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प्रश्न की मुख्य माँग
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संसद में लगातार होने वाले व्यवधानों ने उसके विमर्शात्मक स्वरूप को क्षीण किया है, कार्यपालिका की जवाबदेही को कमजोर किया है तथा प्रतिनिधिक विधि-निर्माण की गुणवत्ता को प्रभावित किया है। बार-बार स्थगन, बहस के समय में कमी और टकरावपूर्ण राजनीति ने लोकतांत्रिक अवनति की आशंकाएँ बढ़ा दी हैं। ऐसी स्थिति में संसद की प्रभावशीलता और विश्वसनीयता बहाल करने हेतु संस्थागत सुधार अत्यावश्यक हो गए हैं।
संसद का पुनर्जीवन तभी संभव है जब संस्थागत सुधारों के साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति, नैतिक नेतृत्व और लोकतांत्रिक मानदंडों के प्रति सम्मान भी हो। समितियों, जवाबदेही के उपकरणों और संसदीय मर्यादा को सुदृढ़ करना, सहमति-निर्माण के साथ-साथ आवश्यक है, ताकि संसद एक विमर्शात्मक, प्रतिनिधिक और जवाबदेह लोकतांत्रिक संस्था के रूप में प्रभावी ढंग से कार्य कर सके।
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