संदर्भ
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हरीश राणा बनाम भारत संघ मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति प्रदान की। यह मामला ऐसे व्यक्ति से जुड़ा था जो 13 वर्षों से अधिक समय से स्थायी वेजेटेटिव अवस्था (Permanent Vegetative State) में था।
- न्यायालय ने चिकित्सकीय विशेषज्ञों द्वारा यह पुष्टि किए जाने के बाद कि रोगी के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, जीवन बनाए रखने वाले चिकित्सा उपचार को हटाने की अनुमति प्रदान की है।
इच्छामृत्यु (Euthanasia) के बारे में
- इच्छामृत्यु (Euthanasia): यह शब्द ग्रीक शब्दों “Eu” (अच्छा) और “Thanatos” (मृत्यु) से बना है। इसका अर्थ है पीड़ा से राहत देने के लिए जानबूझकर जीवन समाप्त करना, जिसे अक्सर “दया मृत्यु (Mercy Killing)” के नाम से जाना जाता है।
- सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia): डॉक्टर द्वारा जानबूझकर किसी मरीज के जीवन को समाप्त करने की क्रिया, जैसे घातक इंजेक्शन देना। यह भारत में अवैध घोषित है।
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia): जीवन बनाए रखने वाले उपचार (जैसे वेंटिलेटर या फीडिंग ट्यूब) को हटाना या बंद कर देना, जिससे प्राकृतिक मृत्यु हो सके। यह भारत में कड़े कानूनी प्रावधानों के साथ वैध घोषित है।
- स्थायी वेजेटेटिव अवस्था ( PVS): एक चिकित्सा स्थिति जिसमें रोगी मूल शारीरिक कार्यों के साथ जीवित होता है, लेकिन उसे अपने आस-पास की परिस्थितियों की कोई चेतना या जानकारी नहीं होती।
मृत्यु के अधिकार पर भारत की संवैधानिक यात्रा
- पी. रथिनम मामला (1994): सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) में मरने का अधिकार भी शामिल है।
- ज्ञान कौर (5-सदस्यीय पीठ, 1996): पी. रथिनम के निर्णय को पलट दिया गया। न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 21 में मरने का अधिकार शामिल नहीं है, लेकिन यह मान्यता दी कि “समानता के साथ मरना” आत्महत्या से भिन्न है।
- अरुणा शानबाग मामला (2011): 42 वर्षों तक लगातार वेजेटेटिव अवस्था (PVS) में रहने वाली एक नर्स के मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय की मंजूरी के अधीन निष्क्रिय मृत्यु-सहायता (Passive Euthanasia) को कानूनी मान्यता प्रदान की।
- कॉमन कॉज़ मामला (2018): न्यायालय ने गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार घोषित किया और लिविंग विल (Advance Directive) की वैधता को मान्यता दी।
- सर्वोच्च न्यायालय संशोधन (2023): न्यायालय ने लिविंग विल के लिए मजिस्ट्रेट के काउंटरसिग्नेचर की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया, जिससे प्रक्रिया सरल हो गई।
- हरीश राणा मामला (2025): निष्क्रिय मृत्यु-सहायता पर वर्ष 2018 के ढाँचे का पहला व्यावहारिक कार्यान्वयन चिह्नित किया।
भारत में व्यापक इच्छामृत्यु कानून से संबंधित चुनौतियाँ और आवश्यकता
- परिभाषात्मक अस्पष्टता: टर्मिनल बीमारी और स्थायी वेजेटेटिव अवस्था (PVS) के बीच स्पष्ट चिकित्सा अंतर की कमी के कारण न्यायिक व्याख्याएँ असंगत हो जाती हैं।
- चिकित्सकों के लिए कानूनी सुरक्षा: कानूनी आधार की कमी जीवन समर्थन हटाए जाने पर आत्महत्या के उकसावे से संबंधित प्रावधानों के तहत अभियोजन के डर को जन्म देती है।
- परिवार के निर्णयों में विवाद: एक औपचारिक कानून की आवश्यकता है जो असहमति की स्थिति में यह स्पष्ट रूप से निर्धारित करे कि किसकी सहमति प्राथमिक होगी (पति/पत्नी, माता-पिता, या अन्य रिश्तेदार)।
- नैतिक और दुरुपयोग की चिंताएँ: संपत्ति के लिए दबाव डालने का जोखिम और जीवन को पवित्र मानने वाले धार्मिक दृष्टिकोण नैतिक चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं।
- अपर्याप्त पैलिएटिव केयर: भारत में दर्द प्रबंधन और जीवन के अंतिम चरण की देखभाल सेवाओं की गंभीर कमी है, जिन्हें इच्छामृत्यु व्यवस्था के साथ-साथ मजबूत करना आवश्यक है।
आगे की राह
- लिविंग विल का डिजिटल रजिस्टर: अग्रिम निर्देशों को रिकॉर्ड और आसानी से उपलब्ध कराने के लिए सुरक्षित राष्ट्रीय डेटाबेस का निर्माण किया जाए।
- पैलिएटिव केयर का विस्तार: अस्पतालों में दर्द प्रबंधन और जीवन के अंतिम चरण की देखभाल सेवाओं को बेहतर किया जाए।
- चिकित्सकों के लिए प्रशिक्षण: चिकित्सा पेशेवरों को जीवन के अंतिम निर्णयों के नैतिक, कानूनी और भावनात्मक पहलुओं को संभालने के लिए सक्षम बनाना।
निष्कर्ष
भारत को एक स्पष्ट वैधानिक ढाँचे की आवश्यकता है जो अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार को नैतिक सुरक्षा उपायों, चिकित्सकीय जवाबदेही और मजबूत पैलिएटिव केयर प्रणाली के साथ संतुलित कर सके।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न
प्रश्न: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित ‘जीवन का अधिकार’ स्वाभाविक रूप से ‘गरिमा के साथ मृत्यु के अधिकार’ को भी समाहित करता है। भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) से जुड़ी नैतिक और कानूनी जटिलताओं का परीक्षण कीजिए। साथ ही, सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में पैलिएटिव केयर (Palliative Care) के समावेशन से असाध्य रोगों से पीड़ित मरीजों की लंबी पीड़ा को किस प्रकार कम किया जा सकता है, इस पर चर्चा कीजिए।
(15 अंक, 250 शब्द)
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