प्रश्न की मुख्य माँग
- घटती प्रजनन दर के लिए उत्तरदायी कारकों की चर्चा कीजिए।
- बताइए कि क्यों राज्य-प्रायोजित प्रोत्साहन जन्म दर बढ़ाने के लिए एक टिकाऊ नीति समाधान हो सकते हैं।
- चर्चा कीजिए कि क्यों राज्य-प्रायोजित प्रोत्साहन दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ समाधान नहीं माने जाते हैं।
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उत्तर
भारत में जनसांख्यिकीय संक्रमण के परिणामस्वरूप कई राज्यों में प्रजनन दर में गिरावट देखी जा रही है। उदाहरण के लिए, सिक्किम में कुल प्रजनन दर (TFR) लगभग 1.1 दर्ज की गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर से काफी कम है। यह स्थिति इस नीति-बहस को जन्म देती है कि क्या राज्य द्वारा प्रायोजित प्रोत्साहन जन्म दर को बढ़ाने और इस प्रवृत्ति को पलटने के लिए दीर्घकालिक और टिकाऊ समाधान प्रदान कर सकते हैं।
प्रजनन दर में गिरावट के लिए उत्तरदायी कारक
- विलंबित विवाह और संतानोत्पत्ति: उच्च शिक्षा और कॅरियर की आकांक्षाओं के कारण विवाह और संतानोत्पत्ति में विलंब हो रहा है।
- उदाहरण: नमूना पंजीकरण प्रणाली के अनुसार, केरल और तमिलनाडु में प्रजनन दर में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है।
- बच्चों के पालन-पोषण की बढ़ती लागत: शहरी जीवनशैली में आवास, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा की बढ़ती लागत के कारण दंपत्ति कम बच्चे रखने को प्राथमिकता देते हैं।
- जीवनशैली में परिवर्तन और व्यक्तिगत प्राथमिकताएँ: आधुनिक दंपत्ति बड़े परिवार की तुलना में बेहतर जीवन गुणवत्ता, कॅरियर विकास और व्यक्तिगत आकांक्षाओं को अधिक महत्त्व देते हैं।
- बाँझपन और जैविक सीमाएँ: विलंबित संतानोत्पत्ति और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के कारण बाँझपन के मामलों में वृद्धि होती है, जिससे प्रजनन दर में गिरावट आती है।
- उदाहरण: सिक्किम की ‘वात्सल्य’ योजना के तहत कई दंपत्तियों ने सरकार समर्थित आईवीएफ उपचार की माँग की, जो बाँझपन को एक महत्त्वपूर्ण कारक दर्शाता है।
- जनसांख्यिकीय और सामाजिक परिवर्तन: आर्थिक विकास, शहरीकरण और शिक्षा के बढ़ते स्तर के साथ समाज जनसांख्यिकीय संक्रमण के दौर से गुजरता है, जिससे प्रजनन दर स्वाभाविक रूप से घटती है।
- उदाहरण: सिक्किम में भारत की सबसे कम कुज प्रजनन दर (लगभग 1.1) दर्ज की गई है, जो वैश्विक स्तर पर विकसित कम-प्रजनन समाजों के समान प्रवृत्ति को दर्शाती है।
क्यों राज्य-प्रायोजित प्रोत्साहन जन्म दर बढ़ाने के लिए एक टिकाऊ नीति समाधान हो सकते हैं
- बच्चों के पालन-पोषण की आर्थिक लागत को कम करना: नकद हस्तांतरण और वित्तीय प्रोत्साहन बच्चों के पालन-पोषण की बढ़ती लागत को आंशिक रूप से संतुलित करने में सहायता करते हैं।
- उदाहरण: आंध्र प्रदेश द्वारा दूसरे या तीसरे बच्चे के लिए ₹25,000 प्रोत्साहन देने का प्रस्ताव उच्च प्रजनन दर को प्रोत्साहित करने का प्रयास है।
- कार्य–परिवार संतुलन को समर्थन: ऐसी नीतियाँ, जो कॅरियर और पालन-पोषण के बीच संघर्ष को कम करती हैं, कामकाजी दंपत्तियों के लिए संतानोत्पत्ति को अधिक व्यावहारिक बनाती हैं।
