Q. जलवायु परिवर्तन न केवल एक पर्यावरणीय चुनौती है, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक कानूनी और शासन संबंधी चुनौती भी है। जीवाश्म ईंधन शासन, जलवायु प्रवासन और समुद्री सीमाओं के संदर्भ में चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • जीवाश्म ईंधन शासन: जलवायु परिवर्तन एक विधिक और शासन संबंधी चुनौती के रूप में
  • जलवायु प्रवासन: जलवायु परिवर्तन एक विधिक और शासन संबंधी चुनौती के रूप में
  • समुद्री सीमाएँ: जलवायु परिवर्तन एक विधिक और शासन संबंधी चुनौती के रूप में

उत्तर

जलवायु परिवर्तन अब केवल पारिस्थितिकी तंत्रों को ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून और शासन की मूल संरचनाओं को भी चुनौती दे रहा है। बढ़ते तापमान, समुद्र-स्तर में वृद्धि और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता संप्रभुता, प्रवासन और समुद्री अधिकारों से जुड़े जटिल विधिक प्रश्न उत्पन्न कर रहे हैं, जिससे वैश्विक संस्थाओं को राज्यों और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को नियंत्रित करने वाले स्थापित मानकों और ढाँचों पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है।

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जलवायु परिवर्तन एक विधिक और शासन संबंधी चुनौती के रूप में: जीवाश्म ईंधन शासन

  • संसाधन संप्रभुता के साथ संघर्ष: अंतरराष्ट्रीय कानून राज्यों को अपने प्राकृतिक संसाधनों के दोहन का अधिकार देता है, किंतु जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जीवाश्म ईंधन के दोहन को सीमित करना आवश्यक हो जाता है।
  • जीवाश्म ईंधन अप्रसार मानकों का उभरना: वैश्विक तापमान लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जीवाश्म ईंधनों को भूमिगत ही बनाए रखने हेतु नए विधिक ढाँचों की आवश्यकता उभर रही है।
    • उदाहरण: नए जीवाश्म ईंधन अन्वेषण को सीमित करने के लिए जीवाश्म ईंधन अप्रसार संधि का प्रस्ताव।
  • विकासशील देशों के लिए समानता संबंधी चिंताएँ: जीवाश्म ईंधनों पर प्रतिबंध संसाधन-निर्भर देशों के विकास अधिकारों को चुनौती देते हैं।
    • उदाहरण: संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय की वार्ताओं में विकासशील देश वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की माँग करते हैं।
  • जलवायु वित्त और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की आवश्यकता: विधिक प्रतिबद्धताओं को उत्सर्जन में कमी और विकासात्मक समानता के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
    • उदाहरण: पेरिस समझौते के अंतर्गत वित्तीय सहायता और स्वच्छ प्रौद्योगिकी साझा करने पर बल दिया गया है।
  • ऊर्जा शासन मानकों का पुनर्परिभाषण: अंतरराष्ट्रीय कानून को जीवाश्म ईंधन के दोहन और वैश्विक कार्बन बजट को विनियमित करने के लिए नए नियम विकसित करने पड़ सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन एक विधिक और शासन संबंधी चुनौती के रूप में: जलवायु प्रवासन

  •  जलवायु शरणार्थियों की विधिक मान्यता का अभाव: अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी कानून जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाले विस्थापन को मान्यता नहीं देता है।
    उदाहरण: वर्ष 1951 शरणार्थी अभिसमय केवल उत्पीड़न से भागने वाले लोगों को संरक्षण प्रदान करता है।
  • राज्य संरक्षण और नागरिकता अधिकारों का संभावित ह्रास: जलवायु परिवर्तन के कारण विस्थापित आबादी अपने राज्य से जुड़े कानूनी संरक्षण और नागरिकता संबंधी लाभों को खोने के जोखिम में पड़ सकती है।
    • उदाहरण: समुद्र स्तर में वृद्धि छोटे द्वीपीय देशों की जनसंख्या के लिए राज्य संरक्षण तंत्र को खतरे में डाल रही है।
  • समर्पित अंतरराष्ट्रीय विधिक ढाँचे की आवश्यकता: विशेषज्ञ जलवायु-जनित विस्थापन से निपटने के लिए नए अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल या विधिक व्यवस्था की आवश्यकता पर बल देते हैं।
  • जलवायु शासन मंचों की संस्थागत भूमिका: वैश्विक जलवायु मंचों को पर्यावरणीय परिवर्तन से जुड़े प्रवासन के मुद्दों को भी संबोधित करना पड़ सकता है।
  • पुनर्वास में समानता और उत्तरदायित्व का प्रश्न: जलवायु प्रवासन यह प्रश्न उठाता है कि उत्सर्जन के लिए अधिक जिम्मेदार देशों को पुनर्वास और सहायता में अधिक दायित्व निभाना चाहिए या नहीं। 

जलवायु परिवर्तन एक विधिक और शासन संबंधी चुनौती के रूप में: समुद्री सीमाएँ

  • समुद्र स्तर वृद्धि से तटीय आधार रेखाओं पर प्रभाव: समुद्र के स्तर में वृद्धि उन विधिक आधार रेखाओं को प्रभावित कर सकती है, जिनके आधार पर समुद्री क्षेत्रों का निर्धारण किया जाता है।
    • उदाहरण: समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय के अंतर्गत समुद्री अधिकार तटीय आधार रेखाओं पर निर्भर करते हैं।
  • समुद्री क्षेत्रों और संसाधनों पर प्रभाव: आधार रेखाओं में परिवर्तन से प्रादेशिक समुद्र, विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र और महाद्वीपीय शेल्फ जैसे समुद्री क्षेत्रों की सीमाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
    • उदाहरण: इस अभिसमय के अंतर्गत निर्धारित विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के अधिकार तटरेखाओं के क्षरण के साथ परिवर्तित हो सकते हैं।
  • स्थिर और परिवर्तनीय आधार रेखाओं के बीच बहस: राज्यों के बीच यह मतभेद है कि आधार रेखाएँ स्थिर रहनी चाहिए या बदलती तटरेखाओं के साथ परिवर्तित होनी चाहिए।
  • छोटे द्वीपीय राज्यों की संप्रभुता की रक्षा: समुद्र-स्तर में वृद्धि इन राज्यों की क्षेत्रीय अखंडता और समुद्री अधिकारों को खतरे में डाल सकती है।
  • अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून की पुनर्व्याख्या की आवश्यकता: जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न भौगोलिक परिवर्तनों को संबोधित करने के लिए मौजूदा विधिक ढाँचों की पुनर्व्याख्या आवश्यक हो सकती है।
    • उदाहरण: इस अभिसमय के प्रावधानों की नई व्याख्या कर स्थायी आधार रेखाओं की अवधारणा पर विचार किया जा सकता है।

निष्कर्ष

जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल पर्यावरणीय नीतियों में सुधार पर्याप्त नहीं है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय विधिक ढाँचों में भी व्यापक सुधार आवश्यक है। वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करना, जलवायु प्रवासन के लिए नए विधिक साधनों का निर्माण, जीवाश्म ईंधन से न्यायसंगत संक्रमण सुनिश्चित करना तथा समुद्री कानून को परिवर्तित परिस्थितियों के अनुरूप ढालना अत्यंत आवश्यक है। इससे तीव्रता से बदलती जलवायु परिस्थितियों में न्याय, संप्रभुता और वैश्विक स्थिरता की रक्षा की जा सकेगी।

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