Q. संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा भारतीय आयात पर शुल्क कटौती की हालिया घोषणा ने भारतीय उद्योगों के लिए उम्मीद जगाई है, लेकिन साथ ही रणनीतिक स्वायत्तता और भारत की विदेश नीति के संतुलन को लेकर चिंताएँ भी बढ़ा दी हैं। इस संदर्भ में, प्रस्तावित भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के भारत के आर्थिक हितों और प्रमुख वैश्विक साझेदारों के साथ उसके रणनीतिक संबंधों पर पड़ने वाले प्रभावों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • आर्थिक निहितार्थ
    • सकारात्मक आर्थिक निहितार्थ
    • नकारात्मक आर्थिक निहितार्थ
  • रणनीतिक निहितार्थ
    • सकारात्मक रणनीतिक निहितार्थ
    • नकारात्मक रणनीतिक निहितार्थ
  • संबद्ध चुनौतियाँ
  • आगे की राह

उत्तर

भारतीय आयातों पर अमेरिकी शुल्क में कटौती की हालिया घोषणा व्यापार संबंधों में जमी बर्फ के पिघलने का संकेत देती है, जो भारतीय निर्यातकों के लिए एक संभावित अप्रत्याशित लाभ की तरह है। हालाँकि, यह व्यावहारिक परिवर्तन नई दिल्ली को एक ऐसे दोराहे पर भी खड़ा करता है, जहाँ उसे बाजार तक पहुँच के आकर्षण और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की अनिवार्यता के बीच संतुलन बनाना होगा। एक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था में स्वयं को सुरक्षित रखते हुए इस जटिल सामंजस्य को बिठाना भारत के लिए एक बड़ी चुनौती है।

सकारात्मक आर्थिक निहितार्थ

  • निर्यात प्रतिस्पर्द्धात्मकता: स्टील एवं एल्युमीनियम पर ‘धारा 232’ के तहत लगाए गए टैरिफ को हटाने से भारत के भारी उद्योगों की उनके सबसे बड़े बाजार में कीमतों के स्तर पर प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ेगी।
    • उदाहरण: इन लंबे समय से चले आ रहे विवादों के समाधान से अमेरिका को होने वाले भारतीय स्टील निर्यात में अनुमानित 15-20% की वृद्धि होने की उम्मीद है।
  • GSP बहाली की संभावनाएँ: सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (GSP) की संभावित बहाली से 3,500 से अधिक भारतीय उत्पादों को शुल्क-मुक्त पहुँच मिल सकती है।
    • उदाहरण: रत्न, आभूषण और अभियांत्रिकी क्षेत्रों के छोटे निर्यातकों को वार्षिक शुल्क में लगभग 200 मिलियन डॉलर की बचत होने की संभावना है।

नकारात्मक आर्थिक निहितार्थ

  • पारस्परिकता की माँगें : अमेरिका अक्सर टैरिफ कटौती के बदले भारत से हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स, हार्ले-डेविडसन मोटरसाइकिल और कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क कम करने की शर्त रखता है।
    • उदाहरण: अमेरिकी डेयरी उत्पादों और सेबों पर शुल्क कम करने से भारत के लाखों छोटे पैमाने के किसानों की आजीविका को खतरा हो सकता है।
  • बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR) और डिजिटल मानक: बौद्धिक संपदा और डेटा स्थानीयकरण पर अमेरिकी मानकों के अनुरूप चलने का दबाव भारत के घरेलू तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र की प्रगति को बाधित कर सकता है।

सकारात्मक रणनीतिक निहितार्थ

  • आपूर्ति शृंखला लचीलापन: व्यापार संबंधों को गहरा करने से iCET (महत्त्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पर पहल) को मजबूती मिलती है, जिससे जेट इंजन और सेमीकंडक्टर के सह-उत्पादन में आसानी होती है।
    • उदाहरण: अमेरिकी विदेश विभाग ने हाल ही में चिप्स अधिनियम के तहत सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला के अवसरों को तलाशने के लिए भारत के साथ साझेदारी की है।
  • भू-राजनीतिक संतुलन: एक मजबूत व्यापार समझौता ‘गैर-बाजार आर्थिक प्रथाओं’ के खिलाफ एक एकीकृत मोर्चे का संकेत देता है, विशेष रूप से ऐसे समय में जब दोनों देश चीन से अपनी आर्थिक निर्भरता और जोखिम को कम करना चाहते हैं।

