Q. क्या आपको लगता है कि भारत का संविधान शक्तियों के पूर्ण पृथक्करण के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता, बल्कि 'नियंत्रण और संतुलन' के सिद्धांत पर आधारित है? स्पष्ट कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • स्पष्ट कीजिए कि भारत का संविधान शक्तियों के पूर्ण पृथक्करण के सिद्धांत को स्वीकार नहीं करता, बल्कि ‘नियंत्रण और संतुलन’ के सिद्धांत पर आधारित है। 
  • वर्णन कीजिए कि यह कुछ मामलों में शक्तियों के पूर्ण पृथक्करण के सिद्धांत को कैसे स्वीकार करता है।

उत्तर

भारतीय संविधान शासन की ऐसी व्यवस्था स्थापित करता है, जिसमें विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच कठोर पृथक्करण के बजाय नियंत्रण एवं संतुलन का सिद्धांत प्रमुख है। यह अनुच्छेद-50 और अनुच्छेद-74 जैसे प्रावधानों के माध्यम से संस्थागत उत्तरदायित्व सुनिश्चित करते हुए निरंकुश प्रवृत्तियों को रोकता है।

भारतीय संविधान में शक्तियों का कठोर पृथक्करण नहीं है

  • कार्यपालिका और विधायिका का समन्वय: अनुच्छेद-75(3) के तहत मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है, जो शक्तियों के अतिक्रमण को दर्शाता है।
    • उदाहरण: प्रधानमंत्री और मंत्री संसद के सदस्य होते हैं।
  • कार्यपालिका द्वारा विधायी कार्य: अनुच्छेद-123 के अंतर्गत अध्यादेश जारी करने की शक्ति कार्यपालिका को विधायी कार्य करने की अनुमति देती है, जब संसद सत्र में न हो।
    • उदाहरण: डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987) में अध्यादेशों के पुनःप्रख्यापन पर प्रश्न उठाया गया।
  • विधायिका द्वारा न्यायिक कार्य: संसद न्यायाधीशों को महाभियोग के माध्यम से पद से हटा सकती है (अनुच्छेद-124(4) और 217)।
    • उदाहरण: न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी के विरुद्ध वर्ष 1993 में कार्यवाही।
  • न्यायिक पुनरावलोकन: न्यायपालिका अनुच्छेद-13, 32 और 226 के अंतर्गत कानूनों को असंवैधानिक घोषित कर सकती है।
    • उदाहरण: केशवानंद भारती (1973) में मूल संरचना सिद्धांत का विकास।
  • न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका की भूमिका: अनुच्छेद-124 और 217 के तहत नियुक्तियों में कार्यपालिका की भागीदारी होती है।
    • उदाहरण: द्वितीय न्यायाधीश प्रकरण (1993) के माध्यम से कॉलेजियम प्रणाली का विकास।
  • अधिकरण प्रणाली: कार्यपालिका के नियंत्रण में अधिकरण अर्द्ध-न्यायिक कार्य करते हैं जिससे शक्तियों का स्पष्ट पृथक्करण धुंधला होता है।
    • उदाहरण: मद्रास बार एसोसिएशन (2014) में अधिकरणों की स्वतंत्रता पर बल दिया गया।

नियंत्रण एवं संतुलन पर आधारित संविधान

  • विधायिका और कार्यपालिका पर न्यायिक नियंत्रण: न्यायिक पुनरावलोकन यह सुनिश्चित करता है कि कानून संविधान के अनुरूप हों।
    • उदाहरण: मिनर्वा मिल्स (1980) में मूल संरचना के विरुद्ध संशोधनों को निरस्त किया गया।
  • कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण: प्रश्नकाल, अविश्वास प्रस्ताव जैसे साधनों के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित की जाती है।
    • उदाहरण: वर्ष 1999 में अविश्वास प्रस्ताव के कारण वाजपेयी सरकार एक मत से गिर गई।
  • राष्ट्रपति की स्वीकृति एक संवैधानिक सुरक्षा: अनुच्छेद-111 के अंतर्गत राष्ट्रपति विधेयक को पुनर्विचार हेतु लौटा सकते हैं।
    • उदाहरण: वर्ष 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट’ विधेयक लौटाया।
  • महाभियोग और पद से हटाने की व्यवस्था: विधायिका राष्ट्रपति (अनुच्छेद-61) और न्यायाधीशों [अनुच्छेद-124(4)] को हटा सकती है।
    • उदाहरण: वर्ष 2018 में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया, यद्यपि बाद में वापस ले लिया गया।
  • कार्यपालिका पर न्यायिक नियंत्रण: न्यायालय अनुच्छेद-14 के अंतर्गत कार्यपालिका के निर्णयों की मनमानी की जाँच करते हैं।
    • उदाहरण: मेनका गांधी (1978) में विधि की प्रक्रिया की व्यापक व्याख्या की गई।
  • संघीय नियंत्रण: सातवीं अनुसूची के तहत विधायी शक्तियों का वितरण सत्ता के केंद्रीकरण को रोकता है।
    • उदाहरण: वस्तु एवं सेवा कर से संबंधित संवैधानिक संशोधन के लिए राज्यों की आधी विधानसभाओं की स्वीकृति आवश्यक थी।

निष्कर्ष

शक्तियों का कठोर पृथक्करण गतिरोध उत्पन्न कर सकता है, जबकि नियंत्रण एवं संतुलन उत्तरदायित्व सुनिश्चित करते हैं। न्यायिक स्वतंत्रता, संसदीय निगरानी और कार्यपालिका की जवाबदेही को सुदृढ़ करना एक सशक्त और लचीले लोकतंत्र के निर्माण में सहायक होगा। 

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