वाशिंगटन आम सहमति: प्रभाव और भविष्य

वाशिंगटन आम सहमति: प्रभाव और भविष्य 14 Mar 2026

संदर्भ

वाशिंगटन आम सहमति (WC) उन नीतिगत प्रक्रियाओं के एक समूह को संदर्भित करती है, जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक जैसे संस्थानों द्वारा विकासशील देशों में आर्थिक सुधारों के मार्गदर्शन के लिए, बढ़ावा दिया गया था।

वाशिंगटन आम सहमति की पृष्ठभूमि (1989):

  • 1980 के दशक का संकट: इसकी उत्पत्ति 1973 के तेल संकट के बाद की घटनाओं में निहित हैं, जिससे विकसित अर्थव्यवस्थाओं में वैश्विक मुद्रास्फीति और बढ़ता ब्याज दर संकट उत्पन्न हुआ।
    • इसने मेक्सिको, अर्जेंटीना और ब्राजील जैसे विकासशील देशों में एक गंभीर ऋण संकट उत्पन्न कर दिया, जिन्होंने भारी ऋण लिया था और पुनर्भुगतान लागत बढ़ने पर दिवालियापन के कगार पर पहुँच गए थे।
    • उदाहरण: अर्जेंटीना में मुद्रास्फीति 3000% तक पहुँच गई थी।
  • प्रतिपादन: संकटग्रस्त देशों को IMF और विश्व बैंक से प्राप्त वित्तीय सहायता अक्सर आर्थिक सुधारों से संबंधित होती थी।
    • अर्थशास्त्री जॉन विलियमसन ने बाद में इन व्यापक रूप से समर्थित नीतियों को दस सुधार सिद्धांतों में संक्षिप्त किया, जिन्हें ‘वाशिंगटन आम सहमति’ के रूप में जाना गया।
  • वैचारिक आधार: यह नवउदारवादी (Neoliberal) आर्थिक विचारों पर आधारित था, जिसने उदारीकरण, निजीकरण, राजकोषीय अनुशासन और अर्थव्यवस्था में राज्य के हस्तक्षेप को कम करने पर बल दिया।
    • यह रोनाल्ड रीगन (रीगनोमिक्स) और मार्गरेट थैचर (थैचरवाद) की नीतियों से प्रभावित था।

10-सूत्रीय नीतिगत उपाय

  1. राजकोषीय अनुशासन: बड़े राजकोषीय घाटे से बचना।
  2. सार्वजनिक व्यय का पुनर्गठन: सरकारी व्यय को सीमित करना।
  3. कर सुधार: कर आधार को व्यापक बनाते हुए दरों को कम करना।
  4. बाजार-आधारित ब्याज दरें: ब्याज दरों का उदारीकरण।
  5. विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI): विदेशी पूँजी के खुले प्रवेश को प्रोत्साहित करना।
  6. निजीकरण और विनियंत्रण: बाजार में सरकारी हस्तक्षेप को कम करना।
  7. संपत्ति के अधिकार: स्वामित्व और अनुबंधों के लिए विधिक सुरक्षा सुनिश्चित करना।

वाशिंगटन आम सहमति की विफलताएँ:

  • संस्थागत कमजोरी: इस मॉडल ने मान लिया कि बाजार प्रत्येक स्थान पर कार्य कर सकते हैं, लेकिन मजबूत संस्थानों (प्रभावी न्यायपालिका, नियामक) की आवश्यकता को नजरअंदाज कर दिया।
    • कई विकासशील देशों में, कमजोर संस्थानों के कारण असमानता और धन का संकेंद्रण बढ़ा।
  • औद्योगिक नीति की उपेक्षा: इसने राज्य के नेतृत्व वाली औद्योगिक नीति को हतोत्साहित किया।
    • हालाँकि, WTO के तहत TRIMS और TRIPS जैसे वैश्विक व्यापार नियमों ने विकसित देशों के एकाधिकार की रक्षा की, जिससे विकासशील देशों के लिए अपनी तकनीक विकसित करने की संभावना सीमित हो गई।
  • 1997 का एशियाई वित्तीय संकट: थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसी उदार अर्थव्यवस्थाओं में सट्टा पूँजी प्रवाह के कारण मुद्रा का अवमूल्यन हुआ।
    • अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा सुझाए गए स्थिरीकरण उपायों, जैसे- ब्याज दरों में वृद्धि और सार्वजनिक व्यय में कटौती, ने आर्थिक संकुचन को और तीव्र कर दिया तथा प्रभावित अर्थव्यवस्थाओं में राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ावा दिया।
  • अवज्ञा की सफलता: मलेशिया ने एशियाई संकट (1997) के दौरान IMF के उपायों को खारिज कर दिया और पूँजी पलायन को रोकने के लिए पूंजी नियंत्रण लागू किया, जिससे वह अपने पड़ोसियों की तुलना में तेजी से उबरने में सक्षम हुआ।
  • ऐतिहासिक असंगति: प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं का औद्योगीकरण केवल मुक्त बाज़ारों के माध्यम से नहीं हुआ।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका ने अलेक्जेंडर हैमिल्टन की औद्योगिक नीति का अनुसरण किया।
    • जापान, दक्षिण कोरिया (सैमसंग और हुंडई जैसी कंपनियों को सब्सिडी देकर), ताइवान और चीन ने औद्योगीकरण के लिए राज्य-नेतृत्व वाली, संरक्षणवादी रणनीतियाँ अपनाईं।

भविष्य : उत्तर-वाशिंगटन और बीजिंग आम सहमति

  • उत्तर-वाशिंगटन आम सहमति: जोसेफ स्टिग्लिट्ज़ द्वारा प्रस्तावित, यह सुशासन, जवाबदेही, सामाजिक सुरक्षा जाल (स्वास्थ्य और शिक्षा) पर जोर देता है, तथा बाजार विफलताओं को दूर करने में राज्य की भूमिका को स्वीकार करता है।
  • बीजिंग आम सहमति: यह चीन के विकास मॉडल को संदर्भित करता है, जिसमें राज्य के नेतृत्व वाली वृद्धि, चयनात्मक वैश्वीकरण और सक्रिय औद्योगिक नीति (जैसे: मेड इन चाइना-2025) शामिल है।
  • औद्योगिक नीति की वापसी: यहाँ तक कि अमेरिका भी ‘चिप्स एंड साइंस एक्ट’ (CHIPS Act) और ‘मुद्रास्फीति न्यूनीकरण अधिनियम’ (IRA) जैसे टैरिफ तथा औद्योगिक नीतियों को अपनाकर कुल मुक्त-बाजार से दूर हट गया है।
  • नीतिगत चिंतन में बदलाव: सार्वभौमिक उदारीकरण के पुराने दृष्टिकोण के स्थान पर अब रणनीतिक राष्ट्रीय हितों की रक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है।

निष्कर्ष

वाशिंगटन आम सहमति के कार्यों में गिरावट इस मान्यता को दर्शाती है, कि कोई भी एक आर्थिक मॉडल सभी देशों के लिए उपयुक्त नहीं है। आधुनिक नीतियों को राष्ट्रीय क्षमता और राजनीतिक वास्तविकता के अनुरूप होना चाहिए। इसके अलावा, आधुनिक विश्व को डिजिटल व्यापार, जलवायु अनुकूलन और AI विनियमन जैसी चुनौतियों के समाधान के लिए नए ढाँचे की आवश्यकता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. “वाशिंगटन आम सहमति’ से ‘व्यावहारिक संकलनवाद’ की ओर संक्रमण वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में एक मौलिक परिवर्तन को दर्शाता है, जो मुक्त-बाजार कट्टरपंथ की विफलताओं और भू-राजनीतिक संरक्षणवाद के उदय से प्रेरित है।” भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में राज्य की बदलती भूमिका के संदर्भ में इस कथन का मूल्यांकन कीजिए।

(15 अंक, 250 शब्द)

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