कमजोर करने के लिए किया जा सकता है।
- लोकतंत्र का आख्यान : चीन लोकतंत्र को राजनीतिक भागीदारी, संस्थागत स्वतंत्रता या जवाबदेही की बजाय भौतिक परिणामों के माध्यम से परिभाषित करता है।
चीन के आचरण में विरोधाभास:
- दक्षिण चीन सागर: चीन ने 2016 के स्थायी मध्यस्थता न्यायालय के निर्णय को खारिज कर दिया, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के प्रति चयनात्मक सम्मान को दर्शाता है।
- सीमा विवाद: भारत और भूटान के साथ चीन का समय-समय पर होने वाला सैन्य गतिरोध संप्रभुता तथा गैर-हस्तक्षेप के प्रति उसकी घोषित प्रतिबद्धता की सीमाओं को उजागर करता है।
- बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI): BRI को विकास सहयोग के रूप में तैयार किया गया है, लेकिन यह अक्सर प्राप्तकर्ता देशों में साझेदारी तथा प्रभाव के मध्य की रेखा को धुंधला कर देता है।
- चयनात्मक बहुपक्षवाद: चीन वहाँ बहुपक्षवाद का समर्थन करता है जहाँ उसे प्रभाव प्राप्त होता है, लेकिन जहाँ उसके आंतरिक हित जुड़े होते हैं, वहाँ वह स्पष्टता को प्रतिबंधित तथा सुरक्षाकृत करता है।
वैश्विक व्यवस्था के लिए जोखिम:
- मानक शून्यता : चीन वैश्विक संस्थानों को सुरक्षित रख सकता है, जबकि उन उदार सिद्धांतों को कमजोर कर सकता है जो उन्हें अर्थ प्रदान करते हैं।
- संप्रभुता का कमजोर होना : चीन का दृष्टिकोण राज्यों की संप्रभु समानता को कमजोर कर सकता है, जब छोटे देशों के विकल्प महाशक्ति के हितों के साथ संघर्ष करते हैं।
- मानवाधिकारों का कमजोर होना: चीन का सांस्कृतिक सापेक्षवाद अधिनायकवादी शासन की जाँच को कम तथा सार्वभौमिक मानवाधिकार मानकों को कमजोर कर सकता है।
- विधि के शासन का क्षरण: अंतरराष्ट्रीय निर्णयों का चयनात्मक अनुपालन विधिक तथा नियम-आधारित तंत्रों में विश्वास को कमजोर कर सकता है।
- नागरिक समाज पर प्रतिबंध: चीन का मॉडल स्थिरता और विकास की भाषा के तहत नागरिक समाज, असंतोष तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रतिबंधों को वैध बना सकता है।
भारत के लिए महत्त्व:
- रणनीतिक चिंता: चीन की पसंदीदा वैश्विक व्यवस्था एक बहुध्रुवीय, नियम-आधारित और संप्रभु-समानता-आधारित अंतरराष्ट्रीय प्रणाली में भारत के हित के समान नहीं है।
- सीमा सुरक्षा: भारत की सीमाओं पर चीन का आचरण दर्शाता है, कि संप्रभुता का उसका बयान हमेशा आत्मसंयम में नहीं बदलता है।
- हिंद-प्रशांत स्थिरता: दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामकता नौवहन की स्वतंत्रता तथा समुद्री स्थिरता में भारत के हितों को प्रभावित करती है।
- ग्लोबल साउथ में प्रतिस्पर्धा: चीन की विकास कूटनीति ग्लोबल साउथ तक भारत की अपनी पहुँच (Outreach) के साथ प्रतिस्पर्धा करती है।
- मानक हित : भारत को एक ऐसी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से लाभ होता है, जहाँ संप्रभुता, विधि का शासन, स्पष्टता तथा रणनीतिक स्वायत्तता की रक्षा की जाती है।
आगे की राह
- नियम-आधारित व्यवस्था: भारत को एक नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समर्थन करना जारी रखना चाहिए, जो संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता तथा शांतिपूर्ण विवाद समाधान की रक्षा करती हो।
- रणनीतिक स्वायत्तता: भारत को अमेरिकी व्यवधान या चीनी संशोधनवाद दोनों में से किसी के साथ भी संरेखण से बचना चाहिए, तथा मुद्दा-आधारित रणनीतिक स्वायत्तता का पालन करना चाहिए।
- ग्लोबल साउथ: भारत को पारदर्शिता, स्थिरता, क्षमता-निर्माण तथा संप्रभुता के सम्मान पर आधारित एक वैकल्पिक विकास मॉडल प्रस्तुत करना चाहिए।
- संस्थागत सुधार: भारत को समकालीन वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, डब्ल्यूटीओ तथा बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों जैसे वैश्विक संस्थानों के सुधार के लिए दबाव डालना चाहिए।
- मानक स्पष्टता: भारत को ग्लोबल साउथ की विकासात्मक चिंताओं की अनदेखी किए बिना संप्रभु समानता, कानून का शासन, लोकतांत्रिक जवाबदेही और खुले समाजों जैसे सिद्धांतों की रक्षा करनी चाहिए।
- साझेदारी का निर्माण: भारत को एक संतुलित और समावेशी वैश्विक व्यवस्था को आकार देने के लिए क्वाड (QUAD), ब्रिक्स (BRICS), SCO, जी20 (G20), IORA और द्विपक्षीय मंचों के माध्यम से साझेदारी को मजबूत करना चाहिए।
निष्कर्ष
निष्कर्षस्वरूप चीन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नष्ट नहीं कर रहा है बल्कि संस्थानों को बनाए रखते हुए तथा उनके अंतर्निहित अर्थों को संशोधित करके भीतर से इसके मानक आधारों को नया आकार दे रहा है। भारत को अपने दीर्घकालिक रणनीतिक हितों की रक्षा करने वाली एक नियम-आधारित, बहुध्रुवीय और संप्रभुता का सम्मान करने वाली अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का बचाव करते हुए चीन के नेतृत्व वाली पहलों के साथ सावधानीपूर्वक जुड़ना चाहिए।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. एक चयनात्मक संशोधनवादी शक्ति के रूप में चीन के विकास का मूल्यांकन कीजिए, तथा विश्लेषण कीजिए कि उसका मानक एजेंडा भारत के लोकतांत्रिक और रणनीतिक हितों के लिए किस प्रकार चुनौती उत्पन्न करता है। टिप्पणी कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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