Q. उच्च शिक्षा में अनिवार्य उपस्थिति अक्सर सीखने को मात्र निगरानी तक सीमित कर देती है, जिससे जिज्ञासा की जगह अनुपालन को प्राथमिकता मिलती है। दिल्ली उच्च न्यायालय की हालिया टिप्पणियों और पाउलो फ्रेयर के 'आलोचनात्मक शिक्षाशास्त्र' के आलोक में, भारतीय विश्वविद्यालयों में शिक्षा के 'बैंकिंग मॉडल' के नैतिक और शैक्षणिक निहितार्थों पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

January 2, 2026

GS Paper IISocial Justice

प्रश्न की मुख्य माँग

  • ‘बैंकिंग मॉडल’ के नैतिक निहितार्थ
  • ‘बैंकिंग मॉडल’ के अकादमिक निहितार्थ

उत्तर

उच्च शिक्षा में अनिवार्य उपस्थिति की शर्त सीखने की प्रक्रिया को सक्रिय, आत्मनिर्देशित अनुभव से हटाकर निगरानी और नियंत्रण की प्रक्रिया बना सकती है, जहाँ जिज्ञासा की बजाय आज्ञाकारिता को महत्त्व दिया जाता है। जब कक्षाएँ बौद्धिक सहभागिता को विकसित करने के बजाय केवल शारीरिक उपस्थिति की निगरानी का माध्यम बन जाती हैं, तब विश्वविद्यालयों में शिक्षा दंडात्मक प्रतीत होने लगती है, जिससे आलोचनात्मक चिंतन और छात्रों की स्वायत्तता का स्वाभाविक विकास कमजोर पड़ता है।

‘बैंकिंग मॉडल’ के नैतिक निहितार्थ

  • असंतुलित पदानुक्रम: ‘बैंकिंग मॉडल’ में छात्रों को निष्क्रिय भंडार पात्र माना जाता है, जिन्हें सर्वज्ञ शिक्षक द्वारा भरा जाना है, जिससे उनकी स्वायत्तता समाप्त हो जाती है।
    • उदाहरण: पाउलो फ्रेयर के अनुसार, यह शिक्षक–छात्र विरोधाभास दमनकारी सामाजिक संरचनाओं को सुदृढ़ करता है, जहाँ छात्र की एकमात्र भूमिका ज्ञान को संगृहीत करना रह जाती है।
  • शिक्षण के रूप में निगरानी: अनिवार्य उपस्थिति सीखने की इच्छा जगाने के बजाय छात्रों की निगरानी का उपकरण बन जाती है।
  • गरिमा का क्षरण: परिस्थितियों की परवाह किए बिना कम उपस्थिति पर दंड देना गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।
    • उदाहरण: न्यायालय ने वर्ष 2016 के सुषांत रोहिल्ला प्रकरण का उल्लेख किया, जहाँ परीक्षा से वंचित किए जाने के बाद एक छात्र ने आत्महत्या कर ली—यह संस्थागत संवेदनहीनता का उदाहरण है।
  • मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा: उपस्थिति नियमों की कठोरता अक्सर व्यक्तिगत चुनौतियों से जूझ रहे छात्रों में गंभीर चिंता और मानसिक तनाव उत्पन्न करती है।
    • उदाहरण: दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि “अनिवार्य उपस्थिति अनिवार्य पीड़ा नहीं बन सकती”, और यांत्रिक नियमों के बजाय मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा पर बल दिया।
  • स्वायत्तता का हनन: वयस्क छात्रों को एक ही सीखने के ढाँचे में बाध्य करना उनके आत्म-निर्देशित शिक्षा के नैतिक अधिकार को सीमित करता है।
  • नैतिक जोखिम: जब संस्थान संबंधों के बजाय उपस्थिति रजिस्टर को प्राथमिकता देते हैं, तो झूठे अनुपालन (प्रॉक्सी) की संस्कृति पनपती है।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 के विश्वविद्यालय अनुदान दिशा-निर्देश इस बात पर जोर देते हैं कि “अनुपस्थिति को दंडित करने” की बजाय “सहभागिता को प्रोत्साहित करना” नैतिक रूप से श्रेष्ठ है।

‘बैंकिंग मॉडल’ के शैक्षणिक निहितार्थ

  • जिज्ञासा का अंत: रजिस्टर पर हस्ताक्षर पर केंद्रित व्यवस्था गहन अकादमिक अन्वेषण के लिए आवश्यक जिज्ञासा को नष्ट कर देती है।
  • कथात्मक जड़ता: शिक्षा केवल वर्णनात्मक बन जाती है, जहाँ शब्द अपनी परिवर्तनकारी क्षमता खोकर निष्प्राण हो जाते हैं।
  • व्यावहारिक सीख बनाम कठोर नियम: 75 प्रतिशत जैसे कठोर नियम छात्रों को प्रशिक्षण,  मूट कोर्ट (Moot courts) या शोध से वंचित कर देते हैं, जो अधिक मूल्यवान सीख प्रदान करते हैं।
    • उदाहरण: वर्ष 2025 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि मूट कोर्ट (Moot courts) और विधिक सहायता शिविरों को उपस्थिति श्रेय में शामिल किया जाए।
  • स्थिर शिक्षण पद्धति: सुनिश्चित उपस्थिति से शिक्षकों के लिए नवाचार या व्याख्यानों को आकर्षक बनाने की प्रेरणा घट जाती है।
    • उदाहरण: वर्ष 2020 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति छात्र-केंद्रित लचीलेपन की बात करती है, जिसे व्यवहार में पुरातन उपस्थिति आदेश कमजोर करते हैं।
  • दक्षता की जगह मानकीकरण: प्रणाली विषय पर वास्तविक दक्षता के बजाय जादुई 75 प्रतिशत को प्राथमिकता देती है।
  • नवाचार का हतोत्साहन: जबरन उपस्थिति स्वतंत्र अन्वेषण को रोकती है, जो उद्यमिता और रचनात्मक समस्या-समाधान के लिए आवश्यक है।
    • उदाहरण: जिन विश्वविद्यालयों में शून्य-उपस्थिति नीतियाँ हैं, वहाँ औद्योगिक प्रशिक्षुता के लिए अधिक समय मिलने से छात्र-नेतृत्व वाले नवाचार अधिक देखे गए हैं।

निष्कर्ष

‘बैंकिंग मॉडल’ से ‘समस्या-उत्प्रेरक शिक्षा’ की ओर परिवर्तन के लिए यांत्रिक रूप से 75 प्रतिशत नियम को हटाकर हाइब्रिड, संवेदनशील ढाँचा अपनाना आवश्यक है। डिजिटल शिक्षण का एकीकरण, प्रशिक्षण को शैक्षणिक श्रेय देना और छात्र कल्याण को प्राथमिकता देकर—जैसा कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्देशित किया है, भारतीय विश्वविद्यालय ज्ञान भंडार से आगे बढ़कर आलोचनात्मक चेतना और जिज्ञासा की प्रयोगशालाएँ बन सकते हैं।

Mandating attendance in higher education often reduces learning to a mere surveillance, prioritizing compliance over curiosity. In light of the recent Delhi High Court observations and Paulo Freire’s ‘Critical Pedagogy’, discuss the ethical and academic implications of the ‘Banking Model’ of education in Indian universities. in hindi

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