संदर्भ:
2025-26 के बजट में, केंद्रीय वित्त मंत्री ने भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता को लगभग 8,180 मेगावाट से बढ़ाकर 2047 तक 100 गीगावाट करने की योजना की घोषणा की। यह 2047 तक ‘विकसित भारत’ और 2070 तक नेट-जीरो (net-zero) उत्सर्जन के भारत के लक्ष्यों के अनुरूप है।
परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 के प्रमुख प्रतिबंध:
- राज्य का एकाधिकार: परमाणु ऊर्जा उत्पादन विशेष रूप से भारत सरकार तक ही सीमित था।
- DAE की भूमिका: परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) को परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के स्वामित्व, निर्माण और संचालन के लिए अधिकृत किया गया था।
- सीमित निजी भागीदारी: इस ढाँचे के तहत परमाणु ऊर्जा उत्पादन में निजी क्षेत्र की भागीदारी की अनुमति नहीं थी।
वर्तमान स्थिति और रणनीतिक महत्त्व:
- निम्न ऊर्जा भागीदारी: परमाणु ऊर्जा वर्तमान में भारत के कुल विद्युत उत्पादन में लगभग 3% का योगदान देती है, जो फ्रांस जैसे देशों की तुलना में अत्यन्त कम है, जहाँ इसकी भागीदारी लगभग 70% है।
- बेसलोड पावर: बिजली की माँग का वह न्यूनतम, निरंतर स्तर जिसे हर समय स्थिर और विश्वसनीय ऊर्जा स्रोतों द्वारा आपूर्ति किया जाना चाहिए।
- सौर और पवन ऊर्जा के विपरीत, जो रुक-रुक कर मिलती हैं, परमाणु ऊर्जा निरंतर उत्पादन के साथ विश्वसनीय बेसलोड बिजली प्रदान करती है।
- परमाणु ऊर्जा संयंत्र भूमि के मामले में अत्यधिक कुशल होते हैं, जिन्हें समान बिजली उत्पादन के लिए सौर या पवन ऊर्जा की तुलना में काफी कम भूमि की आवश्यकता होती है।
- क्षमता लक्ष्य: भारत की स्थापित परमाणु क्षमता लगभग 8,180 मेगावाट है, और सरकार का लक्ष्य 2047 तक इसे बढ़ाकर 100 गीगावाट (1 लाख मेगावाट) करना है।
सामाजिक-आर्थिक और पर्यावरणीय लक्ष्य:
- बढ़ती ऊर्जा माँग: भारत के विकास के लिए परमाणु क्षमता का विस्तार महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्रति व्यक्ति बिजली की खपत लगभग 1,400 kWh है, जो चीन (लगभग 7,000 kWh) और संयुक्त राज्य अमेरिका (लगभग 12,000 kWh) की तुलना में अत्यन्त कम है।
- नेट-जीरो प्रतिबद्धता: परमाणु ऊर्जा 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने के भारत के लक्ष्य का समर्थन करती है, क्योंकि यह न्यूनतम परिचालन उत्सर्जन के साथ निम्न-कार्बन बिजली प्रदान करती है।
शांति (SHANTI) अधिनियम:
- एकाधिकार की समाप्ति: प्रस्तावित शांति (SHANTI – Sustainable Harnessing and Advancement of Nuclear Energy for Transforming India) अधिनियम, परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 को बदलने का प्रयास करता है, जिसने पहले परमाणु ऊर्जा उत्पादन को व्यापक रूप से सरकारी संस्थाओं तक सीमित कर दिया था।
- निजी क्षेत्र की भागीदारी: नया ढाँचा परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण और संचालन में निजी क्षेत्र की भागीदारी की अनुमति देने का प्रस्ताव करता है, जिससे उद्योग जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करते हुए अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को पूर्ण कर सकेंगे।
- दायित्व ढाँचे में सुधार: यह अधिनियम ‘परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010’ में संशोधन का भी प्रस्ताव करता है, जिसने दुर्घटना की स्थिति में उपकरण आपूर्तिकर्ताओं पर दायित्व थोपकर विदेशी निवेश को हतोत्साहित किया था।
