Q. [साप्ताहिक निबंध] मुद्दा यह नहीं है कि हम कितना देते हैं, बल्कि यह है कि हम देने में कितना प्रेम समर्पित करते हैं। (1200 शब्द)

निबंध का प्रारूप

प्रस्तावना:

  • इस केंद्रीय विचार को प्रस्तुत करें दान की मात्रा नहीं, बल्कि उसमें निहित भावना अधिक महत्वपूर्ण है।
  • ‘दान’ को एक भौतिक कार्य के रूप में नहीं, बल्कि एक गहन मानवीय कार्य के रूप में नैतिक और भावनात्मक रूप से परिभाषित कीजिए।
  • इस प्रश्न का अन्वेषण कीजिए, साधारण-सी भेंट अपनी सरलता से हमारी स्मृतियों पर किस प्रकार स्थायी छाप छोड़ जाती है, जबकि भव्य उपहार हमारे हृदय को शून्यता का अनुभव क्यों कराते हैं?

मुख्य भाग:

  • उद्देश्य की शक्ति: जब प्रेम स्वयं ही उपहार बन जाए:
    • अन्वेषण कीजिए कि किस प्रकार उद्देश्य कार्य को प्रेम की अभिव्यक्ति में बदल देता है।
    • विरोधाभासी उदाहरणों का प्रयोग कीजिए: हस्तनिर्मित कार्ड बनाम महंगा उपहार; अहंकार से प्रेरित दान बनाम समानुभूतिपूर्ण उपस्थिति।
    • तर्क प्रस्तुत कीजिए कि वास्तविक उदारता लेन-देन पर आधारित न होकर, संबंधपरक होती है ।
  • प्रणालीगत चुनौतियाँ: क्या केवल प्रेम ही पर्याप्त हो सकता है?
    • यह स्वीकार कीजिए कि जहाँ प्रेम मूल्य वर्धन करता है, वहीं केवल भावनात्मक दान से संरचनात्मक अभाव की चुनौतियाँ दूर नहीं हो सकती हैं।
    • व्यक्तिगत दान की सीमाओं का अन्वेषण कीजिए: अक्रियाशील, असमानता और सततता ।
    • नीतिगत सुधार, सुलभता और समानता जैसे संरचनात्मक परिवर्तनों की आवश्यकता पर जोर देने के साथ-साथ प्रेम को नैतिक प्रेरक शक्ति के रूप में बनाए रखना अनिवार्य है।
  • प्रदर्शन-केंद्रित संस्कृति: दान में प्रेम क्यों लुप्त हो रहा है:
    • विश्लेषण कीजिए कि आधुनिक दान किस प्रकार उपस्थिति-आधारित होने के बजाय प्रदर्शन-आधारित हो गया है।
    • सोशल मीडिया द्वारा अर्जित मान्यता, सीएसआर मॉडल और मात्रात्मक मानदंडों पर केन्द्रित प्रणालियों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए जिनमें भावनात्मक गहराई का अभाव है।
    • भौतिक और भावनात्मक दान के बीच बढ़ते अंतर को उद्घाटित करें, विशेष रूप से एकाकीपन और अलगाव के युग में।
  • प्रेमपूर्ण उदारता की संस्कृति का संवर्धन:
    • भविष्य में दान देने के लिए एक दृष्टिकोण प्रस्तावित कीजिए – जो भावनात्मक उपस्थिति, साझा सम्मान और रोजमर्रा की करुणा पर आधारित हो।
    • शैक्षिक, नीति-आधारित और सांस्कृतिक हस्तक्षेपों की वकालत करें जो प्रेम और समानुभूति पर केंद्रित हों।
    • करुणामय दान को बनाए रखने के लिए आवश्यक आंतरिक कार्य—स्व-जागरूकता, आत्म-नियंत्रण और साहस—को प्रमुखता से रेखांकित कीजिए ।

निष्कर्ष:

