Q. बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध सुरक्षा का भ्रम तो उत्पन्न कर सकता है, लेकिन इससे मौजूदा सामाजिक असमानताएं और गहरी हो सकती हैं और बाल अधिकारों का हनन हो सकता है। इस संदर्भ में, किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग के प्रभाव पर चर्चा कीजिए और यह विश्लेषण कीजिए कि भारत में प्रतिबंध-आधारित दृष्टिकोण क्यों अनुपयुक्त हो सकता है। (250 शब्द, 15 अंक)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर अत्यधिक सोशल मीडिया के प्रयोग का प्रभाव
  • भारत में नियंत्रणपूर्ण उपाय सहायक क्यों नहीं हो सकता है।
  • आगे की राह।

उत्तर

गाजियाबाद में तीन नाबालिग बहनों की दु:खद मौतों ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की माँगों को फिर से तीव्र कर दिया है। यद्यपि किशोर मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंताएँ वास्तविक और जायज हैं, लेकिन केवल प्रतिबंधों पर आधारित प्रतिक्रिया एक बहुआयामी समस्या को अत्यधिक सरलीकृत करने का जोखिम उत्पन्न करती है। यह बहस तकनीक के पक्ष या विरोध में होने की नहीं है, बल्कि ऐसी स्वस्थ मीडिया पारिस्थितिकी के निर्माण की है, जो बच्चों के अधिकारों को कमजोर किए बिना उनकी सुरक्षा सुनिश्चित कर सके।

किशोर मानसिक स्वास्थ्य पर सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग का प्रभाव

  • चिंता और अवसाद में वृद्धि: मेटा-विश्लेषण सोशल मीडिया के भारी उपयोग और चिंता एवं अवसाद के लक्षणों के बीच निरंतर संबंध दर्शाते हैं।
  • आत्म-क्षति और आत्मघाती व्यवहार: अत्यधिक ऑनलाइन संलग्नता आत्म-क्षति के विचारों के साथ संबंधित हो सकता है।
    • उदाहरण: गाजियाबाद का मामला, जहाँ प्रारंभिक पुलिस रिपोर्टें स्क्रीन की लत और माता-पिता के साथ संघर्ष का संकेत देती हैं, ऐसे जोखिमों की गंभीरता को दर्शाता है।
  • शारीरिक छवि (Body Image) से असंतोष: एल्गोरिदम-आधारित प्लेटफॉर्म अवास्तविक सौंदर्य मानकों को बढ़ावा देते हैं।
    • उदाहरण: विभिन्न शोधों से ज्ञात होता है कि फिल्टर किए गए, आदर्शीकृत कंटेंट के संपर्क में आने वाले किशोरों में शारीरिक छवि (Body Image) संबंधी चिंताएँ बढ़ जाती हैं।
  • व्यसनी डिजाइन और व्यावहारिक निर्भरता: प्लेटफॉर्म सहभागिता बढ़ाने वाले एल्गोरिदम का उपयोग करते हैं, जो बाध्यकारी उपयोग को प्रोत्साहित करते हैं।
  • एआई से जुड़े उभरते संज्ञानात्मक जोखिम: प्रारंभिक शोध उच्च एआई उपयोग को “संज्ञानात्मक ऋण” और कमजोर आलोचनात्मक सोच से जोड़ता है।
    • उदाहरण: कई रिपोर्टों में नाबालिगों द्वारा भावनात्मक सलाह के लिए जनरेटिव एआई चैटबॉट्स पर निर्भरता का उल्लेख किया गया है, जिनमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दर्ज सुरक्षा विफलताएँ भी सामने आई हैं।