विनियामक और परिचालन सुधार:
- विनियामक को वैधानिक दर्जा: परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) को वैधानिक दर्जा देने का प्रस्ताव है, जिससे परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत कार्य करने की बजाय उसकी नियामक स्वतंत्रता मजबूत होगी।
- संशोधित दायित्व ढाँचा: प्रस्तावित सुधार आपूर्तिकर्ता के दायित्व को सीमित करने का प्रयास करते हैं, जिससे विदेशी कंपनियों को भारत में परमाणु तकनीक निवेश तथा आपूर्ति करने के लिए प्रोत्साहन मिल सके।
नवाचार और स्वदेशीकरण:
- स्वदेशी तकनीक के माध्यम से लागत में कमी: आयातित परमाणु रिएक्टर डिजाइन तुलनात्मक रूप से महंगे हैं।
- इसलिए, घरेलू विनिर्माण और स्वदेशी रिएक्टर विकास को मजबूत करने से लागत कम करने, और तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
- स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर्स (SMRs): सरकार SMR को बढ़ावा दे रही है, जो कारखाने में निर्मित रिएक्टर मॉड्यूल होते हैं जिन्हें साइट पर असेंबल किया जाता है, जिससे निर्माण समय और समग्र लागत को कम करने में मदद मिलती है।
- R&D के लिए वित्तीय सहायता: सरकार ने घरेलू परमाणु नवाचार को मजबूत करने के लिए स्वदेशी SMR तकनीकों के विकास के लिए वित्तीय सहायता आवंटित की है।
उन्नत ईंधन रणनीति (थोरियम और HALEU):
- थोरियम क्षमता: भारत के पास विश्व के सबसे बड़े थोरियम भंडारों में से एक है, जो दीर्घकालिक परमाणु ऊर्जा सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण क्षमता प्रदान करता है।
- ईंधन चक्र दक्षता में सुधार: भारत के परमाणु ईंधन चक्र में रिएक्टर दक्षता बढ़ाने और थोरियम संसाधनों के उपयोग में तेजी लाने के लिए HALEU (High-Assay Low-Enriched Uranium) के उपयोग की संभावना तलाशी जा रही है।
100GW परमाणु लक्ष्य प्राप्त करने में चुनौतियाँ:
- उच्च पूंजी लागत: परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में बहुत अधिक अग्रिम निवेश शामिल होता है, और आयातित रिएक्टर डिजाइनों पर निर्भरता से पर्याप्त स्वदेशीकरण के बिना बिजली की दरें अधिक हो सकती हैं।
- परमाणु अपशिष्ट प्रबंधन: रेडियोधर्मी अपशिष्ट का सुरक्षित दीर्घकालिक भंडारण और निपटान एक बड़ी तकनीकी तथा पर्यावरणीय चुनौती बनी हुई है, जिसके लिए विस्तारित अवधि तक सुरक्षित रोकथाम की आवश्यकता होती है।
- सार्वजनिक स्वीकृति: चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसी पिछली दुर्घटनाओं से उपजी परमाणु सुरक्षा को लेकर सार्वजनिक चिंताएँ, परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं की स्वीकृति को प्रभावित करती रहती हैं।
निष्कर्ष
शांति (SHANTI) अधिनियम का सफल कार्यान्वयन एक सुदृढ़ और विश्वसनीय परमाणु ऊर्जा ढाँचा सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट नियमों, पारदर्शी विनियमन और टैरिफ, दायित्व, अपशिष्ट प्रबंधन तथा शासन के प्रभावी तंत्र पर निर्भर करेगा।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. शांति (SHANTI) अधिनियम, 2025 राज्य के एकाधिकार से प्रतिस्पर्धी परमाणु बाजार की ओर एक आदर्श परिवर्तन का प्रतीक है। 2047 तक भारत के 100 गीगावाट परमाणु लक्ष्य को प्राप्त करने की चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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