संदर्भ
भारत के बढ़ते आर्थिक, रणनीतिक तथा राजनयिक कद ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) की स्थायी सदस्यता के लिए माँगों को पुनः तीव्र कर दिया है। समर्थकों का तर्क है, कि समकालीन भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित करने और सुरक्षा परिषद की वैधता को मजबूत करने के लिए इसमें सुधार आवश्यक है।
भारत की सदस्यता योग्यता के कारण
- बढ़ती वैश्विक शक्ति: भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जो मानवता के छठे हिस्से (1/6वें हिस्से) का प्रतिनिधित्व करता है, और विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
- आर्थिक महत्त्व: भारत वैश्विक व्यापार, प्रौद्योगिकी आपूर्ति श्रृंखलाओं, ऊर्जा बाजारों और विकास वित्त में एक प्रमुख भूमिका निभाता है।
- रणनीतिक क्षमता: भारत के पास एक विश्वसनीय परमाणु त्रिकोण, विश्व के सबसे बड़े सशस्त्र बलों में से एक और उत्तरदायी निवारण (responsible deterrence) की नीति है।
- शांति स्थापना में नेतृत्व: भारी संकटों का सामना करने के बावजूद भारत 1948 से संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में से रहा है।
- बहुपक्षवाद का समर्थक: भारत नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था, शांतिपूर्ण विवाद समाधान और संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व वाली पहलों का सक्रिय रूप से समर्थन करता है।
- वैश्विक शासन में नेतृत्व: भारत ने अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), G20 अध्यक्षता और प्रौद्योगिकी शासन जैसी पहलों का नेतृत्व किया है।
- समुद्री सुरक्षा: भारत हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में नौवहन की स्वतंत्रता, UNCLOS और सुरक्षा को बढ़ावा देता है।
- वैश्विक दक्षिण का प्रतिनिधित्व: भारत न्यायसंगत और समावेशी वैश्विक शासन का समर्थन करते हुए, उत्तर-दक्षिण विभाजन के मध्य एक पुल के रूप में कार्य करता है।
यूएनएससी में सुधार की आवश्यकता
- पुरानी संरचना: यूएनएससी वर्तमान भू-राजनीतिक वास्तविकताओं की बजाय अभी भी द्वितीय विश्व युद्ध के बाद (1945) की व्यवस्था को प्रतिबिंबित करना जारी रखता है।
- प्रतिनिधित्व का अभाव : विश्व की अधिकांश आबादी का हिस्सा होने के बावजूद एशिया और अफ्रीका का परिषद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है।
- P5 का प्रभुत्व: पाँच स्थायी सदस्यों (P5 – अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) के बीच वीटो पावर (veto power) का संकेंद्रण न्यायसंगत निर्णय लेने की प्रक्रिया को सीमित करता है।
- अनौपचारिक वीटो: आम सहमति-आधारित प्रक्रियाएँ व्यक्तिगत सदस्यों को निर्णयों को रोकने या देरी करने में सक्षम बनाती हैं।
- वैधता मे कमी: व्यापक प्रतिनिधित्व की कमी यूएनएससी की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता को कमजोर करती है।
भारत की स्थायी सदस्यता के समक्ष विद्यमान चुनौतियाँ
- वीटो विस्तार का विरोध: मौजूदा P5 सदस्य अपने प्रभाव को कम करने वाली किसी भी पहल का विरोध करते हैं।
- आम सहमति की कमी: संयुक्त राष्ट्र के सदस्यों के बीच अलग-अलग दृष्टिकोणों के कारण व्यापक यूएनएससी सुधारों में देरी हुई है।
- क्षेत्रीय विरोध: कुछ पड़ोसी देश और ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ (कॉफी क्लब) ढाँचे के तहत आने वाले देश भारत की उम्मीदवारी का विरोध करते हैं।
- जटिल चार्टर संशोधन: संयुक्त राष्ट्र चार्टर में सुधार के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के दो-तिहाई अनुमोदन और सभी P5 सदस्यों द्वारा अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है।
आगे की राह
- व्यापक आम सहमति निर्मित करना: भारत को विकासशील और विकसित देशों के मध्य अपने समर्थन को और मजबूत करना चाहिए।
- G4 सहयोग को मजबूत करना: भारत को यूएनएससी सुधारों के लिए जापान, जर्मनी और ब्राजील (G4 समूह) के साथ समन्वय जारी रखना चाहिए।
- वैश्विक नेतृत्व का विस्तार: भारत को शांति स्थापना, जलवायु कार्रवाई, विकास और प्रौद्योगिकी शासन में अपना योगदान बढ़ाना चाहिए।
- न्यायसंगत सुधारों को बढ़ावा देना: यूएनएससी के विस्तार को निष्पक्ष क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के साथ, संस्थागत वैधता को बढ़ाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत की आर्थिक क्षमता, रणनीतिक जिम्मेदारी, लोकतांत्रिक साख और बहुपक्षवाद के प्रति प्रतिबद्धता यूएनएससी की स्थायी सदस्यता के लिए एक सुदृढ़ दावेदारी प्रस्तुत करती है। एक विश्वसनीय, प्रतिनिधि और प्रभावी वैश्विक शासन संरचना के लिए सुरक्षा परिषद का व्यापक सुधार अनिवार्य बना हुआ है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. “संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) का विस्तार केवल ऐतिहासिक अन्यायों को सुधारने के बारे में नहीं है, बल्कि एक बहुध्रुवीय विश्व में इसकी परिचालन विश्वसनीयता सुनिश्चित करने से संबंधित है।” स्थायी सीट के लिए भारत के दावे और सुधार प्रक्रिया की संरचनात्मक चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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