  • मूल धारणा का पुनरावलोकन कीजिए: दान वह दर्पण है जो हमारी पहचान और दूसरों के साथ हमारे संबंधों को प्रतिबिंबित करता है।
  • लेन-देन की मानसिकता से परिवर्तनकारी दृष्टिकोण की ओर संक्रमण का आह्वान कीजिए – अतिरिक्तता से दान करने के बजाय शुद्ध निष्ठा से योगदान को प्राथमिकता दें।
  • निबंध के अंत में एक प्रभावशाली दृष्टिकोण को रेखांकित कीजिए: प्रेम से ओतप्रोत दान को मौन प्रतिरोध, मानवीय संबंधों का संवाहक और समकालीन उपेक्षा पर एक उपचारात्मक साधन के रूप में प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर

प्रस्तावना

दान को प्रायः पुण्य का एक मापदण्ड, दया, दान और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रतिबिम्ब माना जाता है। हमें योगदान करना, मदद करना, साझा करना सिखाया जाता है। लेकिन इन महान आदर्शों से परे कुछ गहरे प्रश्न छिपे हैं: दान देने के कार्य को वास्तव में क्या सार्थक बनाता है? भव्य उपहारों की अपेक्षा छोटे-छोटे व्यवहार हमारे दिलों पर कभी-कभी अधिक गहरी छाप क्यों छोड़ जाते हैं? गर्मजोशी के साथ साझा किया गया एक साधारण भोजन, दायित्ववश दिए गए महंगे उपहार की तुलना में अधिक पौष्टिक क्यों लगता है? इसका उत्तर दान की भव्यता में नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना में निहित है।

इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दान मूलतः केवल एक लेन-देन नहीं है। यह एक भावनात्मक अभिव्यक्ति है। इसे मात्रा से नहीं, बल्कि करुणा, ध्यान और उपस्थिति से मापा जाता है। जैसा कि मदर टेरेसा ने कहा था, “ महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हम कितना दान करते हैं, बल्कि यह है कि देने में हम कितना प्रेम समर्पित करते हैं।” दान में जो प्रेम अर्पित किया जाता है, वही उसे सार्थक बनाता है। वास्तविक निष्ठा और विनम्रता से किया गया दान प्रदर्शन मात्र से परे एक सार्थक कृत्य बन जाता है। यह दानकर्ता और लेने वाले, दोनों के लिए मानवीयता का भाव उत्पन्न करता है। यह मौन पुष्टि है कि किसी व्यक्ति विशेष का अस्तित्व महत्त्वपूर्ण है।

हालांकि एक ऐसी दुनिया में जहाँ दृश्यता और पैमाने को पुरस्कृत किया जाता है, यह दृष्टिकोण आदर्शवादी प्रतीत हो सकता है। “क्या भावनात्मक ईमानदारी भौतिक आवश्यकता की पूर्ति का विकल्प बन सकती है?” “क्या हृदय से अभिव्यक्त भाव संरचनात्मक कष्टों के विरुद्ध खड़े हो सकते हैं?” ये प्रश्न हमें और गहराई से विचार करने के लिए विवश करते हैं: शायद महत्त्व केवल इस बात का नहीं कि हम कितना दान करते हैं, बल्कि इस बात का है कि हम कितने सार्थक रूप से दान करते हैं।

क्योंकि उद्देश्य और देखभाल के उस मिश्रण में एक मौन किंतु प्रभावशाली शक्ति निहित होती है, जो शायद सब कुछ का समाधान न कर सके, लेकिन कुछ को गहराई से रूपांतरित कर सकती है।

उद्देश्य की शक्ति: जब प्रेम स्वयं ही उपहार बन जाए

दान की क्रिया से परे निहित होती है वह मंशा, जो इसके भावनात्मक सार को उजागर करती है। प्रेम और सहानुभूति के साथ किया गया कार्य कर्तव्य, अपराधबोध या अपेक्षा से किए गए भाव से बहुत भिन्न महत्व रखता है। यह उस कार्य के पीछे की मौन ऊर्जा है जो सबसे ज़ोर से बोलती है: “आप मायने रखते हैं।”

एक हस्तनिर्मित कार्ड, यद्यपि कीमत में सामान्य होता है, लेकिन अक्सर जल्दबाजी में खरीदे गए भव्य उपहार की तुलना में अधिक गहराई से प्रभावित करता है। क्यों? क्योंकि इसमें समय, विचार और भावनाओं का समावेश होता हैं। दानकर्ता की उपस्थिति उपहार में, उसकी बारीकियों में, उसकी खामियों में, उसकी ईमानदारी में समाहित होती है। यहाँ प्रेम केवल उपहार में ही नहीं लिपटा होता, बल्कि वह उपहार ही बन जाता है।

