संदर्भ
भारत एक निर्णायक जनसांख्यिकीय मोड़ पर खड़ा है। वर्ष 2040 तक जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) के कम होने की संभावना है। ऐसे में देश के पास अपने कौशल पारिस्थितिकी तंत्र को मांग-आधारित, जवाबदेह और उद्योग-प्रेरित प्रणाली में बदलने का सीमित अवसर है।
भारत में कौशल विकास संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ
- जनसांख्यिकीय लाभांश का क्षरण: हालाँकि भारत के पास वर्त्तमान में विशाल कार्यशील आयु वर्ग (15–59 वर्ष) की जनसंख्या विद्यमान है, लेकिन वह अपने कार्यबल को बाज़ार-प्रासंगिक कौशल से पर्याप्त रूप से सुसज्जित नहीं कर पा रहा है, जबकि जनसांख्यिकीय लाभ धीरे-धीरे कम हो रहा है।
- व्यावसायिक शिक्षा में विद्यमान अंतर: चीन और यूरोपीय संघ में लगभग 50% माध्यमिक विद्यालय के छात्र व्यावसायिक शिक्षा में नामांकित हैं।
- इसके विपरीत, भारत में माध्यमिक स्तर पर केवल 1.3% छात्र ही ऐसे प्रशिक्षण में नामांकित हैं।
- 1990 के दशक के बाद नीतिगत असंतुलन: शिक्षा सुधारों में मुख्य रूप से नामांकन बढ़ाने और डिग्री प्राप्ति को प्राथमिकता दी गई, जबकि व्यावसायिक और तकनीकी मार्ग पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाए।
- दृष्टिकोण और नीतिगत समस्याएँ: राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 का लक्ष्य है कि 50% शिक्षार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा से परिचित कराया जाए, लेकिन संरचित प्रशिक्षण, प्रमाणन और उद्योग से जुड़ाव के बिना यह परिचय रोज़गार योग्य कौशल में परिवर्तित नहीं होता।
- आँकड़ों और वित्तीय पारदर्शिता की कमी: शिक्षा बजट में व्यावसायिक शिक्षा पर होने वाले व्यय का स्पष्ट सार्वजनिक डेटा उपलब्ध नहीं है।
- वैश्विक स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा पर कुल शिक्षा व्यय का लगभग 2% खर्च होता है, जबकि जर्मनी और चीन जैसे देश लगभग 11% तक आवंटित करते हैं।
“नीतिगत चूक” – विफल योजनाएँ और कमजोर जवाबदेही
- प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना (PMIS): वर्ष 2026 के बजट में घोषित इस इंटर्नशिप योजना में स्पष्ट उद्देश्य, मापनीय परिणाम और निगरानी तंत्र का अभाव था।
- निधि उपयोग में कमी: परिणामस्वरूप, आवंटित धन का केवल लगभग 5% ही खर्च हुआ, जो क्रियान्वयन में देरी नहीं बल्कि संरचनात्मक डिजाइन की खामियों को दर्शाता है।
- प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY): ऑडिट निष्कर्ष
- अमान्य लाभार्थी खाते: CAG ऑडिट में पाया गया कि सूचीबद्ध लाभार्थियों में से 94.5% के खाते अमान्य थे, जिससे प्रशिक्षण के वास्तविक क्रियान्वयन पर गंभीर संदेह उत्पन्न होता है।
- रोजगार परिणामों से संबंधित मुद्दे: प्रशिक्षित उम्मीदवारों में से केवल 41% को रोजगार मिला, जो प्रमाणन और रोजगार-योग्यता के बीच अंतर को दर्शाता है।
- गुणवत्ता के बजाय मात्रा पर जोर: अल्पकालिक, लक्ष्य-आधारित प्रशिक्षण पर जोर देने से नामांकन की संख्या बढ़ गई, लेकिन उद्योग-संगत कौशल सुनिश्चित नहीं हो सके।
