Q. आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति, जिसमें अंतर-क्षेत्रीय प्रभाव शामिल हैं, भारत के लिए एक मजबूत समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता को अनिवार्य बनाती है। INS अरिदमन को कमीशन किया जाना और हिंद महासागर क्षेत्र की बदलती भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के आलोक में इस कथन का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति का वर्णन कीजिए।
  • समुद्र-आधारित प्रतिरोधक क्षमता का महत्त्व समझाइए।
  • संबद्ध चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।

उत्तर

INS अरिदमन का कमीशन होना भारत की बदलती युद्ध प्रकृति के प्रति प्रतिक्रिया को दर्शाता है, जहाँ बहु-क्षेत्रीय खतरों के बीच एक विश्वसनीय द्वितीय प्रहार क्षमता की आवश्यकता बढ़ गई है। इस संदर्भ में, समुद्र-आधारित परमाणु प्रतिरोधक क्षमता भारतीय महासागर क्षेत्र में रणनीतिक स्थिरता का एक महत्त्वपूर्ण आधार बन गई है।

आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति

  • बहु-क्षेत्रीय खतरे: अब युद्ध केवल भूमि तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्र, वायु, साइबर और अंतरिक्ष तक विस्तारित हो चुका है।
  • गुप्त युद्ध: युद्ध में अब साधनों की प्रतिरोधक क्षमता और अदृश्यता पर अधिक जोर है।
    • उदाहरण: आईएनएस अरिहंत जैसी परमाणु पनडुब्बियाँ का संचालन अधोजलीय होता है।
  • सटीक प्रहार: उन्नत मिसाइल प्रणालियाँ लंबी दूरी तक सटीक लक्ष्य साधने में सक्षम हैं।
    • उदाहरण: अरिदमन में K-4/K-5 परमाणु-सक्षम मिसाइलें ले जाने की क्षमता है, जिनकी मारक दूरी अधिक है।
  • निरंतर प्रतिरोधक क्षमता: अब केवल समय-समय पर तैनाती के बजाय 24×7 तत्परता आवश्यक हो गई है।
    • उदाहरण: समुद्र-आधारित संसाधन लगातार गश्त के माध्यम से स्थायी प्रतिरोधक क्षमता सुनिश्चित करते हैं।
  • भू-राजनीतिक परिवर्तन: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा रणनीतिक अनिश्चितता को बढ़ा रही है।
    • उदाहरण: हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति मजबूत प्रतिरोधक क्षमता की आवश्यकता को दर्शाती है।

आधुनिक युद्ध की बदलती प्रकृति

  • बहु-क्षेत्रीय खतरे: अब युद्ध केवल भूमि तक सीमित नहीं है, बल्कि समुद्र, वायु, साइबर और अंतरिक्ष तक विस्तारित हो चुका है।
  • गुप्त युद्ध: युद्ध में अब साधनों की जीवित रहने की क्षमता और अदृश्यता पर अधिक जोर है।
    • उदाहरण: आईएनएस अरिहंत जैसी परमाणु पनडुब्बियाँ पानी के भीतर बिना पता चले संचालन करती हैं।
  • सटीक प्रहार: उन्नत मिसाइल प्रणालियाँ लंबी दूरी तक सटीक लक्ष्य साधने में सक्षम हैं।
    • उदाहरण: अरिदमन में K-4/K-5 परमाणु-सक्षम मिसाइलें ले जाने की क्षमता है, जिनकी मारक दूरी अधिक है।
  • निरंतर प्रतिरोधक क्षमता: अब केवल समय-समय पर तैनाती के बजाय 24×7 तत्परता आवश्यक हो गई है।
    • उदाहरण: समुद्र-आधारित संसाधन लगातार गश्त के माध्यम से स्थायी प्रतिरोधक क्षमता सुनिश्चित करते हैं।
  • भू-राजनीतिक परिवर्तन: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा रणनीतिक अनिश्चितता को बढ़ा रही है।
    • उदाहरण: हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती नौसैनिक उपस्थिति मजबूत प्रतिरोधक क्षमता की आवश्यकता को दर्शाती है।

संबद्ध चुनौतियाँ

  • उच्च पूँजी और जीवन-चक्र लागत: परमाणु-संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियाँ (SSBNs) अत्यधिक प्रारंभिक निवेश और दीर्घकालिक रखरखाव लागत से जुड़ी होती हैं।
    • उदाहरण: अरिहंत-श्रेणी पनडुब्बी कार्यक्रम में लंबी अवधि, उच्च अनुसंधान तथा विकास लागत एवं निरंतर उन्नयन की आवश्यकता देखी गई है।
  • प्रौद्योगिकी संबंधी सीमाएँ: छिपने, प्रणोदन और ध्वनि-नियंत्रण (quieting) जैसी स्वदेशी क्षमताएँ अभी विकसित हो रही हैं।
  • नियंत्रण एवं संचार की चुनौती: पानी के भीतर तैनात पनडुब्बियों के साथ सुरक्षित और वास्तविक समय में संचार बनाए रखना जटिल होता है।
  • क्षेत्रीय हथियार प्रतिस्पर्द्धा का जोखिम: मजबूत प्रतिरोधक क्षमता विरोधी देशों, विशेषकर चीन को जवाबी कदम उठाने के लिए प्रेरित कर सकती है, जिससे प्रतिस्पर्द्धा बढ़ सकती है।
  • संचालन एवं सुरक्षा जोखिम: समुद्र में परमाणु हथियारों का प्रबंधन दुर्घटना, विकिरण और सुरक्षा से जुड़े जोखिम उत्पन्न करता है।
    • उदाहरण: पनडुब्बियों पर तैनात परमाणु-सुसज्जित बैलिस्टिक मिसाइलों (SLBMs) के संचालन के लिए अत्यंत कड़े सुरक्षा और विफलता-रोधी प्रोटोकॉल की आवश्यकता होती है।

निष्कर्ष

यद्यपि समुद्र-आधारित प्रतिरोधक क्षमता भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और स्थिरता को सुदृढ़ करती है, परंतु इसे बनाए रखने के लिए प्रौद्योगिकी उन्नयन, मजबूत नियंत्रण एवं संचार तंत्र तथा कूटनीतिक संतुलन आवश्यक है, ताकि प्रतिरोधक क्षमता विश्वसनीय बनी रहे एवं क्षेत्र में अस्थिरता को बढ़ावा दिए बिना संतुलन कायम रखा जा सके।

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