इसके विपरीत, जब दान प्रशंसा या आत्म-छवि के लिए दिया जाता है, तो इससे दानकर्ता का अहंकार बढ़ता है, लेकिन प्राप्तकर्ता भावनात्मक रूप से अछूता रह जाता है। हम सभी को ऐसे उपहार मिले हैं जो भौतिक रूप से उदार होते हुए भी खोखले लगते हैं। उपस्थिति के बिना उदारता अधूरी प्रतीत होती है। जब देना एक संबंध के बजाय एक लेन-देन बन जाता है, तो इससे उसकी आत्मा खोने का खतरा होता है।

भौतिक सहायता किसी तात्कालिक आवश्यकता को पूरा कर सकती है, लेकिन समानुभूति के बिना, यह शायद ही कभी मानवीय भावना को पोषित कर पाती है। सुनने, समझने या केवल वहाँ मौजूद रहने के रूप में उपस्थिति, दान के कार्य को गरिमा प्रदान करती है। यह प्राप्तकर्ता को याद दिलाती है कि वे केवल एक समस्या नहीं हैं जिसका समाधान किया जाना है, बल्कि एक व्यक्ति हैं जिसकी देखभाल भी की जानी है। इस उपस्थिति में दान परोपकार से ऊपर उठकर एकजुटता बन जाता है; यह केवल सहायता नहीं, बल्कि थामा हुआ हाथ है।

प्रेम से ओतप्रोत दान में उपचारात्मक शक्ति होती है। संकट के क्षण में एक दयालु शब्द, समर्थन का एक सौम्य संकेत, या बस भावनात्मक रूप से उपलब्ध होना, इन कार्यों के लिए धन की नहीं, केवल उपस्थिति की आवश्यकता होती है।

इस प्रकार का दान दाता को प्राप्तकर्ता से ऊपर नहीं उठाता। यह उनके निकटस्थ विराजमान रहता है। इसमें कोई मुक्तिदाता की भावना नहीं है, केवल दो मनुष्यों के बीच की दूरी को कम करने की इच्छा है। वास्तविक उदारता अपने स्वयं के गुणों को प्रदर्शित करने के बजाय दूसरे की मानवता का सम्मान करती है।

इसके अतिरिक्त, जब उद्देश्य और समानुभूति संरेखित हो जाते है, तो दान प्रदर्शनात्मक होने के बजाय सहज स्वाभाविक कृत्य बन जाता है। हम यह अनुभव करने लगते हैं कि क्या आवश्यक है, इसलिए नहीं कि यह अपेक्षित है, बल्कि इसलिए कि हम इसकी परवाह करते हैं। ये शांत, प्रायः अदृश्य भाव स्थायी मानवीय संबंध की नींव बनाते हैं। इसमें, दान कर्तव्य नहीं, बल्कि भक्ति बन जाता है।

लेकिन गहनतम मंशा और वास्तविक प्रेम के बावजूद, एक असहज सवाल मन में बना रहता है: “क्या केवल प्रेम ही पर्याप्त हो सकता है जब समस्याएं बड़ी, व्यवस्थित और गहराई तक जड़ें जमा चुकी हों?”

प्रणालीगत चुनौतियाँ: क्या केवल प्रेम ही पर्याप्त हो सकता है?

