प्रश्न की मुख्य माँग
- राजकोषीय स्थिरता और ऋण अनुशासन से जुड़ी चिंताओं का विश्लेषण कीजिए।
- किसानों की समस्याओं के समाधान में कृषि ऋण माफी की प्रभावशीलता का आकलन कीजिए।
- टिकाऊ कृषि आय सुरक्षा के लिए वैकल्पिक नीतिगत उपायों का सुझाव दीजिए।
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उत्तर
कृषि ऋण माफी का उपयोग अक्सर राज्य सरकारों द्वारा किसानों की संकटपूर्ण स्थिति को कम करने के लिए किया जाता है। हालाँकि, इसकी राजकोषीय स्थिरता और ऋण अनुशासन पर प्रभाव को लेकर गंभीर चिंताएँ उठती रही हैं। हाल ही में महाराष्ट्र सरकार द्वारा घोषित ऋण माफी ने किसानों की आय को दीर्घकालिक रूप से सुरक्षित करने में इसकी प्रभावशीलता पर बहस को फिर से तेज कर दिया है।
राजकोषीय स्थिरता और ऋण अनुशासन से जुड़ी चिंताएँ
- राज्यों पर भारी राजकोषीय बोझ: बड़ी ऋण माफी योजनाएँ उत्पादक कृषि निवेशों से संसाधनों को हटाकर वित्तीय दबाव बढ़ा देती हैं।
- उदाहरण: महाराष्ट्र ने लगभग ₹35,000 करोड़ की कृषि ऋण माफी की घोषणा की, जिसमें ऋण न चुकाने वाले किसानों के साथ-साथ नियमित भुगतान करने वालों के लिए प्रोत्साहन भी शामिल है।
- ऋण अनुशासन का कमजोर होना: ऋण माफी की आशा से कुछ उधारकर्ता जानबूझकर ऋण चुकाने में चूक कर सकते हैं।
- उदाहरण: भारतीय रिजर्व बैंक ने चेतावनी दी है कि ऋण माफी ग्रामीण बैंकिंग में क्रेडिट संस्कृति को कमजोर कर सकती है।
- संस्थागत ऋण पर प्रतिकूल प्रभाव: भुगतान की अनिश्चितता के कारण बैंक किसानों को नया ऋण देने में अधिक सतर्क हो सकते हैं।
- कृषि संकट से प्रभावित सभी किसानों तक पहुँच न होना: कई छोटे और बटाईदार किसान अनौपचारिक साहूकारों पर निर्भर होते हैं, इसलिए वे ऋण माफी योजनाओं के दायरे से बाहर रह जाते हैं।
- उदाहरण: महाराष्ट्र में 1.6 करोड़ से अधिक किसान हैं, लेकिन इस योजना के लिए लगभग 30 लाख किसानों की ही पहचान की गई।
- राजकोषीय प्राथमिकताओं में विकृति: बड़ी ऋण माफी योजनाओं पर अधिक खर्च होने से सिंचाई, अवसंरचना और जोखिम प्रबंधन जैसे दीर्घकालिक निवेशों के लिए संसाधन कम हो जाते हैं।
किसानों की समस्याओं के समाधान में कृषि ऋण माफी की प्रभावशीलता
- ऋण बोझ से तात्कालिक राहत: ऋण माफी से कर्ज में डूबे किसानों को अल्पकालिक राहत मिलती है, खासकर उन किसानों को जो भुगतान के दबाव का सामना कर रहे होते हैं।
- उदाहरण: महाराष्ट्र की योजना में ऋण न चुकाने वाले किसानों के लिए ऋण माफी तथा नियमित भुगतान करने वाले किसानों के लिए ₹50,000 का प्रोत्साहन शामिल है।
- तरलता में अस्थायी सुधार: ऋण राहत से किसानों की बकाया देनदारियाँ कम होती हैं, जिससे वे दोबारा कृषि गतिविधियाँ शुरू कर सकते हैं।
- कृषि संकट के प्रति राजनीतिक प्रतिक्रिया: सरकारें अक्सर किसान आंदोलनों और ग्रामीण संकट के प्रति त्वरित प्रतिक्रिया देने के लिए ऋण माफी का उपयोग करती हैं, विशेषकर चुनावों के आसपास।
- संरचनात्मक समस्याओं पर सीमित प्रभाव: ऋण माफी कम उत्पादकता, मूल्य अस्थिरता और जलवायु जोखिम जैसी मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं करती।
- उदाहरण: भारतीय रिजर्व बैंक ने कहा है कि ऋण माफी किसानों की आय से जुड़े जोखिमों का “संपूर्ण समाधान” नहीं है।
- किसानों के बीच असमान लाभ: जो किसान अनौपचारिक स्रोतों से ऋण लेते हैं या जिनके पास संस्थागत ऋण नहीं होता, उन्हें इस योजना से कम लाभ मिलता है।
- उदाहरण: बटाईदार और पट्टेदार किसान अक्सर ऋण माफी योजनाओं से बाहर रह जाते हैं।
टिकाऊ कृषि आय सुरक्षा के लिए वैकल्पिक नीतिगत उपाय
- फसल बीमा को मजबूत करना: मजबूत जोखिम-निवारण प्रणालियाँ किसानों को फसल विफलता और जलवायु संबंधी झटकों से सुरक्षा प्रदान कर सकती हैं।
- उदाहरण: प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का विस्तार।
- आय सहायता तंत्र: प्रत्यक्ष आय हस्तांतरण किसानों की आय को स्थिर करने में मदद कर सकता है, बिना ऋण बाजार को विकृत किए।
- उदाहरण: पीएम-किसान योजना के तहत पात्र किसानों को प्रति वर्ष ₹6,000 की सहायता दी जाती है।
- कृषि उत्पादकता में सुधार: सिंचाई, प्रौद्योगिकी और कृषि विस्तार सेवाओं में निवेश से दीर्घकालिक रूप से किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है।
- बाजार तक पहुँच और मूल्य समर्थन को मजबूत करना: बेहतर बाजार संपर्क और उचित मूल्य तंत्र आय में अस्थिरता को कम कर सकते हैं।
- उदाहरण: ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार) मंच का विस्तार।
- संस्थागत ऋण तक पहुँच का विस्तार: सस्ती और सुलभ ऋण व्यवस्था किसानों की अनौपचारिक साहूकारों पर निर्भरता कम करती है।
- उदाहरण: किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) योजना का विस्तार।
निष्कर्ष
यद्यपि कृषि ऋण माफी किसानों को अल्पकालिक राहत प्रदान करती है, लेकिन यह कृषि क्षेत्र में आवश्यक संरचनात्मक सुधारों का विकल्प नहीं बन सकती। एक टिकाऊ समाधान के लिए जोखिम प्रबंधन, आय सहायता, बाजार सुधार और कृषि उत्पादकता में वृद्धि जैसे उपायों का समन्वित रूप से क्रियान्वयन आवश्यक है। इससे किसानों की आय को स्थिर किया जा सकेगा, साथ ही राजकोषीय अनुशासन बनाए रखते हुए भारत की कृषि ऋण व्यवस्था को भी मजबूत किया जा सकेगा।
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