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लैंड पूलिंग: भूमि अधिग्रहण का एक संधारणीय विकल्प

Lokesh Pal July 02, 2026 05:30 6 0

संदर्भ

तीव्र शहरीकरण और बुनियादी ढाँचे के विकास के लिए बड़े भूखंडों की आवश्यकता होती है। पारंपरिक भूमि अधिग्रहण के कारण अक्सर विरोध-प्रदर्शन, मुकदमेबाजी और परियोजनाओं में देरी होती है। ऐसे में ‘लैंड पूलिंग’ (Land Pooling) एक अधिक भागीदारीपूर्ण विकल्प के रूप में उभरा है।

भूमि अधिग्रहण का विरोध क्यों होता है?

  • किसानों के लिए तिहरा नुकसान
    • उत्पादक संपत्तियों (कृषि भूमि) का नुकसान
    • अपर्याप्त मुआवजा
    • भूमि के मूल्य में भविष्य में होने वाली बढ़ोतरी से वंचित होना।

लैंड पूलिंग क्या है?

  • भूमि स्वामी अपनी भूमि स्वेच्छा से एक साझा पूल (common pool) में योगदान करते हैं। सरकार इस पूरी भूमि पर बुनियादी ढाँचे (सड़क, बिजली, पानी आदि) का विकास करती है और विकसित भूमि का एक छोटा लेकिन अत्यधिक मूल्यवान हिस्सा मूल मालिकों को वापस कर देती है, जबकि सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे के लिए आवश्यक भूमि को अपने पास रख लेती है।

लैंड पूलिंग किस प्रकार कार्य करती है?

  1. भूमि स्वामी स्वेच्छा से अपनी भूमि को एक साथ लाते हैं (पूल करते हैं)।
  2. सरकार सड़कों, उपयोगिताओं (utilities) और सार्वजनिक बुनियादी ढाँचे का विकास करती है।
  3. भूमि का एक हिस्सा बुनियादी ढाँचे के लिए उपयोग किया जाता है।
  4. शेष विकसित भूखंड मूल मालिकों को वापस कर दिए जाते हैं।

लाभ

  • किसानों के लिए:
    • उच्च मूल्य वाली विकसित भूमि की प्राप्ति
    • दीर्घकालिक धन का सृजन
    • विस्थापन में कमी
  • सरकार के लिए:
    • परियोजनाओं का तीव्र क्रियान्वयन
    • मुकदमों में कमी
    • बेहतर बुनियादी ढाँचा नियोजन
  • शहरी विकास के लिए:
    • नियोजित शहरी विस्तार
    • भूमि का कुशल उपयोग
    • बेहतर नागरिक अवसंरचना
  • उदाहरण
    • तमिलनाडु: ग्रीनफील्ड बाईपास विकास के लिए प्रस्तावित।
    • अमरावती (आंध्र प्रदेश): राजधानी शहर के विकास के लिए बड़े पैमाने पर लैंड पूलिंग मॉडल को अपनाया गया।

लैंड पूलिंग की चुनौतियाँ

  1. विभिन्न विभागों के मध्य समन्वय की कमी
    • लैंड पूलिंग के लिए राजस्व, शहरी विकास, नियोजन प्राधिकरणों, उपयोगिता एजेंसियों और स्थानीय सरकारों के बीच घनिष्ठ समन्वय की आवश्यकता होती है।
    • प्रशासनिक अलगाव, अतिव्यापी शासनादेशों और नौकरशाही की देरी के कारण परियोजना के क्रियान्वयन तथा अवसंरचनात्मक वितरण की गति धीमी हो सकती है।
  2. कानूनी और नीतिगत सुधारों का अभाव
    • कई राज्यों में लैंड पूलिंग को संचालित करने वाले एक व्यापक कानूनी ढाँचे की कमी है।
    • भूमि के स्वामित्व (titles) में अस्पष्टता, विवाद समाधान तंत्र और विकास नियमों में अनिश्चितता भूमि स्वामियों और कार्यान्वयन संस्थाएँ दोनों के लिए संशय उत्पन्न करती है।
  3. भूमि स्वामियों के बीच विश्वास का निर्माण
    • किसानों में अक्सर भूमि खोने, विकसित भूखंडों की वापसी में देरी और असमान लाभ मिलने का डर रहता है।
    • भूमि अधिग्रहण के पिछले खराब अनुभवों और प्रशासनिक विफलताओं के कारण सरकार के आश्वासनों के प्रति अविश्वास पैदा होता है, जिससे स्वैच्छिक भागीदारी कठिन हो जाती है।
  4. पारदर्शी कार्यान्वयन की कमी
    • स्पष्ट मूल्यांकन विधियों, निष्पक्ष पुनर्वितरण मानदंडों और सार्वजनिक प्रकटीकरण की कमी से पक्षपात तथा भ्रष्टाचार के आरोप लग सकते हैं।
    • बुनियादी ढाँचे के विकास या भूखंड सौंपने में देरी से हितधारकों का भरोसा कम हो सकता है, तथा अन्य विवाद शुरू हो सकते हैं।
  5. बुनियादी ढाँचे के विकास का वित्तपोषण
    • सरकारों को विकसित भूखंडों को वापस करने से पहले सड़कों, जल निकासी, उपयोगिताओं और सामाजिक बुनियादी ढाँचे को विकसित करने के लिए बड़े अग्रिम निवेश की आवश्यकता होती है।
    • धन की कमी परियोजनाओं में देरी तथा लैंड पूलिंग के आकर्षण को कम कर सकती है।
  6. न्यायसंगत लाभ साझाकरण सुनिश्चित करना
    • बड़े भूस्वामियों की तुलना में छोटे और सीमांत भूमि स्वामियों को पूर्ण लाभ कम मिल सकता है। बिना उचित सुरक्षा उपायों के, कमजोर वर्ग दीर्घकालिक आर्थिक लाभों से बाहर हो सकते हैं।
  7. बाजार और माँग के जोखिम
    • लैंड पूलिंग की सफलता विकसित भूमि की मजबूत माँग पर निर्भर करती है। रियल एस्टेट बाजार में मंदी भूमि के मूल्यों को कम कर सकती है, जिससे भूमि स्वामियों तथा सरकार दोनों के लिए लाभ सीमित हो जाता है।