नकारात्मक रणनीतिक निहितार्थ

  • गठबंधन की धारणा : अमेरिकी बाजार पर अत्यधिक निर्भरता को ब्रिक्स (BRICS) और एससीओ (SCO) भागीदारों द्वारा भारत के पारंपरिक ‘गुटनिरपेक्ष’ रुख से भटकाव के रूप में देखा जा सकता है।
    • उदाहरण: रूस और चीन ने ऐतिहासिक रूप से क्वाड (Quad) ढाँचे के भीतर व्यापार के “सुरक्षाकरण” पर चिंता व्यक्त की है।
  • नीतिगत बाधाएँ: एक व्यापार समझौते के तहत की गई प्रतिबद्धताएँ भविष्य के संकटों के दौरान भारत की जवाबी टैरिफ लगाने या “बाय इंडियन” (भारतीय उत्पाद खरीदें) जैसे आदेशों का उपयोग करने की क्षमता को सीमित कर सकती हैं।

संबद्ध चुनौतियाँ 

  • कार्बन बॉर्डर टैक्स: अमेरिका पारंपरिक शुल्कों को कम कर रहा है, जबकि ‘ग्रीन ट्रेड’ (हरित व्यापार) की नई बाधाएँ जैसे कि कार्बन-आधारित लेवी, भारतीय विनिर्माण के लिए एक संरचनात्मक खतरा उत्पन्न करती हैं।
  • वीजा और गतिशीलता: भारतीय पेशेवरों के लिए H-1B और L-1 वीजा प्रतिबंधों में ढील दिए बिना यह व्यापार समझौता अधूरा बना हुआ है।
  • बहुपक्षवाद की पवित्रता: अमेरिका के साथ किए गए अधिमान्य समझौते विश्व व्यापार संगठन (WTO) की प्रासंगिकता को और कम कर सकते हैं, जो भारत के व्यापक व्यापारिक हितों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
  • कार्यान्वयन में बाधाएँ : अमेरिका की ‘बाजार पहुँच’ की माँग को भारत के ‘आत्मनिर्भर’ लक्ष्यों के साथ जोड़ना बहुत चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि इसके लिए जटिल घरेलू नियामक परिवर्तनों की आवश्यकता होती है।

आगे की राह

  • साझेदारी का विविधीकरण: भारत को किसी एक भागीदार पर अत्यधिक निर्भरता से बचने के लिए यूरोपीय संघ (EU) और ब्रिटेन (UK) के साथ मुक्त व्यापार समझौतों (FTAs) में तेजी लानी चाहिए।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की अनिवार्यता: व्यापारिक रियायतों को हरित ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र में ‘अग्रणी प्रौद्योगिकियों’ के हस्तांतरण के साथ सख्ती से जोड़ा जाना चाहिए।
  • गैर-टैरिफ बाधाओं (NTB) पर वार्ता: ध्यान केवल शुल्क कटौती से हटाकर अमेरिका के कड़े ‘फाइटोसैनिटरी’ और तकनीकी मानकों को सुलझाने पर केंद्रित करना चाहिए, जो भारतीय कृषि-निर्यात में अवरोध उत्पन्न करते हैं।
  • रणनीतिक संतुलन : यह सुनिश्चित करके ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ बनी रहे, व्यापार समझौते किसी तीसरे पक्ष (जैसे रूस) पर लगे प्रतिबंधों के साथ संरेखण को अनिवार्य न बनाएँ।

निष्कर्ष

टैरिफ युद्ध का “अंत निकट दिख रहा है”, लेकिन इसके परिणामस्वरूप होने वाली शांति “थोपी हुई” नहीं होनी चाहिए। भारत को अपने बढ़ते बाजार आकार का लाभ उठाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह व्यापार समझौता समानता की साझेदारी हो। अल्पकालिक टैरिफ राहत के बजाय आर्थिक लचीलेपन को प्राथमिकता देकर, नई दिल्ली यह सुनिश्चित कर सकती है कि अमेरिकी बाजार के लाभ प्राप्त करते हुए भी उसकी ‘ग्लोबल साउथ’ की नेतृत्वकारी भूमिका और रणनीतिक स्वायत्तता बरकरार रहे।

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