संदर्भ
केंद्र सरकार मुख्य रूप से के. कस्तूरीरंगन समिति (2013) की सिफारिशों के आधार पर पश्चिमी घाट के लिए पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) अधिसूचना को अंतिम रूप देने का प्रयास कर रही है।
पश्चिमी घाट के बारे में
- पश्चिमी घाट लगभग 1,500-1,600 किमी लंबे क्षेत्र हैं, जो भारत के पश्चिमी तट के समानांतर गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु में विस्तृत हैं।
- इन्हें यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर स्थल और विश्व के आठ सबसे प्रमुख जैव विविधता हॉटस्पॉट में से एक के रूप में मान्यता प्राप्त है।
- अगस्त्यमाला बायोस्फीयर रिजर्व दक्षिणी पश्चिमी घाट में स्थित है।
- नवीनतम ESA प्रक्रिया मुख्य रूप से कस्तूरीरंगन समिति के ढाँचे पर आधारित है, जिसमें 2024 के छठे मसौदा (draft) अधिसूचना में छह राज्यों में लगभग 56,825.7 वर्ग किमी. क्षेत्र को ESA के रूप में प्रस्तावित किया गया है।
- पश्चिमी घाट से निकलने वाली प्रमुख नदियाँ
- गोदावरी
- कृष्णा
- कावेरी
- पेरियार
पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA)
- पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के तहत अधिसूचित एक क्षेत्र है, जहाँ संवेदनशील पारितंत्र की रक्षा के लिए पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाली गतिविधियों को विनियमित या प्रतिबंधित किया जाता है।
- उद्देश्य
- जैव विविधता तथा पारिस्थितिक अखंडता का संरक्षण करना।
- पर्यावरण क्षरण को रोकना।
- सतत विकास को बढ़ावा देना।
- प्रदूषण फैलाने वाली और उच्च प्रभाव वाली गतिविधियों को विनियमित करना।
विभिन्न समितियों की सिफारिशें
- माधव गाडगिल समिति (2011)
- संपूर्ण पश्चिमी घाट ESA के रूप में: संपूर्ण पश्चिमी घाट को ESA के रूप में अधिसूचित करने की सिफारिश की।
- पारिस्थितिक ज़ोनिंग: पारिस्थितिक संवेदनशीलता के आधार पर ESZ-I, ESZ-II और ESZ-III का प्रस्ताव दिया।
- कठोर संरक्षण: अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में खनन, उत्खनन (quarrying), थर्मल पावर प्लांट और वृहद बांधों पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की।
- के. कस्तूरीरंगन समिति (2013)
- परिदृश्य दृष्टिकोण : घाटों को प्राकृतिक तथा सांस्कृतिक परिदृश्यों में वर्गीकृत किया।
- ESA में कमी: केवल लगभग 60,000 वर्ग किमी. क्षेत्र को ESA के रूप में अधिसूचित करने की सिफारिश की।
- संतुलित ढाँचा: आबादी वाले क्षेत्रों में सतत विकास की अनुमति देते हुए उच्च प्रभाव वाली गतिविधियों को प्रतिबंधित किया।
- MoEFCC का मसौदा अधिसूचना (2014)
- परिष्कृत ESA सीमा: छह राज्यों में 56,825.7 वर्ग किमी को ESA के रूप में प्रस्तावित किया।
- विनियमित गतिविधियाँ: नए खनन, उत्खनन, थर्मल पावर प्लांट और रेड-कैटेगरी के उद्योगों को प्रतिबंधित किया।
- संजय कुमार समिति (2022–2026)
- मानचित्रण विवाद: ग्राम-स्तरीय मानचित्रण के मुद्दों तथा राज्यों की आपत्तियों की जाँच की।
- लचीला कार्यान्वयन: ESA अधिसूचनाओं को राज्यवार चरणबद्ध तरीके से लागू करने की सिफारिश की।
पश्चिमी घाट को संरक्षण की आवश्यकता क्यों है?
