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निवारक निरोध तथा नागरिक स्वतंत्रता

निवारक निरोध तथा नागरिक स्वतंत्रता 16 Jun 2026

निवारक निरोध क्या है?

  • निवारक निरोध का अर्थ है, किसी व्यक्ति को अपराध करने से पूर्व ही इस विश्वास के आधार पर हिरासत में लेना कि वह भविष्य में कोई अपराध कर सकता है।

दंडात्मक निरोध से अंतर

निवारक निरोध दंडात्मक निरोध
अपराध होने से पूर्व अपराध होने के पश्चात
एहतियाती उपाय अपराध के लिए सजा

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • रौलट एक्ट, 1919: इस औपनिवेशिक काल के कानून ने बिना मुकदमे के हिरासत में रखने की अनुमति दी थी।
    • इसका प्रसिद्ध नारा था: कोई अपील नहीं, कोई वकील नहीं, कोई दलील नहीं।”

संवैधानिक आधार

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 22 निवारक निरोध को संवैधानिक मान्यता प्रदान करता है, और हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के लिए कुछ सुरक्षा उपाय निर्धारित करता है।
  • संविधान सभा ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए एक असाधारण उपाय के रूप में निवारक निरोध को बनाए रखा।

दुरुपयोग संबंधी चिंताएँ

  • ऐसी चिंताएँ बढ़ रही हैं, कि निवारक निरोध का उपयोग सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के वास्तविक खतरों की बजाय तेजी से सामान्य कानून-व्यवस्था के मामलों में किया जा रहा है।
  • चंद्रपाल सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में, न्यायालय ने एक मामूली पड़ोस के विवाद में निवारक निरोध के उपयोग की आलोचना की, जिससे इसके दुरुपयोग के जोखिम स्पष्ट हुए।

संबंधित मुद्दे

  • कार्यपालिकीय अतिरेक: अधिकारी सामान्य विधिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करते हुए, अत्यधिक मात्रा में निवारक निरोध का उपयोग कर सकते हैं।
  • जवाबदेही की कमी: निरोध शक्तियों के दुरुपयोग के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को अक्सर बहुत कम या किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ता है।
  • कमजोर निगरानी: हिरासत के फैसलों में कार्यकारी मजिस्ट्रेटों की प्रमुख भूमिका होती है, जबकि स्वतंत्र न्यायिक जाँच सीमित रहती है।
  • स्वतंत्रता पर प्रभाव: निवारक निरोध व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है, जो एक संवैधानिक लोकतंत्र के लिए मूलभूत हैं।

प्रमुख सिफारिशें

  • मामूली विवादों में उपयोग से बचें: निवारक निरोध को सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के गंभीर खतरों के लिए आरक्षित किया जाना चाहिए, न कि नियमित विधिक-व्यवस्था के विवादों में लागू किया जाना चाहिए।
  • लिखित औचित्य: पारदर्शिता सुनिश्चित करने और मनमानी कार्रवाई को रोकने के लिए, अधिकारियों को निरोध आदेश जारी करने के स्पष्ट एवं विस्तृत कारण प्रदान करने चाहिए।
  • पीड़ितों के लिए मुआवजा: हिरासत के अवैध या अनुचित पाए जाने पर न्यायालय को व्यक्तियों को मुआवजा देना चाहिए।
  • अधिकारियों की जवाबदेही: शक्तियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए गलत या दुर्भावनापूर्ण (mala fide) हिरासत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों को उचित अनुशासनात्मक तथा कानूनी परिणामों का सामना करना चाहिए।

निष्कर्ष

उपर्युक्त चर्चा सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखते हुए नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करने से संबंधित चुनौतियों पर प्रकाश डालती है| स्पष्ट है, कि एक सतत और विकसित भारत के लिए ऐसी नीतियों की आवश्यकता है, जो आर्थिक विकास, पर्यावरणीय स्थिरता तथा संवैधानिक स्वतंत्रताओं को सावधानीपूर्वक संतुलित करे।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्र. “सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकने के लिए तैयार किए गए निवारक निरोध तंत्र धीरे-धीरे लोगों को स्वतंत्रता से वंचित करने के साधन बन गए हैं।” इलाहाबाद उच्च न्यायालय के हालिया फैसले के आलोक में इस कथन का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

निवारक निरोध तथा नागरिक स्वतंत्रता

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