Q. "ऊर्जा सुरक्षा भारत की विदेश नीति का प्रमुख आधार है और मध्य पूर्वी देशों में भारत के व्यापक प्रभाव से संबंधित है।" आने वाले वर्षों में आप ऊर्जा सुरक्षा को भारत की विदेश नीति की दिशाओं के साथ कैसे एकीकृत करेंगे? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • बताइए कि भारत की विदेश नीति में ऊर्जा सुरक्षा किस प्रकार केंद्रीय भूमिका निभाती है
  • चर्चा कीजिए कि मध्य-पूर्वी देशों में भारत के व्यापक प्रभाव से ऊर्जा सुरक्षा किस तरह जुड़ी हुई है। 
  • आने वाले वर्षों में ऊर्जा सुरक्षा को भारत की विदेश नीति की दिशा के साथ एकीकृत करने पर चर्चा कीजिए।

उत्तर

भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 85–88% आयात करता है, जिसमें से आधे से अधिक की आपूर्ति ओपेक/मध्य-पूर्व से होती है। इस कारण ऊर्जा सुरक्षा, विदेश नीति के निर्णयों, सामरिक भंडारों तथा पश्चिम एशिया में दीर्घकालिक आपूर्ति समझौतों का एक केंद्रीय आधार बन गई है।

भारत की विदेश नीति में ऊर्जा सुरक्षा की केंद्रीय भूमिका

  • तेल एवं गैस आयात का विविधीकरण: भारत की कूटनीति पश्चिम एशिया, रूस और अफ्रीका से स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने पर केंद्रित है जिससे द्विपक्षीय संबंधों की दिशा निर्धारित होती है।
  • रणनीतिक साझेदारियाँ: सऊदी अरब, यूएई और रूस के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते भारत की बाह्य नीति का प्रमुख आधार हैं।
  • भूराजनीतिक संतुलन: भारत अमेरिका (प्रतिबंध व्यवस्था), रूस (रियायती कच्चा तेल) और ईरान (चाबहार के माध्यम से तेल व्यापार) के साथ संतुलित संबंध बनाए रखता है।
  • ऊर्जा अवसंरचना कूटनीति: विदेशी तेल क्षेत्रों में निवेश (रूस और मोज़ाम्बिक में ONGC Videsh) ऊर्जा आवश्यकताओं से प्रेरित विदेश नीति को दर्शाता है। 
  • बहुपक्षीय भागीदारी: IEA और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे मंच भारत की वैश्विक पहुंच में ऊर्जा सुरक्षा के अंतर्निहित महत्व को दर्शाते हैं।

मध्य-पूर्वी देशों में भारत के व्यापक प्रभाव से ऊर्जा सुरक्षा का संबंध

  • तेल पर निर्भरता: मध्य-पूर्व से लगभग 60% कच्चे तेल के आयात के कारण ऊर्जा व्यापार भारत-खाड़ी संबंधों का मुख्य आधार बनता है।
  • निवेश और सहयोग: यूएई की ADNOC और सऊदी अरामको (Aramco) में भारत की बढ़ती भागीदारी द्विपक्षीय संबंधों को केवल व्यापार से आगे बढ़ाकर निवेश और रणनीतिक सहयोग तक विस्तारित करती है।
  • रणनीतिक प्रभाव: ऊर्जा की विश्वसनीय आपूर्ति भारत को राजनीतिक सद्भावना प्रदान करती है और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के साथ कूटनीति में उसकी भूमिका को सुदृढ़ करती है।
  • प्रवासी और प्रेषण से संबंध: ऊर्जा-आधारित मजबूत आर्थिक संबंध खाड़ी देशों में बसे लगभग 90 लाख भारतीयों के साथ जुड़े प्रेषण प्रवाह को सुदृढ़ करते हैं, जिससे भारत का प्रभाव और बढ़ता है।
  • पश्चिम एशिया में भूराजनीतिक संतुलन: ऊर्जा सुरक्षा भारत को सऊदी-ईरान या इज़राइल-खाड़ी देशों के बीच प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में संतुलित और तटस्थ नीति अपनाने के लिए प्रेरित करती है, जिससे उसकी कूटनीतिक महत्ता बढ़ती है।

आने वाले वर्षों में भारत की विदेश नीति की दिशा के साथ ऊर्जा सुरक्षा का एकीकरण

  • आपूर्तिकर्ताओं का विविधीकरण: पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम करने के लिए अफ्रीका, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका के साथ संबंधों का विस्तार करना आवश्यक होगा।
  • हरित ऊर्जा कूटनीति: नवीकरणीय ऊर्जा और हाइड्रोजन के क्षेत्र में (जैसे अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन, ग्रीन हाइड्रोजन गठबंधन) भारत को वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करना।
  • क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएँ: ऊर्जा आपूर्ति को सुदृढ़ करने हेतु INSTC (ईरान के माध्यम से), चाबहार बंदरगाह और भारत-मध्य पूर्व-यूरोप गलियारा  (IMEEC) जैसी परियोजनाओं को मजबूत करना।
  • रणनीतिक तेल भंडार एवं प्रौद्योगिकी सहयोग: यूएई, जापान आदि के साथ मिलकर रणनीतिक भंडार का विस्तार करना तथा कार्बन कैप्चर एवं भंडारण जैसी तकनीकों में सहयोग बढ़ाना।
  • जलवायु और सुरक्षा के बीच संतुलन: ऊर्जा लक्ष्यों को G20 और COP जैसे मंचों पर जलवायु कूटनीति के साथ समन्वित करते हुए, घरेलू विकास के लिए सुलभ और किफायती ऊर्जा सुनिश्चित करना।

निष्कर्ष

स्थिर तेल आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए खाड़ी देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए रखना, साथ ही नए साझेदारों को जोड़ना और स्वच्छ ऊर्जा सहयोग को बढ़ाना आवश्यक है। इसके साथ ही प्रमुख समुद्री मार्गों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी। यह संतुलित दृष्टिकोण ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के साथ-साथ दीर्घकाल में पश्चिम एशिया में भारत की स्थिति और प्रभाव को सुदृढ़ करता है।

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