- उदाहरण: सिक्किम ने सरकारी कर्मचारियों के लिए मातृत्व अवकाश को एक वर्ष तक बढ़ाया और पितृत्व अवकाश भी शुरू किया।
- कामकाजी अभिभावकों के लिए बाल देखभाल सहायता: राज्य समर्थित बाल देखभाल सेवाएँ अभिभावकों, विशेषकर महिलाओं, को बच्चों की देखभाल के साथ काम जारी रखने में सहायता करती हैं।
- उदाहरण: सिक्किम ने सरकारी कर्मचारियों के लिए मातृत्व अवकाश को बढ़ाकर एक वर्ष कर दिया और पितृत्व अवकाश की शुरुआत की।
- बाँझपन से निपटने के लिए सरकारी सहयोग: प्रजनन उपचार के लिए सरकारी सहायता उन दंपत्तियों की सहायता करती है, जो बच्चे चाहते हैं लेकिन चिकित्सीय बाधाओं का सामना करते हैं।
- उदाहरण: सिक्किम की ‘वात्सल्य’ योजना के अंतर्गत दो आईवीएफ चक्रों तक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- सरकारी क्षेत्र से परे समावेशी प्रोत्साहन: निजी क्षेत्र के कर्मचारियों तक लाभों का विस्तार करने से नीति का प्रभाव समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँच सकता है।
- उदाहरण: सिक्किम में निजी क्षेत्र में कार्यरत माताओं को दूसरे बच्चे के लिए एक वर्ष तक प्रति माह ₹5,000 तथा तीसरे बच्चे के लिए ₹10,000 प्रति माह प्रदान किए जाते हैं।
क्यों राज्य-प्रायोजित प्रोत्साहन एक टिकाऊ समाधान नहीं माने जाते
- वित्तीय प्रोत्साहनों का सीमित प्रभाव: नकद लाभ या बोनस अक्सर उन दीर्घकालिक प्रजनन निर्णयों को प्रभावित नहीं कर पाते हैं, जो व्यापक सामाजिक-आर्थिक कारकों से निर्धारित होते हैं।
- उदाहरण: वित्तीय प्रोत्साहनों और बाल देखभाल लाभों के बावजूद सिक्किम में प्रजनन दर अभी भी अत्यंत कम बनी हुई है।
- अंतरराष्ट्रीय अनुभव से सीमित परिणाम: कई देशों में उदार प्रोत्साहनों के बावजूद प्रजनन दर में गिरावट जारी है।
- उदाहरण: दक्षिण कोरिया (TFR लगभग 0.7) और सिंगापुर (TFR लगभग 1.0) में बड़े पैमाने पर सब्सिडी देने के बावजूद जन्म दर में कमी जारी है।
- केवल अल्पकालिक व्यवहारिक परिवर्तन: वित्तीय प्रोत्साहन अक्सर कुल जन्मों की संख्या बढ़ाने के बजाय केवल जन्म के समय को प्रभावित करते हैं।
- संरचनात्मक कारणों का समाधान नहीं: कार्य-जीवन असंतुलन, उच्च बाल देखभाल लागत और शहरी आवास की सीमाएँ जैसे मूलभूत कारण केवल एकमुश्त वित्तीय सहायता से हल नहीं हो सकते हैं।
- राजकोषीय स्थिरता से जुड़ी चिंताएँ: बड़े पैमाने पर वित्तीय प्रोत्साहन राज्यों पर भारी राजकोषीय बोझ डाल सकते हैं, जबकि अपेक्षित जनसांख्यिकीय परिणामों की कोई निश्चितता नहीं होती।
निष्कर्ष
घटती प्रजनन दर केवल अस्थायी व्यावहारिक परिवर्तन का परिणाम नहीं है, बल्कि यह गहरे सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों को दर्शाती है। यद्यपि प्रोत्साहन योजनाएँ सीमित स्तर पर सहायक हो सकती हैं, परंतु स्थायी समाधान के लिए दीर्घकालिक परिवार-हितैषी नीतियों की आवश्यकता है। इनमें सुलभ और किफायती बाल देखभाल व्यवस्था, लचीले कार्यस्थल, आवासीय सहायता, तथा लैंगिक समानता पर आधारित अभिभावकत्व प्रणाली शामिल हैं।
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