सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2026 तथा डिजिटल अधिकार

सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2026 तथा डिजिटल अधिकार 28 Apr 2026

संदर्भ:

‘मसौदा सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2026’ (Draft IT Rules, 2026) के जारी होने से वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) तथा गोपनीयता के अधिकार (अनुच्छेद 21) के उल्लंघन के संबंध में महत्त्वपूर्ण चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।

शैडो बैन और सेंसरशिप के बारे में:

  • शैडो बैन (Shadow Ban): यह मॉडरेशन का एक गुप्त रूप है, जहाँ स्पष्ट सूचना के बिना उपयोगकर्ता की सामग्री को प्रतिबंधित कर दिया जाता है।
    • उपयोगकर्ता अभी भी पोस्ट कर सकता है, लेकिन उसकी पहुँच, जुड़ाव या खोज योग्यता को एल्गोरिदम द्वारा बदल दिया जाता है, जो अक्सर पारदर्शिता और उचित प्रक्रिया पर प्रश्न उठाता है।
  • सेंसॉरशिप : कानूनी, राजनीतिक या सामुदायिक दिशानिर्देशों के आधार पर सरकारों या प्लेटफार्मों द्वारा सामग्री (कंटेन्ट) का प्रत्यक्ष तथा स्पष्ट प्रतिबंध या निष्कासन।
    • इसे सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा जैसे आधारों पर उचित ठहराया जा सकता है, लेकिन अत्यधिक या अस्पष्ट सेंसरशिप वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता [अनुच्छेद 19(1)(a)] के लिए खतरा उत्पन्न कर सकती है।

कानूनी तथा संरचनात्मक मुद्दे:

  • सेफ हार्बर (IT अधिनियम की धारा 79): यदि प्लेटफॉर्म सामग्री हटाने के सरकारी निर्देशों का पालन नहीं करते हैं, तो वे अपनी सुरक्षा खो देते हैं।
  • प्रत्यायोजित विधान: आलोचकों का तर्क है कि कार्यपालिका ऐसे नियम बना रही है जो मूल अधिनियम द्वारा दी गई शक्तियों से अधिक हैं, जिससे शक्तियों का संतुलन बिगड़ रहा है।
  • चिलिंग इफेक्ट: बढ़ती सेंसरशिप नागरिकों को अपने विचारों को पूरी तरह से व्यक्त करने से रोक सकती है।

विशिष्ट नियम:

  • नियम 3(4): यह अदालतों को दरकिनार करता है, जिससे सामग्री हटाने के लिए अनौपचारिक सरकारी आदेशों की अनुमति मिलती है, जो ‘श्रेया सिंघल मामले (2015)’ के विपरीत है।
  • नियम 8: यह आम नागरिकों के सोशल मीडिया पोस्ट पर भी उतना ही सेंसरशिप का स्तर लागू करता है, जितना कि बड़े मीडिया घरानों पर।
  • अंतर-विभागीय समितियाँ : इनकी आलोचना शिकायत निवारण निकायों कीइ बजाय सेंसरशिप उपकरण के रूप में कार्य करने के लिए की जाती है, जो अक्सर उपयोगकर्ता को उनके खिलाफ की गई कार्रवाई की सूचना न देकर ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांत का उल्लंघन करती हैं।
  • गोपनीयता का अधिकार और डेटा प्रतिधारण:
    • मसौदा सुझाव देता है, कि एकाउंट हटाने के बाद भी व्यक्तिगत डेटा को लंबी अवधि तक रखा जाए, जो ‘भूल जाने के अधिकार’ (Right to be Forgotten) में बाधा डालता है और हैकर्स के जोखिमों को बढ़ाता है।

संवैधानिक संतुलन और संबंधित ऐतिहासिक मामले:

  • इंडियन एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स बनाम भारत संघ वाद (1986): प्रत्यायोजित विधान को अपने मूल अधिनियम के दायरे में रहना चाहिए। कार्यपालिका स्वयं को ऐसी शक्तियाँ नहीं दे सकती, जो आईटी अधिनियम का उद्देश्य कभी नहीं था।
  • श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ वाद (2015): प्लेटफॉर्म केवल न्यायालय के आदेश या कानून के तहत औपचारिक अधिसूचना पर ही सामग्री हटा सकते हैं। अस्पष्ट कानून ‘चिलिंग इफेक्ट’ उत्पन्न करते हैं।
  • के. एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ वाद (2017): गोपनीयता का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है। आनुपातिकता के बिना बड़े पैमाने पर डेटा प्रतिधारण असंवैधानिक है।

मुख्य परीक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण शब्द

  • मुक्त अभिव्यक्ति पर चिलिंग इफेक्ट : ऐसे कानून जो प्रवर्तन के बिना भी स्व-सेंसरशिप का कारण बनते हैं।
  • सीमा पार करता प्रत्यायोजित विधान: मूल अधिनियम द्वारा दी गई शक्ति से अधिक नियम।
  • फंक्शन क्रीप (Function Creep): डेटा X के लिए एकत्र किया गया, लेकिन Y (निगरानी) के लिए पुन: उपयोग किया गया।
  • कार्यकारी अतिरेक : कार्यपालिका द्वारा संवैधानिक सीमाओं से परे शक्तियों का प्रयोग।
  • निवारक सेंसरशिप : कोई नुकसान होने से पूर्व ही अभिव्यक्ति को रोक देना।
  • सेफ हार्बर का क्षरण : अभिव्यक्ति या सामग्री को अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करने के लिए प्लेटफॉर्म की सुरक्षा को कमजोर करना।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: भारत में वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर मसौदा सूचना प्रौद्योगिकी नियम, 2026 के निहितार्थों का मूल्यांकन कीजिए। बताइए, कि ये नियम ‘श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ’ जैसे न्यायिक मामलों को किस प्रकार चुनौती देते हैं?

(15 अंक, 250 शब्द)

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