हालाँकि प्रेम दान में आत्मा का संचार करता है, लेकिन यह व्यापक मानवीय पीड़ा को दूर करने के लिए आवश्यक संरचनात्मक तंत्रों का स्थान नहीं ले सकता। एक भूखे बच्चे को केवल एक करुणामय हृदय की ही आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उसे पौष्टिक भोजन, स्वास्थ्य देखभाल और शिक्षा की भी आवश्यकता होती है। प्रेम सहायता की प्रेरणा तो दे सकता है, परन्तु जब तक समुचित तंत्र स्थापित नहीं होते, इसका प्रभाव प्रायः विखंडित एवं अस्थायी ही बना रहता है।

जब अभाव के मूल कारणों का समाधान नहीं किया जाता, तो सबसे नेकनीयत व्यक्तिगत दयालुता के कार्य भी अधूरे रह जाते हैं। उदाहरण के लिए, सर्दियों में बेघर लोगों को गर्म कपड़े उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे दीर्घकालिक आवास असुरक्षा की समस्या का समाधान नहीं होता है। नीतिगत सुधार, सामाजिक न्याय और संसाधनों के समतापूर्ण वितरण के माध्यम से व्यवस्थित दान यहाँ आवश्यक हो जाता है। यहाँ, प्रेम को प्रेरक शक्ति की भांति कार्य करना चाहिए, लेकिन एक बेहतर नीति, संगठन और रणनीति का होना अनिवार्य है।

इसके अलावा, संसाधनों में असंतुलन प्रायः यह दर्शाता है कि जो लोग दान की सबसे अधिक क्षमता रखते हैं, वे कभी-कभी जरूरतमंद लोगों से भावनात्मक रूप से सबसे कम जुड़े होते हैं। और जो लोग भावनात्मक रूप से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, जैसे सामाजिक कार्यकर्ता, स्वयंसेवक या देखभालकर्ता, उनके पास अक्सर एजेंसी, वित्तीय साधन और संरचनात्मक शक्ति का अभाव होता है। यह विसंगति इस बात को रेखांकित करती है कि अच्छे उद्देश्य, भले ही महान हों, के प्रभाव को व्यापक स्तर पर पहुँचाने के लिए सशक्तिकरण, पहुँच तथा संस्थागत सहयोग के साथ संबद्ध होने चाहिए।

इससे भावनात्मक रूप से तनावग्रस्त होने का भी खतरा है। जब व्यक्ति केवल व्यक्तिगत त्याग के माध्यम से प्रणालीगत आवश्यकताओं को पूरा करने का प्रयास करता है, तो इससे थकावट, मोहभंग और कभी-कभी अपराध बोध भी उत्पन्न होता है। कई देखभालकर्ता और जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोग प्रेम से शुरुआत करते हैं, लेकिन अंत में वे उस पीड़ा की विशालता से अभिभूत हो जाते हैं, जिसका समाधान वे नहीं कर सकते। साझा जिम्मेदारी के बिना, प्रेम एक ऐसा भारी बोझ बन जाता है जिसे कोई भी व्यक्ति नहीं उठा सकता।

इसके अतिरिक्त, प्रेम के नाम पर दान के कुछ रूप अनजाने में असमानता या निर्भरता को बढ़ा सकते हैं। गरिमा के बिना दान, या जवाबदेही के बिना सहायता, दाता-प्राप्तकर्ता के बीच एक पदानुक्रम को जन्म दे सकती है जो प्राप्तकर्ता की स्वतंत्रता छीन लेती है। वास्तविक दान के लिए न केवल समानुभूति की आवश्यकता होती है, बल्कि शक्ति की गतिशीलता, सततता और हस्तक्षेप के दीर्घकालिक प्रभावों के बारे में जागरूकता की भी आवश्यकता होती है।

और यदि प्रेम को संरचनात्मक रूप से स्थापित करना है, तो उसे प्रदर्शन की बाध्यता का भी सामना करना पड़ेगा। आज की दुनिया में, दान की भावनात्मक प्रामाणिकता को न केवल व्यवस्थागत कमियों से, बल्कि सामाजिक अपेक्षाओं और डिजिटल दृष्टिकोण से भी चुनौती मिल रही है। यह हमें एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक चिंतन की ओर ले जाता है।

प्रदर्शन-केंद्रित संस्कृति: दान में प्रेम क्यों लुप्त हो रहा है

आज की अति-दृश्यमान, डिजिटल रूप से संचालित दुनिया में, दान का स्वरूप हमेशा उपस्थिति से नहीं, बल्कि प्रदर्शन से निर्धारित होता है। सोशल मीडिया बड़े दान, वायरल अभियानों और मात्रात्मक संकेतकों को मान्यता प्रदान करता है, जबकि शांत, अथक प्रयास प्रायः अनदेखे रह जाते हैं। परिणामस्वरूप, देने का सार मानवीय संबंध से हटकर दृष्टि, पैमाने और सामाजिक पूँजी की ओर परिवर्तित हो रहा है। हम ‘क्या’ की सराहना करते हैं और ‘कैसे’ के बारे में पूछना भूल जाते हैं।

