प्रश्न की मुख्य माँग
- सामाजिक-आर्थिक कारकों की चर्चा कीजिए।
- भौगोलिक कारकों का उल्लेख कीजिए।
- प्रौद्योगिकी एवं नीतिगत हस्तक्षेप का विश्लेषण कीजिए।
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उत्तर
भारत में भूमि सुधारों का उद्देश्य समानता स्थापित करना था, फिर भी ग्रामीण भूमि वितरण अत्यधिक असमान बना हुआ है। यह निरंतर असमानता गहरे सामाजिक-आर्थिक ढाँचों और भौगोलिक कारकों को दर्शाती है, जो समावेशी विकास में बाधा उत्पन्न करते हैं। अतः इस स्थिति के सुधार के लिए लक्षित प्रौद्योगिकी और नीतिगत हस्तक्षेपों की आवश्यकता है।
सामाजिक-आर्थिक कारक
- ऐतिहासिक विरासत: जमींदारी जैसी औपनिवेशिक व्यवस्थाओं ने भूमिपतियों के प्रभुत्व को मजबूत किया, जिससे भूमि पुनर्वितरण की सफलता सीमित रही।
- उदाहरण: अध्ययन दर्शाते हैं कि जमींदारी क्षेत्रों में छोटे किसानों की संख्या कम होने के कारण असमानता 3–4% अधिक है।
- जातिगत असमानता: वंचित वर्ग मुख्यतः भूमिहीन बने हुए हैं, जिससे संरचनात्मक असमानता कायम रहती है।
- उदाहरण: जिन क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों की आबादी अधिक है, वहाँ भूमिहीनता के कारण असमानता अधिक पाई जाती है।
- भूमिहीनता का जाल: बड़ी संख्या में परिवारों के पास भूमि नहीं है, जिससे वे कृषि लाभों से वंचित रह जाते हैं।
- उदाहरण: लगभग 46% ग्रामीण परिवार भूमिहीन हैं।
- खंडित जोतें: छोटे और सीमांत किसान बड़े भूमिपतियों के साथ प्रतिस्पर्द्धा नहीं कर पाते।
- उदाहरण: 1–2 हेक्टेयर भूमि रखने वाले किसानों के पास 48.6% भूमि है, जिससे पैमाने की अर्थव्यवस्था सीमित होती है।
- नीतियों के क्रियान्वयन में कमी: भूमि सीमा और पट्टेदारी सुधारों का कमजोर कार्यान्वयन उनके प्रभाव को कम कर देता है।
- उदाहरण: बड़े भूमिधारकों द्वारा औसतन लगभग 12% ग्राम भूमि पर नियंत्रण बना रहना।
भौगोलिक कारक
- कृषि-जलवायु लाभ: उपजाऊ क्षेत्रों में भूमि का संकेंद्रण प्रायः प्रभावशाली वर्गों के हाथों में हो जाता है।
- बाजार के निकटता: शहरों, सड़कों और रेलमार्गों तक पहुँच भूमि के मूल्य को बढ़ाती है, जिससे भूमि का संकेंद्रण बढ़ता है।
- उदाहरण: शहरों के निकट (10 किमी. के भीतर) स्थित गाँवों में अधिक असमानता देखी जाती है।
- क्षेत्रीय असमानताएँ: विभिन्न राज्यों में भौगोलिक और विकासात्मक अंतर के कारण असमानता के पैटर्न अलग-अलग हैं।
- उदाहरण: पंजाब (73% भूमिहीन) की तुलना में राजस्थान (34%)।
- संस्थागत भौगोलिकता: ऐतिहासिक शासन व्यवस्थाएँ वर्तमान असमानता को प्रभावित करती हैं।
- उदाहरण: रियासती क्षेत्रों में ब्रिटिश-शासित क्षेत्रों की तुलना में 2–3% कम असमानता पाई जाती है।
- अवसंरचना का संकेंद्रण: मंडियों और बैंकों की उपस्थिति भूमि के संकेंद्रण से संबंधित होती है।
- उदाहरण: जिन गाँवों में मंडी/बैंक उपलब्ध हैं, वहाँ अध्ययन के अनुसार अधिक असमानता देखी गई है।
प्रौद्योगिकी एवं नीतिगत हस्तक्षेप
- डिजिटल भूमि अभिलेख: डिजिटलीकरण के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाना और विवादों को कम करना।
- उदाहरण: डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम का उद्देश्य राज्यों में भूमि अभिलेखों का आधुनिकीकरण और एकीकरण करना है।
- भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) एवं उपग्रह मानचित्रण: सटीक मानचित्रण से अतिक्रमण को रोका जा सकता है और अधिशेष भूमि की पहचान की जा सकती है।
- उदाहरण: भूमि मानचित्रण के लिए इसरो के भुवन प्लेटफॉर्म का उपयोग।
- भूमि पट्टा सुधार: पट्टेदारी को वैध बनाकर भूमिहीन किसानों की भूमि तक पहुँच में सुधार।
- उदाहरण: नीति आयोग का मॉडल भूमि पट्टा अधिनियम (2016) सुरक्षित पट्टेदारी को बढ़ावा देता है।
- सीलिंग का प्रवर्तन एवं पुनर्वितरण: अधिशेष भूमि के पुनर्वितरण के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत करना।
- उदाहरण: पश्चिम बंगाल में ‘ऑपरेशन बर्गा’ ने पट्टेदारों की सुरक्षा में सुधार किया।
- डिजिटल कृषि प्लेटफॉर्म: छोटे किसानों के लिए बाजार तक पहुँच और आय में सुधार।
- उदाहरण: ई-नाम (e-NAM) मंडियों को एकीकृत कर मूल्य खोज को बेहतर बनाता है।
निष्कर्ष
एक भविष्य-उन्मुख भारत के लिए आवश्यक है कि भूमि सुधारों को सतत् विकास लक्ष्य 1 (गरीबी उन्मूलन) और सतत् विकास लक्ष्य 10 (असमानताओं में कमी) के साथ समन्वित किया जाए। डिजिटल शासन और समावेशी नीतियों के माध्यम से भूमि तक समान पहुँच सुनिश्चित करते हुए, ग्रामीण आजीविकाओं को सशक्त बनाया जा सकता है और एक न्यायसंगत तथा सतत् कृषि अर्थव्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है।
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