सांसदों की वाक् स्वतंत्रता के अधिकारों की रक्षा

सांसदों की वाक् स्वतंत्रता के अधिकारों की रक्षा 23 Feb 2026

संदर्भ:

हालिया बजट सत्र के दौरान, विपक्षी दल के भाषणों के कुछ हिस्सों को हटाने (expunction) ने संसदीय वाक् स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने की चिंताओं को जन्म दिया है। इसने इस चर्चा को पुनर्जीवित कर दिया है, कि क्या सदन के नियम अनुच्छेद 105 के तहत प्राप्त संरक्षण को कमजोर कर रहे हैं।

संवैधानिक आधार: संसदीय विशेषाधिकार

  • अनुच्छेद 105: यह अनुच्छेद सांसदों को संसदीय विशेषाधिकार के रूप में, विशेष संवैधानिक अधिकार प्रदान करता है, जिससे उन्हें कानूनी परिणामों के भय के बिना सदन में स्वतंत्र रूप से बोलने की अनुमति प्राप्त होती है।
  • उद्देश्य: इन अधिकारों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है, कि विधायिका प्रभावी ढंग से कार्य कर सके और विचारों की निर्बाध अभिव्यक्ति के माध्यम से लोकतंत्र मजबूत हो।
  • पूर्ण नहीं: ये अधिकार सदन के नियमों और स्वयं संविधान में उल्लिखित कुछ उचित प्रतिबंधों के अधीन हैं।
    • उदाहरण: अनुच्छेद 121 सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा करने पर रोक लगाता है, जब तक कि उन्हें हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन न हो।

टिप्पणियों को हटाना और नियम 380:

  • हटाना: यह आधिकारिक संसदीय रिकॉर्ड से अभिव्यक्ति के विशिष्ट शब्दों या हिस्सों को हटाने को संदर्भित करता है। एक बार हटा दिए जाने के बाद, वे आधिकारिक कार्यवाही में दिखाई नहीं देते हैं।
  • नियम 380 (लोकसभा की प्रक्रिया के नियम): यह अध्यक्ष को उन शब्दों को हटाने का अधिकार देता है जो अभद्र, मानहानिकारक या असंसदीय हैं।

दुरुपयोग के संबंध में चिंताएँ:

  • नियम 380 का ‘हथियार’ के रूप में उपयोग: आलोचकों का तर्क है, कि जिस नियम का उद्देश्य विशिष्ट आपत्तिजनक शब्दों को हटाना था, उसका उपयोग विपक्षी भाषणों से ठोस आलोचना को हटाने के लिए किया जा रहा है।
  • अनुच्छेद 105 के साथ तनाव: प्रक्रियात्मक नियमों के माध्यम से विपक्षी भाषणों का व्यवस्थित दमन संवैधानिक विशेषाधिकार के कमजोर होने की चिंता उत्पन्न करता है।
  • न्यायिक सिद्धांत: सर्वोच्च न्यायालय ने माना है, कि प्रक्रियात्मक प्रतिबंध ठोस संवैधानिक अधिकार को ग्रहण (eclipse) नहीं कर सकते। नियम आचरण को विनियमित करते हैं, लेकिन मौलिक विशेषाधिकारों को ओवरराइड नहीं कर सकते।
  • ठोस प्रस्ताव: उदाहरण: हाल ही में एक मौजूदा सदस्य की आजीवन अयोग्यता की माँग करने वाले ठोस प्रस्ताव का उपयोग, जबकि संसद के पास ऐसा संवैधानिक अधिकार नहीं है, राजनीतिक उद्देश्यों के लिए प्रक्रियात्मक उपकरणों के दुरुपयोग को दर्शाता है।
    • ठोस प्रस्ताव एक औपचारिक, स्व-निहित प्रस्ताव है जो सीधे किसी विशिष्ट मामले को संबोधित करता है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य बनाम वर्तमान दृष्टिकोण:

  • पूर्व अभ्यास: संसदीय परंपराओं ने विपक्ष कीई अभिव्यक्ति के अधिकार पर बल दिया, आलोचना को लोकतांत्रिक जवाबदेही के लिए आवश्यक माना।
  • पारस्परिक सहनशीलता का संकट: बहुमत और अल्पमत की एक-दूसरे का सम्मान करने और सहने की क्षमता में कमी देखी गई है। एक स्वस्थ संसदीय लोकतंत्र के लिए आवश्यक है, कि बहुमत शासन करे जबकि अल्पमत आलोचना करे। इस संतुलन का क्षरण विमर्शी लोकतंत्र (deliberative democracy) को खतरे में डालता है।

आगे की राह:

  • अध्यक्ष की तटस्थता: संस्थागत विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए अध्यक्ष को निष्पक्ष कार्य करना चाहिए।
  • अनुच्छेद 105 की प्रधानता: प्रक्रियात्मक नियमों पर संवैधानिक विशेषाधिकार प्रभावी होना चाहिए।
  • नियम 380 का संयमित उपयोग: टिप्पणियों को हटाना केवल स्पष्ट रूप से असंसदीय अभिव्यक्तियों तक सीमित होना चाहिए, न कि ठोस आलोचना तक।
  • लोकतांत्रिक मानदंडों की बहाली: संसदीय लोकतंत्र को बचाने के लिए सरकार और विपक्ष को आपसी सम्मान का पुनर्निर्माण करना चाहिए।

निष्कर्ष

अनुच्छेद 105 संसद में वाक् स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी का प्रतीक है, जो जवाबदेही और विमर्शी लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है। इसलिए, प्रक्रियात्मक नियमों को इस विशेषाधिकार को ओवरराइड किए बिना आचरण को विनियमित करना चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि संसदीय कार्यप्रणाली के भीतर असहमति के प्रावधान सुरक्षित रहें।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. “संसद के भीतर सांसदों की वाक् स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से संरक्षित है, फिर भी यह संस्थागत अनुशासन के अधीन है।” चर्चा कीजिए।

(10 अंक, 150 शब्द)

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