प्रश्न की मुख्य माँग
- विधायी एवं व्यापार सुधार: निवेश को सुदृढ़ बनाना।
- संबंधित चिंताएँ।
- दीर्घकालिक आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा के लिए महत्त्व।
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उत्तर
‘रिफॉर्म एक्सप्रेस 2025’ तात्कालिक और दिखावटी नीतिगत हस्तक्षेपों से आगे बढ़कर भारत के क्रमिक एवं सतत् संस्थागत सुदृढ़ीकरण की दिशा में स्पष्ट संक्रमण को दर्शाता है। नियामक ढाँचे के आधुनिकीकरण के माध्यम से राज्य निजी क्षेत्र की अनिश्चितताओं को दीर्घकालिक निवेश-विश्वास में परिवर्तित कर रहा है, जिससे आगामी विकास चरण के लिए एक मजबूत, स्थायी आधार तैयार हो रहा है।
विधायी और व्यापार सुधार: निवेश को सुदृढ़ बनाना
- विश्वास-आधारित विधान: नियंत्रण-उन्मुख विनियमन से सुगम शासन की ओर संक्रमण का उदाहरण निरसन एवं संशोधन विधेयक, 2025 है, जिसने 71 अप्रचलित अधिनियमों को निरस्त कर दिया।
- उदाहरण: 4,458 छोटे अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना, उद्यमियों और लघु एवं मध्यम उद्यमों के लिए “अनुपालन भय” और कानूनी उत्पीड़न को कम करना।
- श्रम बाजार का आधुनिकीकरण: चार श्रम संहिताओं (नवंबर 2025) के पूर्ण कार्यान्वयन ने 29 विखंडित केंद्रीय कानूनों को प्रतिस्थापित कर दिया, जिससे कंपनियों को परिचालन लचीलापन मिला और साथ ही श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा का विस्तार हुआ।
- डिजिटल व्यापार सुविधा: मैनुअल अनुमोदन से आगे बढ़ते हुए, ट्रेड कनेक्ट ई-प्लेटफॉर्म और भारत आयात निर्यात लैब सेतु जैसे प्लेटफॉर्म ने परीक्षण तथा प्रमाणन को डिजिटल रूप से एकीकृत कर दिया है।
- उदाहरण: राष्ट्रीय एकल खिड़की प्रणाली (NSWS), एक ऐसा डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो व्यवसायों को आवश्यक अनुमोदनों के बारे में मार्गदर्शन करता है और उन्हें ऑनलाइन आवेदन करने में सहायता करता है।
- रणनीतिक व्यापार कूटनीति: भारत का “व्यावसायिक रूप से सार्थक” मुक्त व्यापार समझौतों (जैसे- ब्रिटेन, ईएफटीए, न्यूजीलैंड) की ओर झुकाव उच्च स्तरीय बाजार पहुँच और निवेश प्रतिबद्धताओं को सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।
- उदाहरण: भारत-ब्रिटेन CETA (जुलाई 2025) भारतीय निर्यात के 90% हिस्से को शुल्क-मुक्त पहुँच प्रदान करता है, जिससे इंजीनियरिंग और वस्त्र क्षेत्रों को महत्त्वपूर्ण बढ़ावा मिलता है।
संबद्ध चिंताएँ
- स्थानीय कार्यान्वयन में कमियाँ: केंद्रीय कानून मजबूत होने के बावजूद, विभिन्न राज्यों में जिला स्तर पर “इंस्पेक्टर राज” और लाल फीताशाही एक महत्त्वपूर्ण बाधा बनी हुई है।
- न्यायिक लंबित कार्य: भारतीय अदालतों में अनुबंध प्रवर्तन और विवाद समाधान की धीमी गति के कारण व्यापार और श्रम क्षेत्र में संस्थागत सुधार अक्सर बाधित होते हैं।
- नियामक अतिक्रम: डिजिटल व्यापार और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में कई अतिव्यापी नियामकों के कारण “नीतिगत अस्पष्टता” उत्पन्न हो सकती है, जिससे विदेशी निवेशक भ्रमित हो सकते हैं।
- वैश्विक चुनौतियाँ: घरेलू सुधारों के बावजूद, प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में बढ़ते संरक्षणवाद और “मित्र देशों से निवेश” की प्रवृत्ति भारत के व्यापार सुगमीकरण प्रयासों से होने वाले लाभों को सीमित कर सकती है।
दीर्घकालिक आर्थिक प्रतिस्पर्द्धा के लिए महत्त्व
- दीर्घकालीन जोखिम-मुक्ति: शांति अधिनियम और समुद्री कानूनों (बंदरगाह अधिनियम, 2025) में सुधार पूँजी-प्रधान क्षेत्रों के लिए आवश्यक 20-30 वर्षों की नीतिगत स्थिरता प्रदान करते हैं।
- उदाहरण: ₹69,725 करोड़ का जहाज निर्माण पैकेज, जिसका उद्देश्य विदेशी जहाजों पर भारत की 95% समुद्री व्यापार निर्भरता को कम करना है।
- उत्पादकता में वृद्धि: 47,000 से अधिक अनुपालनों को कम करके, राज्य ने व्यवसायों को “औपचारिकताएँ पूर्ण करने” के बजाय अनुसंधान एवं विकास तथा नवाचार-आधारित विकास पर संसाधन लगाने की अनुमति दी है।
- उदाहरण: बेहतर नियामक गुणवत्ता के प्रत्यक्ष परिणामस्वरूप भारत वर्ष 2025 के वैश्विक नवाचार सूचकांक में 38वें स्थान पर पहुँच गया।
- पूर्वानुमानित बाजार प्रशासन: प्रतिभूति बाजार संहिता विधेयक SEBI की प्रवर्तन क्षमता को मजबूत करता है, जिससे भारत के पूँजी बाजार पारदर्शी और व्यापक बने रहते हैं।
- उदाहरण: वर्ष 2025 में भारत की संप्रभु साख को BBB स्तर तक उन्नत करना, इसकी संस्थागत मजबूती में वैश्विक विश्वास को दर्शाता है।
- ऊर्जा सुरक्षा बफर: गहन जल में अन्वेषण और परमाणु ऊर्जा में निरंतर सुधार से लचीले विनिर्माण के लिए स्थिर, कम कार्बन उत्सर्जन वाली आधारभूत विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित होती है।
- उदाहरण: नए शांति ढाँचे के तहत निजी भागीदारी द्वारा समर्थित वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु क्षमता का लक्ष्य।
निष्कर्ष
“रिफॉर्म एक्सप्रेस 2025” की दिशा से संकेत मिलता है कि भारत ने एक संरचनात्मक वास्तविकता को आत्मसात् कर लिया है: एक विखंडित विश्व में, प्रतिस्पर्द्धात्मकता आकस्मिक घोषणाओं के बजाय विश्वसनीय संस्थानों के माध्यम से अर्जित की जाती है। इस गति को बनाए रखने के लिए “टीम इंडिया” दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जहाँ राज्य केंद्रीय सुधारों का समर्थन करें ताकि व्यापार करने का अंतिम चरण भी पहले चरण की तरह ही सुगम हो।