- जैव विविधता हॉटस्पॉट: पश्चिमी घाट में स्थानिक (endemic) वनस्पतियों और जीवों के उच्च स्तर के साथ असाधारण जैव विविधता पाई जाती है।
- जल सुरक्षा: ये घाट प्रमुख प्रायद्वीपीय नदियों को बनाए रखते हैं और भूजल को रिचार्ज करते हैं, जिससे लाखों लोगों को सहायता मिलती है।
- जलवायु विनियमन: सघन वन कार्बन का अवशोषण करते हैं (sequester carbon), तापमान को नियंत्रित तथा मानसूनी वर्षा को प्रभावित करते हैं।
- आपदा न्यूनीकरण: स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र भूस्खलन, बाढ़ तथा मृदा के कटाव के जोखिम को कम करता है।
- आजीविका सहायता: यह क्षेत्र महत्त्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र सेवाएँ प्रदान करता है, जो लाखों आजीविकाओं को बनाए रखती हैं।

राज्यों की प्रमुख चिंताएँ
- आजीविका पर प्रभाव: राज्यों को भय है, कि ESA के प्रतिबंधों से कृषि, बागान तथा ग्रामीण आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
- विकास की बाधाएँ: बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं पर प्रतिबंध क्षेत्रीय विकास को धीमा कर सकते हैं।
- औद्योगिक विकास: उद्योगों पर सीमाएँ निवेश और आर्थिक विस्तार को हतोत्साहित कर सकती हैं।
- खनन प्रतिबंध: खनन और उत्खनन पर रोक से रोजगार तथा राज्य के राजस्व में कमी आ सकती है।
- बस्तियों से जुड़ी चिंताएँ: स्थानीय समुदायों को भूमि-उपयोग प्रतिबंधों और संभावित आजीविका के नुकसान का भय है।
- सीमा विवाद: राज्यों ने ESA मानचित्रण और ग्रामीण क्षेत्रों के सीमांकन में अशुद्धियों पर चिंता जताई है।
- संघीय चिंताएँ: राज्य ESA के कार्यान्वयन में अधिक भागीदारी चाहते हैं।
आम सहमति बनना कठिन है, क्यों?
- संरक्षण-विकास की दुविधा: आर्थिक विकास के साथ पारिस्थितिक संरक्षण को संतुलित करना, चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
- केंद्र-राज्य मतभेद: केंद्र और राज्य ESA सीमाओं तथा अनुमत गतिविधियों पर असहमत बने हुए हैं।
- आजीविका की चिंताएँ: समुदायों को भय है, कि ESA नियम आर्थिक अवसरों को प्रतिबंधित कर सकते हैं।
- सीमा की अस्पष्टता: उपग्रह-आधारित मानचित्रण पर विवादों ने ESA को अंतिम रूप देने में देरी की है।
- सीमित प्रोत्साहन: राज्य संरक्षण से जुड़ी लागतों की भरपाई के लिए अधिक वित्तीय सहायता की माँग करते हैं।
आगे की राह
- वैज्ञानिक ESA मानचित्रण: ESA की सीमाएँ पारदर्शी, वैज्ञानिक रूप से मान्य तथा जमीनी स्तर पर सत्यापित (ground-verified) मानचित्रण पर आधारित होनी चाहिए।
- सामुदायिक भागीदारी: स्थानीय समुदायों को संरक्षण और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार होना चाहिए।
- पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए भुगतान: राज्यों और समुदायों को पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के संरक्षण के लिए वित्तीय प्रोत्साहन प्राप्त होना चाहिए।
- सतत आजीविका: संरक्षण को सतत कृषि, पर्यावरण-पर्यटन (eco-tourism) और कृषि-वानिकी को बढ़ावा देना चाहिए।
- विनियमित खनन: खनन और उत्खनन की कड़ाई से निगरानी और पर्यावरणीय रूप से विनियमन किया जाना चाहिए।
- सहकारी संघवाद: केंद्र तथा राज्यों को ESA कार्यान्वयन के लिए एक परामर्शदात्री दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
- परिदृश्य-आधारित योजना : संरक्षण और विकास को परिदृश्य-स्तर की योजना के माध्यम से एकीकृत किया जाना चाहिए।
- जलवायु-अनुकूल विकास: क्षेत्रीय योजना में जलवायु लचीलेपन और आपदा-जोखिम न्यूनीकरण को शामिल किया जाना चाहिए।
निष्कर्ष
भारत की जैव विविधता के संरक्षण, जल सुरक्षा, जलवायु लचीलेपन और सतत विकास को सुनिश्चित करने के लिए पश्चिमी घाट की रक्षा करना अपरिहार्य है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न. गाडगिल से कस्तूरीरंगन तक — पारिस्थितिक शुद्धतावाद (इकोलॉजिकल प्यूरिज्म) से विकासात्मक व्यावहारिकता तक विकास दृष्टिकोण का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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