आधुनिक व्यवस्थाएँ भी इस बदलाव को दर्शाती हैं। दान संबंधी प्रयास, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व, और यहां तक कि सरकारी कल्याणकारी अभियान भी प्रायः भावनात्मक प्रतिध्वनि पर नहीं, बल्कि लक्ष्य प्राप्ति पर केंद्रित होते हैं। दक्षता ही मापदंड बन जाती है, तथा करुणा को दरकिनार कर दिया जाता है। सहायता प्राप्त करने वाले व्यक्ति को रिपोर्ट में एक संख्या तक सीमित कर दिया जाता है, तथा सहायता देने वाले को आदान-प्रदान की मानवीय वास्तविकता से दूर कर दिया जाता है। देखभाल का यह अवैयक्तिकरण दान की परिवर्तनकारी क्षमता को नष्ट कर देता है, जिससे यह समानुभूति की बजाय प्रशासन जैसा अधिक लगता है।

इसके अलावा, अत्यधिक परिश्रम से उपजी थकावट, परायापन और लेन-देनपरक संबंधों में वृद्धि यह संकेत देती है कि हमारे सामाजिक ताने-बाने से कोई महत्वपूर्ण तत्व लुप्त हो गया है। जबकि भौतिक दान जारी है, भावनात्मक दान में गिरावट आ रही है। लोग धनराशि तो दान कर रहे हैं, लेकिन दयालुता प्रतिबिंबित नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे समय में जब एकाकीपन को महामारी कहा जा रहा है, ब उदारता में समाहित हमारा प्रेम ही वह औषधि हो सकती है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।

यह अनुभूति हमें एक निर्णायक प्रश्न पर ले आती है, “हम उस संस्कृति को कैसे पुनः प्राप्त और पुनर्निर्माण कर सकते हैं जहां प्रेम उदारता के केन्द्र में है”? इसका उत्तर केवल महान विचारों में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के व्यवहारों में निहित है।

प्रेमपूर्ण उदारता की संस्कृति का संवर्धन

दान के परिदृश्य को वास्तव में बदलने के लिए, हमें अलग-अलग कार्यों से हटकर एक ऐसी संस्कृति की ओर बढ़ना होगा जहाँ प्रेम में निहित उदारता एक साझा सामाजिक नैतिकता बन जाए। यह संस्कृति संस्थाओं से नहीं, बल्कि व्यक्तियों से शुरू होती है, जिस तरह से हम सुनते हैं, एक-दूसरे के साथ समय व्यतीत करते हैं, तथा दिन-प्रतिदिन एक-दूसरे के लिए उपस्थित होते हैं।

यह समय देने, ध्यान देने, प्रोत्साहन देने या केवल निर्णय न देने के मानवीय दैनिक निर्णयों में निहित है। यह तब पुष्ट होता है जब हम दूसरों को परोपकार की वस्तु मानने के बजाय उन्हें गरिमा और संभावनाओं में समान समकक्ष समझने लगते हैं। ऐसी संस्कृति में, देने का अर्थ “दाता” का गुणी होना नहीं है, बल्कि पारस्परिक देखभाल के ताने-बाने को सुदृढ़ करना है।

यहाँ शिक्षा की अहम भूमिका है। स्कूलों में समानुभूति और भावनात्मक साक्षरता सिखाना, सेवा को दायित्व के रूप में नहीं बल्कि संबंधों के रूप में प्रोत्साहित करना, तथा शांत, प्रेम से परिपूर्ण दान की कहानियों का जश्न मनाना, एक ऐसी पीढ़ी के लिए बीज बोने में मदद कर सकता है जो अपराधबोध या प्रतिष्ठा के कारण नहीं, बल्कि साझा मानवता के कारण दान करती है।

