Q. 21वीं सदी की बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में, क्षेत्रीय संघर्ष को व्यापक राष्ट्रीय हितों पर हावी नहीं होने देना चाहिए। हाल ही में अमेरिका-ईरान शांति वार्ताओं में पाकिस्तान की भूमिका के संदर्भ में भारत के कूटनीतिक दृष्टिकोण का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत के राष्ट्रीय हित की चर्चा कीजिए।
  • त्रि-स्तरीय रणनीति  का उल्लेख कीजिए।

उत्तर

उभरती हुई बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की विदेश नीति रणनीतिक स्वायत्तता और व्यावहारिक सहभागिता द्वारा निर्देशित होती है। इस परिप्रेक्ष्य में, विशेषकर पाकिस्तान की मध्यस्थता में अमेरिका–ईरान शांति वार्ता जैसे जटिल भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के मध्य, क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताओं से ऊपर उठकर दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देना आवश्यक हो जाता है।

भारत के राष्ट्रीय हित

  • ऊर्जा सुरक्षा: पश्चिम एशिया में स्थिरता भारत के लिए तेल आपूर्ति की निरंतरता और कीमतों की स्थिरता सुनिश्चित करती है।
    • उदाहरण: ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण ऊर्जा महँगाई और आपूर्ति शृंखला में व्यवधान का जोखिम।
  • प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा: खाड़ी देशों में रहने वाले लाखों भारतीयों की आजीविका क्षेत्रीय शांति पर निर्भर करती है।
    • उदाहरण: संघर्ष बढ़ने पर शरणार्थी प्रवाह और अस्थिरता का खतरा, विशेषकर पाकिस्तान–ईरान की 900 किमी. सीमा के आसपास, जिससे पूरे क्षेत्र पर प्रभाव पड़ सकता है।
  • व्यापार स्थिरता: पश्चिम एशिया भारत के लिए व्यापार मार्गों और आर्थिक संबंधों की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
    • उदाहरण: आपूर्ति शृंखला में बाधा वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारत दोनों को प्रभावित कर सकती है।
  • वैश्विक भूमिका: भारत एक जिम्मेदार शक्ति और वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में अपनी भूमिका को सुदृढ़ करना चाहता है।
  • रणनीतिक संतुलन: अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संबंध बनाए रखना भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को दर्शाता है।
    • उदाहरण: ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंध और अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी भारत को एक संभावित मध्यस्थ के रूप में स्थापित करते हैं।

त्रि-स्तरीय रणनीति

  • शांति का समर्थन: भारत को लगातार तनाव-नियंत्रण और संवाद का समर्थन करना चाहिए तथा वैश्विक दक्षिण के नेता के रूप में शांति का पक्षधर बनना चाहिए।
  • रचनात्मक निगरानी: पाकिस्तान की मध्यस्थता को व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए, न कि उसे तुरंत खारिज करना।
  • परिणाम की स्वीकृति: मध्यस्थता की सफलता का समर्थन किया जाना चाहिए, चाहे मध्यस्थ कोई भी हो।
    • उदाहरण: यदि पाकिस्तान सफल होता है, तब भी भारत को शांति का स्वागत करना चाहिए।
  • शून्य-योग दृष्टिकोण से बचाव: बहुध्रुवीय विश्व में प्रतिस्पर्द्धा-आधारित दृष्टिकोण से बचना आवश्यक है, क्योंकि “शून्य-योग मानसिकता” अब अप्रासंगिक हो चुकी है।
  • वैकल्पिक कूटनीति: यदि मध्यस्थता विफल हो जाती है, तो भारत को हस्तक्षेप के लिए तैयार रहना चाहिए।
    • उदाहरण: अमेरिका–ईरान संबंधों का उपयोग करते हुए भारत एक वैकल्पिक कूटनीतिक मार्ग प्रस्तुत कर सकता है।

निष्कर्ष

बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत को क्षेत्रीय कटुता से ऊपर उठकर रणनीतिक परिपक्वता के साथ कार्य करना होगा। राष्ट्रीय हितों को प्रतिद्वंद्विता से ऊपर रखते हुए, भारत अपनी वैश्विक स्थिति को और सुदृढ़ कर सकता है, जिससे उसकी विदेश नीति में शांति, स्थिरता और व्यावहारिक कूटनीति का मार्गदर्शन सुनिश्चित हो सके।

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