प्रश्न की मुख्य माँग
- कृषि क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।
- राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर प्रभावों की चर्चा कीजिए।
- संतुलनकारी रणनीति का वर्णन कीजिए।
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उत्तर
भारत–अमेरिका व्यापार समझौते पर चल रही वार्ताओं के बीच, कृषि एक संवेदनशील मुद्दे के रूप में उभरी है, जहाँ बाजार पहुँच, किसानों का कल्याण और सांस्कृतिक चिंताएँ परस्पर जुड़ती हैं। यह स्थिति वैश्विक सहभागिता के साथ-साथ राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की सुरक्षा को लेकर महत्त्वपूर्ण प्रश्न खड़े करती है।
कृषि क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ
- सब्सिडी में असमानता: विकसित देश कृषि पर उच्च सब्सिडी प्रदान करते हैं, जिससे प्रतिस्पर्द्धा प्रभावित होती है।
- उदाहरण: अमेरिकी किसानों को भारी समर्थन मिलता है, जबकि भारत की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली पर विश्व व्यापार संगठन द्वारा सब्सिडी घटाने का दबाव है।
- आयात में वृद्धि: सस्ते आयात घरेलू बाजार को भर सकते हैं, जिससे कीमतें गिरती हैं।
- उदाहरण: अमेरिका से मक्का, सोयाबीन और दालों के संभावित आयात से भारतीय किसानों की आय प्रभावित हो सकती है।
- आनुवंशिक रूप से संशोधित (GM) उत्पादों की चिंता: ऐसे उत्पादों के प्रवेश से स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी जोखिम उत्पन्न होते हैं।
- उदाहरण: भारत विषाक्तता और दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभावों की आशंका के कारण जीएम मक्का और सोयाबीन के आयात को सीमित करता है।
- डेयरी क्षेत्र की संवेदनशीलता: उत्पादन पद्धतियों में अंतर स्वीकार्यता को प्रभावित करता है।
- उदाहरण: गैर-शाकाहारी आहार पर पाले गए पशुओं से प्राप्त अमेरिकी डेयरी उत्पाद भारतीय सांस्कृतिक मान्यताओं से टकराते हैं।
- एथेनॉल क्षेत्र में व्यवधान: आयात घरेलू मूल्य शृंखला को प्रभावित कर सकते हैं।
- उदाहरण: एथेनॉल उत्पादन हेतु अमेरिकी मक्का का आयात भारत के एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को बाधित कर सकता है और अतिरिक्त आपूर्ति उत्पन्न कर सकता है।
राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर प्रभाव
- किसानों की परेशानी: सब्सिडी प्राप्त अमेरिकी उत्पादों से प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने पर छोटे किसानों की आय सुरक्षा कमजोर हो सकती है और कृषि संकट गहरा सकता है।
- खाद्य संप्रभुता: आयात पर निर्भरता आत्मनिर्भरता को प्रभावित कर सकती है।
- उदाहरण: कृषि आवश्यकताओं का लगभग 18% आयात करने से बाहरी निर्भरता का जोखिम बढ़ता है।
- सांस्कृतिक मूल्य: व्यापार समझौते सामाजिक मान्यताओं से टकरा सकते हैं।
- उदाहरण: डेयरी आयात का गैर-शाकाहारी पशु आहार से जुड़ा होना भारतीय परंपराओं के विपरीत है।
- नीतिगत स्वायत्तता: बाहरी दबाव घरेलू नीति-निर्माण को सीमित कर सकता है।
- उदाहरण: विश्व व्यापार संगठन द्वारा MSP और सब्सिडी ढाँचे को कमजोर करने का दबाव।
- रोजगार पर जोखिम: संबद्ध क्षेत्रों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकता है।
- उदाहरण: वस्त्र और चमड़ा उद्योग, जो लाखों लोगों को रोजगार देते हैं, वार्ताओं में शुल्क दबाव का सामना कर सकते हैं।
संतुलनकारी रणनीति
- चयनात्मक उदारीकरण: गैर-संवेदनशील क्षेत्रों को उदार बनाते हुए कृषि क्षेत्र की सुरक्षा करना।
- उदाहरण: भारत सूचना प्रौद्योगिकी और औषधि क्षेत्रों में लाभ के लिए वार्ता कर रहा है, जबकि कृषि क्षेत्र में रियायतों का विरोध कर रहा है।
- सुरक्षात्मक उपाय: डंपिंग को रोकने के लिए शुल्क और कोटा का उपयोग।
- उदाहरण: विश्व व्यापार संगठन के अनुरूप एंटी-डंपिंग शुल्क लगाना।
- मानक विनियमन: स्वास्थ्य और सुरक्षा मानकों को सख्ती से बनाए रखना।
- उदाहरण: खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों के आधार पर जीएम खाद्य आयात पर प्रतिबंध जारी रखना।
- किसान समर्थन: घरेलू प्रतिस्पर्द्धात्मकता को मजबूत करना।
- उदाहरण: पीएम-किसान योजना और उर्वरक सब्सिडी के माध्यम से लागत असमानताओं को कम करना।
- रणनीतिक वार्ता: रियायतों को पारस्परिक लाभों से जोड़ना।
- उदाहरण: कृषि क्षेत्र खोलने से पहले भारतीय उत्पादों के लिए अमेरिकी बाजार में अधिक पहुँच की माँग करना।
निष्कर्ष
भारत की व्यापार कूटनीति को किसानों के कल्याण और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर आधारित होना चाहिए, ताकि वैश्विक एकीकरण से घरेलू सुदृढ़ता, सांस्कृतिक मूल्यों या नीतिगत स्वायत्तता से समझौता न हो, बल्कि यह समानतापूर्ण और सतत् आर्थिक विकास को सुदृढ़ करे।
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