इसके अतिरिक्त, जब व्यवस्थाएँ और नीतियाँ करुणा को केंद्र में रखकर बनाई जाती हैं, तो वे सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा, सुलभ शिक्षा या सामाजिक सुरक्षा तंत्र के रूप में प्रेम की संरचनात्मक अभिव्यक्तियोँ का निर्माण करती हैं। ये सिर्फ़ नौकरशाही व्यवस्थाएँ नहीं हैं। ये समाज का यह कहने का तरीका है: “आप मायने रखते हैं। हम आपकी परवाह करते हैं।”

अंततः, प्रेमपूर्ण उदारता विकसित करने के लिए आंतरिक अभ्यास आवश्यक है। आत्म-जागरूकता, भावनात्मक नियंत्रण, और असुविधाजनक होने पर भी करुणा से कार्य करने का साहस। ये वे पद्धतियां हैं जो वास्तविक दानशील जीवन को बनाए रखती हैं। जब हम अपने आंतरिक उद्देश्यों को अपने बाह्य कार्यों के साथ संरेखित करते हैं, तो दान करना बोझ नहीं, बल्कि हमारी प्रकृति का स्वाभाविक विस्तार बन जाता है।

दान केवल एक कार्य नहीं है। यह एक दर्पण है जो दर्शाता है कि हम कौन हैं, हम किसे महत्व देते हैं, तथा हम अपनी साझा मानवता को कितनी गहराई से पहचानते हैं। चाहे उपहार भौतिक हो या भावनात्मक, दृश्यमान हो या मौन, यह दाता की आंतरिक दुनिया का एक अंश अपने भीतर समेटे होता है। इस दृष्टि से, दान, धन या शक्ति की नहीं, बल्कि उपस्थिति, देखभाल और नैतिक कल्पना की अभिव्यक्ति का एक रूप बन जाता है।

जैसे-जैसे हम बढ़ते अलगाव और असमानता के विश्व से होकर गुज़र रहे हैं, उदारता के एक अधिक सचेत, संबंधपरक रूप की आवश्यकता बेहद तीव्र हो जाती है। यह उदारता केवल अंतराल को कम करने वाली ही नहीं, बल्कि विशेषाधिकार और पीड़ा, अपरिचितों और पड़ोसियों, अलगाव और अपनत्व के बीच सेतु का निर्माण करने वाली होनी चाहिए। ऐसी उदारता यह नहीं पूछती कि, “मेरे पास अतिरिक्त क्या है?” बल्कि यह पूछती है कि, “आपको क्या चाहिए जिसका मैं सम्मान, आदर और पोषण कर सकूँ?”

केवल प्रचुरता से नहीं, बल्कि सचेत ध्यान से; मात्र कर्त्तव्यबोध से नहीं, बल्कि प्रामाणिक मान्यता से देना सीखकर हम स्वयं को लेन-देन की सीमा से परे किसी महानतर अनुभव के लिए तैयार करते हैं। हम परिवर्तन की ओर कदम बढ़ाते हैं। दान तब समकालीन उपेक्षा के विरुद्ध एक मौन प्रतिरोध बन जाता है, जब एक दैनिक पुष्टिकरण कि किसी की भी आवश्यकता इतनी नगण्य नहीं होती कि उस पर ध्यान न दिया जाए, और यह कि प्रेम, जब बिना किसी एजेंडे के अर्पित किया जाता है, तब भी पुनर्स्थापित करने, पुनर्संयोजन और नवीनीकृत करने की शक्ति रखता है।

संबंधित उद्धरण:

  • “दान करने से कोई कभी गरीब नहीं हुआ।” – ऐनी फ्रैंक
  • “दान देने का तरीका उपहार से अधिक मूल्यवान है।” – पियरे कॉर्नेल
  • “हम अपने लिए जो करते हैं, वह हमारे साथ ही समाप्त जाता है। हम दूसरों और संसार के लिए जो करते हैं, वह अमर रहता है।” – अल्बर्ट पाइन
  • “परोपकार वंचित न्याय का विकल्प नहीं बन सकता।”– सेंट ऑगस्टाइन
  • “किसी भी समाज की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमज़ोर सदस्यों के साथ किस प्रकार व्यवहार करता है।” – महात्मा गांधी

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