आगे की राह

  1. एक मजबूत कानूनी ढाँचा तैयार करना
    • भूमि योगदान, स्वामित्व अधिकार, विवाद समाधान और समय-सीमा पर स्पष्ट प्रावधानों के साथ राज्य स्तर पर व्यापक लैंड पूलिंग कानून बनाना।
    • स्थानीय स्थितियों के अनुसार लचीलेपन की अनुमति देते हुए विभिन्न राज्यों की नीतियों का मानकीकरण करना।
  2. पारदर्शी मूल्यांकन सुनिश्चित करना
    • भूमि और वापस किए जाने वाले भूखंडों के लिए वैज्ञानिक, बाजार-लिंक्ड और स्वतंत्र मूल्यांकन तंत्र को अपनाना।
    • भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण तथा मूल्यांकन मानदंडों, पुनर्वितरण योजनाओं और परियोजना के चरणों का सार्वजनिक प्रकटीकरण सुनिश्चित करना।
  3. हितधारकों की भागीदारी को मजबूत करना
    • परियोजना कार्यान्वयन से पहले किसानों, निवासी समूहों, स्थानीय निकायों और नागरिक समाज के साथ व्यापक परामर्श करना।
    • शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करना और सम्पूर्ण परियोजना अवधि के दौरान निरंतर संचार बनाए रखना।
  4. संस्थागत क्षमता का निर्माण
    • विशेष प्रशिक्षण, डिजिटल भूमि प्रबंधन प्रणालियों और तकनीकी विशेषज्ञता के माध्यम से शहरी स्थानीय निकायों (ULBs), विकास प्राधिकरणों तथा भूमि प्रबंधन एजेंसियों को मजबूत करना।
    • समर्पित परियोजना प्रबंधन इकाइयों के माध्यम से अंतर-विभागीय समन्वय को बढ़ावा देना।
  5. सफल पायलट परियोजनाओं का प्रदर्शन
    • लैंड पूलिंग के आर्थिक और सामाजिक लाभों को प्रदर्शित करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों में अच्छी तरह से डिजाइन की गई पायलट परियोजनाओं को लागू करना।
    • व्यापक स्तर पर इसे अपनाने को प्रोत्साहित करने के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं और सीखे गए पाठों का दस्तावेजीकरण और प्रसार करना।
  6. समयबद्ध बुनियादी ढाँचा विकास सुनिश्चित करना
    • सड़कों, उपयोगिताओं और सार्वजनिक सुविधाओं के समयबद्ध निर्माण को प्राथमिकता देना, ताकि भूमि स्वामियों को वादे के अनुसार पूरी तरह से बेहतर भूखंड मिल सकें।
    • संसाधनों के एकत्रण के लिए सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPPs) और नवीन वित्तीय तंत्रों का उपयोग करना।
  7. छोटे और सीमांत भूमि स्वामियों का संरक्षण
    • न्यूनतम गारंटीकृत भूखंड आकार, आजीविका सहायता, कौशल विकास और वित्तीय परामर्श सहित विशेष सुरक्षा उपाय शुरू करना। न्यायसंगत लाभ-साझाकरण सुनिश्चित करना, ताकि कमजोर भूमि स्वामियों को भी शहरीकरण का लाभ प्राप्त हो।
  8. प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना
    • लैंड पूलिंग प्रक्रिया के दौरान सटीकता, पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार के लिए जीआईएस (GIS) मैपिंग, डिजिटल भूमि रिकॉर्ड, ड्रोन सर्वेक्षण और ऑनलाइन निगरानी पोर्टलों का उपयोग करना।

महत्त्वपूर्ण शब्दावली

  • लैंड पूलिंग (भूमि समूहन)
  • मूल्य संवर्धन का लाभ उठाना
  • सहभागी शहरी नियोजन
  • दोनों पक्षों के लिए लाभकारी विकास
  • नियोजित शहरीकरण

निष्कर्ष

लैंड पूलिंग विकास लाभों को साझा करके किसानों, सरकारों तथा शहरी नियोजकों के हितों को एक साथ जोड़ती है, जिससे बुनियादी ढाँचे का विस्तार अधिक न्यायसंगत, सतत एवं संधारणीय बनता है।

मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न

प्रश्न. भारत में बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण एक बड़ीबाधा बना हुआ है। परीक्षण कीजिए, कि लैंड पूलिंग किस प्रकार समावेशी शहरी तथा ग्रामीण विकास के लिए एक उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर सकती है।

(15 अंक, 250 शब्द)

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