- आपूर्ति-प्रधान वित्तपोषण: प्रधान मंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) के तहत संस्थानों को प्रत्येक वर्ष ₹10,000+ करोड़ बिना शर्त अनुदान के रूप में प्रदान किए गए। प्रशिक्षण केंद्रों को श्रम बाजार की मांग की परवाह किए बिना भुगतान किया गया और उन पर कोई जवाबदेही नहीं थी, जिससे परिणामों की बजाय मात्रात्मक वृद्धि को प्रोत्साहन मिला।
भारत के कौशल पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार के प्रमुख समाधान
- कौशल ऋण (मांग-पक्षीय वित्तपोषण): सरकार समर्थित कौशल ऋण सीधे छात्रों को दिए जाने चाहिए, न कि प्रशिक्षण संस्थानों को सब्सिडी के रूप में।
- इससे शिक्षार्थियों को क्रय शक्ति प्राप्त होगा तथा संस्थानों को गुणवत्ता, प्लेसमेंट और उद्योग-प्रासंगिकता के आधार पर प्रतिस्पर्धा करना पड़ेगा।
- कौशल वाउचर (विकल्प-आधारित मॉडल): छात्रों को प्रीपेड, पोर्टेबल वाउचर दिए जाएँ जिन्हें AI, हरित प्रौद्योगिकी और विदेशी भाषाओं जैसे उच्च मांग वाले क्षेत्रों में प्रमाणित पाठ्यक्रमों के लिए उपयोग किया जा सके।
- इससे सूचित विकल्प संभव होंगे और प्रशिक्षण को उभरती आर्थिक आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जा सकेगा, जैसा कि सिंगापुर और क्रोएशिया में सफलतापूर्वक लागू किया गया है।
- कौशल शुल्क (नियोक्ता-निर्देशित प्रशिक्षण प्रणाली): संगठित उद्योग पर पेरोल-आधारित कौशल कर लागू किया जाना चाहिए।
- इस कर को उन कंपनियों को वापस किया जाना चाहिए जो अपने कर्मचारियों के लिए संरचित प्रशिक्षण में निवेश करती हैं, जिससे नियोक्ताओं को वर्कफ़ोर्स विकास में जिम्मेदारी लेने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।
- प्रदान किया गया प्रशिक्षण उद्योग की वर्त्तमान मांगों के अनुसार बना रहता है।
- इस मॉडल की सिफारिश भारत की 12वीं पंचवर्षीय योजना (2017) में की गई थी।
- यह मॉडल अब तक 90 से अधिक देशों द्वारा अपनाया जा चुका है, जिनमें जर्मनी, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, दक्षिण अफ्रीका और कई लैटिन अमेरिकी देश शामिल हैं।
- रियल-टाइम श्रम बाजार सूचना: कौशल अंतर अध्ययन हर पाँच वर्ष में प्रकाशित होते हैं, जबकि तब तक उद्योग की मांग बदल चुकी होती है।
- कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय (MSDE) को LinkedIn और com के साथ औपचारिक डेटा-साझाकरण साझेदारी स्थापित करनी चाहिए ताकि कौशल मांग में रीयल-टाइम रुझानों को समझा जा सके।
- इस डेटा को राष्ट्रीय करियर सेवा पोर्टल में एकीकृत किया जाना चाहिए, जिससे समय-समय पर होने वाले सर्वेक्षणों के बजाय सतत, डेटा-आधारित योजना बनाई जा सके।
निष्कर्ष
कौशल 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था की परिभाषित मुद्रा हैं। भारत की जनसांख्यिकीय खिड़की अपनी युवा आबादी को उत्पादक मानव संसाधन में बदलने का ऐतिहासिक लेकिन समय-सीमित अवसर प्रदान करती है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: चर्चा कीजिए कि क्या वर्त्तमान कौशल विकास कार्यक्रम उद्योग और श्रम बाज़ार की आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से संबोधित करते हैं?
(10 अंक, 150 शब्द)
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