Q. 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' का वास्तविक अर्थ केवल लालफीताशाही को कम करना नहीं, बल्कि नागरिक और राज्य के बीच के संबंध को 'नियंत्रण' से बदलकर 'विश्वास' पर आधारित करना है। भारत में प्रशासनिक नियमों का अत्यधिक अपराधीकरण (Over-criminalization) और अनावश्यक अनुपालन बोझ न केवल आर्थिक क्षमता को बाधित करते हैं, बल्कि उद्यमिता की भावना को भी दबाते हैं। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • अनावश्यक एवं अत्यधिक अपराधीकृत प्रशासनिक नियमों का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव की चर्चा कीजिए।
  • नियमों का महत्त्व समझाइए।
  • आगे की राह सुझाइए।

उत्तर

भारत में ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को अक्सर लालफीताशाही कम करने तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि वास्तविक चुनौती छोटे-छोटे उल्लंघनों के अत्यधिक अपराधीकरण में निहित है। यह अति-नियमन आर्थिक संभावनाओं को प्रभावित करता है और साथ ही नियमों की भूमिका पर भी प्रश्न उठाता है।

मुख्य भाग

अनावश्यक एवं अत्यधिक अपराधीकृत प्रशासनिक नियमों का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

  • न्यायिक बोझ: अत्यधिक अपराधीकरण के कारण न्यायालयों में छोटे-छोटे मामलों की भरमार हो जाती है, जिससे गंभीर आर्थिक मामलों में न्याय में देरी होती है।
    • उदाहरण: लगभग 5 करोड़ लंबित मामलों में बड़ी संख्या छोटे अपराधों से संबंधित है (जन विश्वास संदर्भ)।
  • व्यावसायिक अनिश्चितता: छोटी त्रुटियों पर भी आपराधिक कार्रवाई का भय निवेश और जोखिम लेने की प्रवृत्ति को हतोत्साहित करता है।
    • उदाहरण: दंडात्मक प्रावधानों से “अनिश्चितता और उत्पीड़न” की स्थिति उत्पन्न हुई, जैसा कि पीयूष गोयल ने उल्लेख किया।
  • भ्रष्टाचार का दायरा: प्रवर्तन में विवेकाधिकार भ्रष्टाचार और उत्पीड़न के अवसर उत्पन्न करता है।
    • उदाहरण: एमएसएमई को मामूली अनुपालन त्रुटियों पर दबावपूर्ण निरीक्षणों का सामना करना पड़ता है।
  • अनुपालन लागत: कंपनियाँ उत्पादकता और नवाचार के बजाय कानूनी अनुपालन में समय और संसाधन खर्च करती हैं।
  • अनौपचारिकता को बढ़ावा: अत्यधिक दंडात्मक व्यवस्था औपचारिक अर्थव्यवस्था में शामिल होने से हतोत्साहित करती है, जिससे कर आधार सीमित होता है।
    • उदाहरण: दंडात्मक नगर निगम कार्रवाइयों के भय से सड़क विक्रेता लाइसेंस लेने से बचते हैं।

नियमों का महत्त्व

  • उपभोक्ता संरक्षण: नियम सार्वजनिक हित के लिए उत्पाद सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों को सुनिश्चित करते हैं।
  • बाजार अनुशासन: कानूनी प्रावधान अनुचित प्रथाओं को रोकते हैं और आर्थिक व्यवस्था बनाए रखते हैं।
    • उदाहरण: आयकर अधिनियम, 1961 के तहत सीबीडीटी ने शेल कंपनियों के पंजीकरण रद्द कर कर चोरी पर नियंत्रण किया।
  • सार्वजनिक सुरक्षा: कुछ उल्लंघनों के लिए कड़ी दंडात्मक व्यवस्था आवश्यक होती है, ताकि सामाजिक नुकसान रोका जा सके।
    • उदाहरण: पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने गंभीर वायु प्रदूषण के दौरान एनसीआर में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों को बंद करने का आदेश दिया।
  • समान अवसर: समान नियम विभिन्न कंपनियों और क्षेत्रों के बीच निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा सुनिश्चित करते हैं।
    • उदाहरण: वस्तु एवं सेवा कर परिषद द्वारा एकीकृत कर व्यवस्था (GST, 2017) लागू कर अंतर-राज्यीय कर भिन्नता को समाप्त किया गया।
  • जवाबदेही सुनिश्चित करना: कानून मनमाने प्रशासनिक कार्यों को नियंत्रित करते हैं और विधि के शासन को सुदृढ़ करते हैं।
    • उदाहरण: मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में कड़े दंड प्रावधानों से अनुपालन में सुधार और यातायात उल्लंघनों में कमी आई।

आगे की राह

  • अपराधमुक्तिकरण: छोटे उल्लंघनों के लिए कारावास के बजाय आर्थिक दंड का प्रावधान किया जाए।
    • उदाहरण: जन विश्वास विधेयक में 57 प्रावधानों में कारावास हटाया गया।
  • मामलों की वापसी: गैर-गंभीर लंबित मामलों की समीक्षा कर उन्हें व्यवस्थित रूप से वापस लिया जाए।
    • उदाहरण: डीपीआईआईटी द्वारा विभागों को निम्न मामलों को वापस लेने की सलाह।
  • विश्वास आधारित शासन: इंस्पेक्टर राज से हटकर स्व-प्रमाणन और विश्वास आधारित प्रणाली को अपनाया जाए।
    • उदाहरण: ईज ऑफ डूइंग बिजनेस सुधारों के तहत ऑनलाइन अनुपालन व्यवस्था।
  • स्तरीय दंड व्यवस्था: पहली बार और बार-बार होने वाले उल्लंघनों के बीच अंतर कर अनुपातिक दंड सुनिश्चित किया जाए।
    • उदाहरण: ध्वनि प्रदूषण के पहले उल्लंघन पर चेतावनी, बाद में कड़ी कार्रवाई।
  • राज्य स्तर पर सुधार: राज्यों को भी अपराधमुक्तिकरण उपाय अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।
    • उदाहरण: लगभग 12 राज्यों ने जन विश्वास जैसे सुधार लागू किए हैं।

निष्कर्ष

भारत की आर्थिक क्षमता इस बात पर निर्भर करती है कि वह अनावश्यक और दमनकारी नियामकीय अतिरेक को समाप्त करते हुए आवश्यक सुरक्षा उपायों को बनाए रखे। भय-आधारित अनुपालन से विश्वास-आधारित शासन की ओर परिवर्तन उद्यमिता को प्रोत्साहित कर सकता है, मुकदमेबाजी को कम कर सकता है और एक अधिक सुदृढ़ तथा नवाचार-प्रधान अर्थव्यवस्था का निर्माण कर सकता है।

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