संदर्भ
हाशिए पर रहने वाले समूहों के लिए न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करने हेतु ‘लोकस स्टैंडाई’ के सिद्धांत को शिथिल करने के लिए 1970 के दशक में जनहित याचिका (PIL) का उदय हुआ। इसने न्यायपालिका को मूल अधिकारों के एक सक्रिय रक्षक के रूप में बदल दिया।
जनहित याचिका (PIL) का संदर्भ
- लोकस स्टैंडाई (Locus Standi) की परिभाषा: ऐतिहासिक रूप से, विधिक प्रणाली “लोकस स्टैंडाई” (खड़े होने का अधिकार) की अवधारणा का पालन करती थी, जहाँ केवल कार्रवाई से सीधे प्रभावित व्यक्ति ही राहत के लिए अदालत का रुख कर सकता था।
- भारत में विकास: 1970 के दशक में, न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती और न्यायमूर्ति कृष्णअय्यर ने इस अवधारणा को उदार बनाया।
- उन्होंने माना, कि भारत में कई गरीब और हाशिए पर रहने वाले लोगों के पास सीधे न्यायालय तक पहुँचने के लिए ज्ञान या संसाधनों की कमी थी।
- जनहित की ओर बदलाव: न्यायपालिका ने आम जनता के हित में याचिका दायर करने के लिए उन व्यक्तियों या समूहों (जैसे- गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं) को अनुमति दी जो सीधे तौर पर किसी मामले में शामिल नहीं थे।
- उदाहरण: ‘हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव बिहार राज्य’ (1979) का मामला एक प्रमुख उदाहरण है, जहाँ एक अधिवक्ता ने उन हजारों कैदियों के लिए याचिका दायर की थी जो अपनी अधिकतम संभव सजा से अधिक समय तक जेल में रहे, क्योंकि उनका परीक्षण (ट्रायल) शुरू ही नहीं हुआ था।
PIL से संबंधित मुद्दे: दुरुपयोग और न्यायिक अतिरेक
- तुच्छ और प्रचार-प्रेरित याचिकाएँ: PIL अक्सर व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभों के लिए दायर की जाती हैं (“एजेंडा-संचालित मुकदमेबाजी”)।
- नीतिगत क्षेत्रों में न्यायिक अतिरेक: न्यायालय कभी-कभी जटिल, बहु-केंद्रित विवादों में हस्तक्षेप करते हैं जिनमें कई हितधारक शामिल होते हैं, जहाँ संस्थागत क्षमता सीमित होती है।
- एम्बुश पीआईएल (Ambush PILs): न्यायिक परिणामों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए जानबूझकर दायर की गई खराब तरीके से तैयार की गई याचिकाएँ।
- कार्यान्वयन की कमी: अदालतें निर्देश तो जारी करती हैं, लेकिन प्रभावी प्रवर्तन सुनिश्चित करने के लिए तंत्र की कमी होती है।
PIL क्षेत्राधिकार को कम करने के खिलाफ तर्क:
- दुरुपयोग के बावजूद, सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ बनी हुई हैं। कई नागरिकों के पास अभी भी अदालतों तक पहुँचने के लिए संसाधनों या जागरूकता की कमी है, जिससे अधिकारों की रक्षा और राज्य की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए PIL अपरिहार्य हो जाती है।
आगे की राह
स्रोत इस बात पर प्रकाश डालते हैं कि जबकि PIL हाशिए पर रहने वाले लोगों के लिए थी, अब इसका उपयोग अक्सर प्रचार, राजनीतिक उद्देश्यों या “एम्बुश PIL” के लिए किया जाता है। इन मुद्दों के समाधान के लिए निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले गए हैं:
- नीति बनाम कानून: PIL का उपयोग यह सुनिश्चित करने के लिए किया जाना चाहिए, कि सरकार मौजूदा कानूनों का पालन करे या कार्यकारी कार्रवाइयों को चुनौती दे, लेकिन उनका उपयोग न्यायपालिका को नई नीतियाँ (जैसे- समान नागरिक संहिता लागू करना) बनाने के लिए बाध्य करने हेतु नहीं किया जाना चाहिए।
- बाध्यता का सिद्धांत : PIL को आदर्श रूप से उन मामलों तक सीमित रखा जाना चाहिए जहाँ सीधे प्रभावित व्यक्ति ‘बाध्यता’ के अधीन हो, जो उन्हें स्वयं अदालत जाने से रोकता है, जैसे कि बंदी प्रत्यक्षीकरण मामलों में (जैसे- अपहरण या अवैध हिरासत)।
- न्यायिक सतर्कता: न्यायपालिका को एजेंडा-संचालित मुकदमेबाजी के प्रति सतर्क रहना चाहिए और उन लोगों पर जुर्माना लगाना जारी रखना चाहिए, जो वास्तविक सार्वजनिक हित की बजाय केवल सुर्खियों के लिए याचिकाएँ दायर करते हैं।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: जनहित याचिका (PIL) का उद्देश्य न्याय का लोकतंत्रीकरण करना था, लेकिन इसके बढ़ते दुरुपयोग ने न्यायिक दक्षता और शक्तियों के पृथक्करण के संबंध में चिंताएँ उत्पन्न कर दी हैं। आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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