संदर्भ:
एक लंबे सैन्य संघर्ष के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका (US) और इरान एक ऐतिहासिक शांति समझौते (MOU) पर सहमत हुए हैं। यह घटनाक्रम क्षेत्रीय सुरक्षा, ऊर्जा बाजारों, समुद्री व्यापार मार्गों, इजराइल-इरान संबंधों तथा भारत के रणनीतिक हितों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
शांति समझौते का महत्त्व
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य का पुनः संचालन: हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जिससे होकर वैश्विक कच्चे तेल के व्यापार का लगभग पाँचवा हिस्सा गुजरता है, के पुनः संचालन से निर्बाध समुद्री ऊर्जा प्रवाह सुनिश्चित होगा। यह वैश्विक ऊर्जा बाजारों की स्थिरता और तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव को कम करने में मदद करेगा।
- क्षेत्रीय संघर्षों में कमी: प्रस्तावित युद्धविराम समझौतों और हिजबुल्लाह तथा हौथिस जैसे इरान से जुड़े समूहों से जुड़े तनाव को कम करने के माध्यम से, यह शांति समझौता क्षेत्रीय तनावों में कमी तथा स्थिरता को बढ़ावा देगा।
- इरान के लिए आर्थिक राहत: प्रतिबंधों के हटने और स्थिर परिसंपत्तियों के जारी होने से व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलेगा, इरान की अर्थव्यवस्था को वित्तीय सहायता प्राप्त होगी तथा धीरे-धीरे आर्थिक सामान्यीकरण के माध्यम से घरेलू आर्थिक स्थिरता आएगी।
समझौते से संबंधित चिंताएँ
- इजराइल की सुरक्षा चिंताएँ: इजराइल इरानी प्रभाव के खिलाफ दीर्घकालिक सुरक्षा गारंटी चाहता है। इरान में सत्ता परिवर्तन न होना और छद्म समूहों को निरंतर समर्थन मिलने की आशंका को इस शांति व्यवस्था की सीमाओं के रूप में देखा जा सकता है।
- परमाणु अस्पष्टता की संभावना: परमाणु हथियार विकसित न करने की इरान की प्रतिबद्धता के बावजूद, सत्यापन तंत्र में चुनौतियाँ और हितधारकों के मध्य लगातार विद्यमान विश्वास का संकट परमाणु अस्पष्टता को जन्म दे सकता है।
- रणनीतिक भूगोल का शस्त्रीकरण: इस संकट ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य के रणनीतिक महत्त्व को एक बार पुनः रेखांकित किया है। इसने दिखाया है, कि कैसे महत्त्वपूर्ण समुद्री चोकपॉइंट्स पर नियंत्रण का उपयोग भू-राजनीतिक प्रभाव और रणनीतिक दबाव के उपकरण के रूप में किया जा सकता है।
खाड़ी देशों के लिए निहितार्थ:
- सुरक्षा संवेदनशीलता का उजागर होना: हालिया संघर्षों ने बाह्य सुरक्षा गारंटी पर खाड़ी देशों की निर्भरता को उजागर किया है, तथा कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइल हमलों के खिलाफ पारंपरिक रक्षा प्रणालियों की सीमाओं को सामने लाया है।
- अंतर-खाड़ी प्रतिस्पर्धा: सार्वजनिक सहयोग के बावजूद, यमन और सूडान जैसे संघर्षों में क्षेत्रीय शक्तियों के बीच लगातार बनी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और अलग-अलग हित दीर्घकालिक क्षेत्रीय एकता के लिए एक चुनौती बने हुए हैं।
भारत के लिए निहितार्थ:
- ऊर्जा सुरक्षा: पश्चिम एशियाई ऊर्जा आयात पर भारत की भारी निर्भरता के कारण हॉर्मुज जलडमरूमध्य इसकी ऊर्जा सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें किसी भी प्रकार का व्यवधान तेल आपूर्ति को प्रभावित तथा ऊर्जा लागत बढ़ा सकता है।
- रणनीतिक स्वायत्तता: भारत को अमेरिका, इजराइल, इरान और खाड़ी देशों के साथ संबंधों को संतुलित करते हुए अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के निर्णय लेने की क्षमता (रणनीतिक स्वायत्तता) को बनाए रखना होगा।
- भारतीय प्रवासियों की चिंताएँ: खाड़ी देशों में लाखों भारतीय प्रवासी रहते और काम करते हैं। क्षेत्रीय अस्थिरता प्रेषित धन, रोजगार के अवसरों और भारतीय प्रवासियों के कल्याण को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती है।
UPSC के लिए प्रमुख अवधारणाएँ
- रणनीतिक स्वायत्तता : किसी राष्ट्र द्वारा बाह्य दबाव के बिना स्वतंत्र विदेश नीति के तहत निर्णय लेने की क्षमता।
- बहु-संरेखण: राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने के लिए एक ही समय में कई शक्ति केंद्रों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ना।
- चोकपॉइंट डिप्लोमेसी : भू-राजनीतिक प्रभाव के उपकरण के रूप में रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्गों का उपयोग।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्र. “पश्चिम एशिया में समकालीन भू-राजनीतिक परिवर्तन सैन्य हस्तक्षेपों की सीमाओं को रेखांकित करते हुए, समावेशी क्षेत्रीय सुरक्षा संरचनाओं की आवश्यकता पर बल देते हैं।” खाड़ी देशों, इरान और वैश्विक शक्तियों के बीच विकसित होते संबंधों के संदर्भ में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। भारत को अपने प्रवासियों और ऊर्जा हितों को सुरक्षित करने के लिए, अपनी विदेश नीति को किस प्रकार समायोजित करना चाहिए?
(15 अंक, 250 शब्द)
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