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Lokesh Pal
July 03, 2026 05:30
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लेख कॉलेजियम प्रणाली पर चर्चा करता है, जो सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए भारत का तंत्र है। यह इस प्रणाली के विकास, इसकी खूबियों, आलोचनाओं और पारदर्शिता तथा जवाबदेही बढ़ाने के लिए आवश्यक सुधारों का परीक्षण करता है।
| कॉलेजियम प्रणाली के लाभ | कॉलेजियम प्रणाली से हानि |
| न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है। | अपारदर्शी कामकाज और सीमित पारदर्शिता। |
| न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका के हस्तक्षेप को कम करता है। | नियुक्ति के निर्णयों के लिए जवाबदेही का अभाव। |
| न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखकर मूल ढाँचा सिद्धांत का समर्थन करता है। | कोई स्पष्ट वैधानिक या संवैधानिक समर्थन नहीं। |
| यह सुनिश्चित करता है कि न्यायाधीश भविष्य के न्यायाधीशों के चयन में केंद्रीय भूमिका निभाएँ, जिससे संस्थागत स्वायत्तता बनी रहे। | भाई-भतीजावाद और “अंकल जज सिंड्रोम” की संभावना। |
| कार्यपालिका के वर्चस्व को रोककर शक्तियों के पृथक्करण की रक्षा करता है। | महिलाओं, हाशिए पर पड़े समुदायों और क्षेत्रों का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व। |
| नियुक्तियों को राजनीतिक विचारों से दूर रखने में मदद करता है। | वस्तुनिष्ठ और मापने योग्य चयन मानदंडों की अनुपस्थिति। |
कॉलेजियम प्रणाली ने न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जो भारत के संवैधानिक लोकतंत्र की आधारशिला है। हालाँकि, अपारदर्शिता, जवाबदेही, विविधता और संस्थागत विश्वसनीयता से जुड़ी चिंताएँ सुधारों की माँग करती हैं। आगे की राह न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करने में नहीं, बल्कि शक्तियों के पृथक्करण के संवैधानिक सिद्धांत को बनाए रखते हुए नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, वस्तुनिष्ठ, समावेशी और जवाबदेह बनाने में निहित है।
मुख्य परीक्षा हेतु अभ्यास प्रश्न:प्रश्न. भारत की कॉलेजियम प्रणाली को अक्सर एक अपूर्ण आवश्यकता के रूप में वर्णित किया जाता है। वर्तमान प्रणाली की कमजोरियों का विश्लेषण कीजिए, तथा न्यायिक स्वतंत्रता के साथ पारदर्शिता को संतुलित करने के लिए न्यायपालिका के भीतर के सुधारों का सुझाव दीजिए। (15 अंक, 250 शब्द) |
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