भारत में प्रतिबंध-आधारित दृष्टिकोण क्यों अनुपयुक्त हो सकता है

  • तकनीकी रूप से छिद्रपूर्ण और आसानी से दरकिनार किया जा सकने वाला: आयु-प्रतिबंध कानूनों को वीपीएन (VPN) के माध्यम से दरकिनार किया जा सकता है।
    • उदाहरण: ऑस्ट्रेलिया का वर्ष 2024 का 16 वर्ष से कम आयु वाले किशोरों पर प्रतिबंध युवाओं को अनियंत्रित या एन्क्रिप्टेड डिजिटल स्थानों की ओर धकेल सकता है, जिससे ग्रूमिंग जैसे जोखिम बढ़ सकते हैं।
  • व्यापक निगरानी का जोखिम: अनिवार्य आयु सत्यापन से सोशल मीडिया खातों को सरकारी पहचान-पत्रों से जोड़ा जा सकता है।
    • उदाहरण: ऐसे प्रवर्तन ढाँचे सुरक्षा के नाम पर निगरानी संरचना के विस्तार का जोखिम उत्पन्न करते हैं।
  • सोशल मीडिया एक सहारा भी है: हाशिये पर पड़े किशोरों के लिए प्लेटफॉर्म समुदाय और सहकर्मी समर्थन प्रदान करते हैं।
    • उदाहरण: ग्रामीण, क्वीर (Queer), दिव्यांग और शहरी झुग्गी-झोपड़ी वाले युवा दृश्यता और एकजुटता के लिए डिजिटल स्पेस पर निर्भर हैं।
  • लैंगिक असमानता का गहरा होना: प्रतिबंध लड़कियों की पहुँच को असमान रूप से सीमित कर सकता है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आँकड़े दर्शाते हैं कि जहाँ 57.1% पुरुषों ने इंटरनेट का उपयोग किया है, वहीं महिलाओं में यह अनुपात केवल 33.3% है। आयु की कठोर निगरानी के चलते परिवारों द्वारा लड़कियों से उपकरण छीन लिए जाने की आशंका बनी रहती है।
  • नीति-निर्माण में लोकतांत्रिक अभाव: विनियामक ढाँचे के निर्माण में युवाओं की राय को शामिल नहीं किया जाता है।

आगे की राह

  • सेंसरशिप से हटकर प्लेटफ़ॉर्म विनियमन की ओर बढ़ना: प्रतिबंधों से आगे बढ़ते हुए नाबालिगों के लिए प्रवर्तनीय “ड्यूटी ऑफ केयर” दायित्व लागू किए जाएँ।
    • उदाहरण: हानिकारक कंटेंट के एल्गोरिदमिक प्रवर्द्धन पर मौद्रिक दंड का प्रावधान किया जाए।
  • एक स्वतंत्र विशेषज्ञ नियामक की स्थापना: निगरानी व्यवस्था को नौकरशाही या राजनीतिक प्रभाव से अलग रखा जाना चाहिए।
    • उदाहरण: विनियमन को आईटी अधिनियम, 2000 के अंतर्गत केवल नोटिस-एंड-टेकडाउन तंत्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
  • भारतीय संदर्भ आधारित अनुसंधान में निवेश: वर्ग, जाति, लिंग और क्षेत्र के आधार पर दीर्घकालिक अध्ययनों के लिए सार्वजनिक वित्तपोषण।
    • उदाहरण: आयातित मॉडलों के बजाय भारतीय आँकड़ों पर आधारित साक्ष्य-आधारित नीतियों का विकास।
  • प्रौद्योगिकियों के बीच सुसंगत विनियमन सुनिश्चित करना: बाल सुरक्षा संबंधी चिंताएँ एआई चैटबॉट्स और जनरेटिव एआई प्रणालियों तक भी विस्तृत हैं।
  • डिजिटल साक्षरता और अभिभावकीय सहभागिता को बढ़ावा देना: किशोरों और अभिभावकों को डिजिटल परिवेश में सुरक्षित, सूचित और जिम्मेदार ढंग से सहभागिता करने हेतु सशक्त बनाना।
    • उदाहरण: विद्यालय-आधारित मीडिया साक्षरता कार्यक्रम और सामुदायिक परामर्श पहलें।

निष्कर्ष

एक समग्र (ब्लैंकेट) प्रतिबंध निर्णायक कार्रवाई का आश्वस्तिदायक भ्रम तो दे सकता है, लेकिन यह असमानता को जड़ें जमाने, निगरानी के विस्तार और युवाओं की आवाज़ को दबाने का जोखिम भी रखता है। असली चुनौती इंटरनेट का संपर्क काटने में नहीं है, बल्कि डिजिटल शासन को पुनर्गठित करने, और एक स्वस्थ मीडिया पारिस्थितिकी तंत्र के भीतर बाल सुरक्षा, तकनीकी नवाचार और संवैधानिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने में निहित है।

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