प्रश्न की मुख्य माँग
- भारत के लिए ‘रक्षा हेतु अंतरिक्ष’ और ‘अंतरिक्ष की रक्षा’ जैसी दोहरी चुनौतियों का उल्लेख कीजिए।
- भारत की सुरक्षा गणना पर उभरते अंतरिक्ष-विरोधी खतरों के प्रभावों की चर्चा कीजिए।
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उत्तर
बाह्य अंतरिक्ष एक शांतिपूर्ण साझा क्षेत्र से बदलकर अब एक प्रतिस्पर्धी सैन्य क्षेत्र में परिवर्तित हो गया है। भारत के लिए, यह स्थल सुरक्षा हेतु अंतरिक्ष का उपयोग करने और साथ ही बढ़ते अंतरिक्ष-विरोधी खतरों के बीच अपनी अंतरिक्ष-आधारित परिसंपत्तियों की रक्षा करने की दोहरी चुनौती उत्पन्न करता है।
मुख्य भाग
भारत के लिए दोहरी चुनौती
- रक्षा के लिए अंतरिक्ष (अंतरिक्ष-आधारित क्षमताओं का उपयोग): अंतरिक्ष प्रणालियाँ आधुनिक युद्ध के लिए ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ (क्षमता बढ़ाने वाले) के रूप में कार्य करती हैं।
- खुफिया, निगरानी और टोही (ISR): उपग्रह चीन और पाकिस्तान के साथ सीमाओं की निरंतर निगरानी, सैनिकों की आवाजाही और बुनियादी ढाँचे के निर्माण का पता लगाने में सक्षम बनाते हैं।
- सुरक्षित संचार और कमांड एवं कंट्रोल: अंतरिक्ष-आधारित संचार उपग्रह बिखरी हुई सेनाओं के बीच एन्क्रिप्टेड (कूटबद्ध) और वास्तविक समय में समन्वय सुनिश्चित करते हैं।
- नेविगेशन और सटीक युद्ध (Precision Warfare): नेविगेशन प्रणालियाँ प्रक्षेपण यानों का मार्गदर्शन, सैनिकों की गतिशीलता और सटीक हमलों का समर्थन करती हैं, जो नेटवर्क-केंद्रित युद्ध को सक्षम बनाते हैं।
- अंतरिक्ष सुरक्षा (कक्षीय परिसंपत्तियों की सुरक्षा): अंतरिक्ष परिसंपत्तियों का होना उन्हें असुरक्षित लक्ष्य भी बनाता है।
- स्थैतिक खतरे: जैमिंग, जीपीएस स्पूफिंग और ग्राउंड स्टेशनों पर साइबर हमले भौतिक विनाश के बिना सैन्य अभियानों को पंगु बना सकते हैं।
- गतिशील और सह-कक्षीय खतरे: ‘डायरेक्ट-असिएंट’ ASAT मिसाइलें और नजदीकी “इंस्पेक्टर सैटेलाइट” उपग्रहों को निष्क्रिय या नष्ट कर सकते हैं।
- पर्यावरणीय संकट: भीड़भाड़ वाले कक्षीय वातावरण में अंतरिक्ष मलबा और विकिरण संवेदनशीलता को बढ़ाते हैं।
भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा गणना पर उभरते अंतरिक्ष-विरोधी खतरों का प्रभाव
- इनकार द्वारा निवारण (Deterrence-by-denial) से लचीलेपन द्वारा निवारण (Deterrence-by-resilience) की ओर परिवर्तन: अतिरेक, मजबूत उपग्रहों और त्वरित प्रतिस्थापन क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करना।
- उदाहरण: ASAT या जैमिंग हमले के बाद क्षतिग्रस्त संपत्तियों को शीघ्र बदलने के लिए कई नेविगेशन उपग्रहों और लघु-उपग्रह प्रक्षेपण क्षमता का विकास।
- संस्थागत पुनर्विचार: रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी (DSA) जैसी खंडित व्यवस्थाएँ अपर्याप्त प्रतीत होती हैं, जो एक समर्पित ‘स्पेस फोर्स’ या सशक्त अंतरिक्ष कमान संबंधी विषयों को मजबूत करती हैं।
- तनाव में वृद्धि का जोखिम: अंतरिक्ष परिसंपत्तियों पर हमले तेजी से पारंपरिक या परमाणु क्षेत्रों तक फैल सकते हैं, जिससे संघर्ष का जोखिम बढ़ जाता है।
- उदाहरण: सीमा पर तनाव की स्थिति में यदि उपग्रह अस्थायी रूप से निष्क्रिय हो जाएँ, तो मिसाइल चेतावनी प्रणालियाँ प्रभावित हो सकती हैं, जिससे विरोधी पक्ष पूर्व-आक्रामक सैन्य कार्रवाई की ओर अग्रसर हो सकता है।।
- मुख्य युद्धक सिद्धांत में अंतरिक्ष का एकीकरण: अंतरिक्ष अब केवल एक सहायक क्षेत्र नहीं बल्कि एक केंद्रीय क्षेत्र है, जो भूमि, समुद्र, वायु और साइबर संचालन परिणामों को आकार देता है।
- उदाहरण: भारतीय वायु सेना का सिद्धांत अंतरिक्ष-आधारित परिसंपत्तियों को “आकर्षण के नए केंद्र” के रूप में पहचानता है, जो शत्रुतापूर्ण कार्रवाई के प्रति संवेदनशील हैं।
- नागरिक-सैन्य संलयन: इसरो (ISRO), निजी क्षेत्र और सशस्त्र बलों के बीच अधिक एकीकरण रणनीतिक रूप से आवश्यक हो जाता है।
निष्कर्ष
उभरते अंतरिक्ष-विरोधी खतरों ने अंतरिक्ष को एक निर्णायक युद्ध क्षेत्र बना दिया है। भारत के लिए, ‘रक्षा हेतु अंतरिक्ष’ और ‘अंतरिक्ष की रक्षा’ के मध्य संतुलन बनाए रखने के लिए बाह्य अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण और उत्तरदायित्व युक्त उपयोग के प्रति अपनी दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को छोड़े बिना संस्थागत सुधार, लचीलापन-निर्माण और विश्वसनीय निवारण की आवश्यकता है।
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