Q. जलवायु-लचीले और न्यायसंगत शहरी विकास को सुनिश्चित करने में शहरी स्थानीय निकायों की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। शहरी जवाबदेही और क्षमता को मजबूत करने के लिए आवश्यक शासन एवं राजकोषीय सुधारों पर चर्चा कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • जलवायु-लचीलापन और न्यायसंगत विकास में शहरी स्थानीय निकायों की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
  • शहरी क्षमता को मजबूत करने हेतु आवश्यक शासन सुधारों का उल्लेख कीजिए। 
  • इसके लिए आवश्यक राजकोषीय सुधारों की चर्चा कीजिए।

उत्तर

जैसे-जैसे देश विकसित भारत की ओर बढ़ रहा है, शहरों को वायु प्रदूषण, जल संकट और लू जैसी जलवायु संबंधी बढ़ती चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। अकेले बृहन्मुंबई नगर निगम द्वारा 8 अरब डॉलर के वार्षिक व्यय की योजना के साथ, सशक्त शहरी स्थानीय निकाय जलवायु-लचीलापन और न्यायसंगत शहरी परिवर्तन के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं।

जलवायु-लचीलापन एवं समावेशी विकास में शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) की भूमिका

  • जलवायु-अनुकूलन शहरी नियोजन: शहरी स्थानीय निकाय भूमि उपयोग, जल प्रणालियों तथा अवसंरचना का विनियमन करते हैं, ताकि बाढ़ और तापीय तनाव के प्रभाव को कम किया जा सके।
    • उदाहरण: आर्थिक सर्वेक्षण में रहने योग्य शहरों को लचीलापन के केंद्र में रखा गया है।
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं प्रदूषण नियंत्रण: वायु प्रदूषण की निगरानी और शमन रणनीतियों के माध्यम से स्वास्थ्य जोखिमों का समाधान करना।
    • उदाहरण: दिल्ली में प्रत्येक सात में से एक मृत्यु वायु प्रदूषण से जुड़ी है।
  • जल सुरक्षा एवं संसाधन प्रबंधन: शहरी जल आपूर्ति, भूजल पुनर्भरण तथा अपशिष्ट जल प्रबंधन स्थानीय शहरी निकायों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं।
    • उदाहरण: अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत के 40% शहरों को जल संकट का सामना करना पड़ सकता है।
  • समानता हेतु सेवा प्रदायगी: कचरा प्रबंधन, परिवहन और आवास सेवाएँ समावेशी विकास सुनिश्चित करती हैं।
  • स्थानीयकृत जलवायु अनुकूलन: ताप संबंधी कार्य योजना तथा आपदा प्रतिक्रिया तंत्र के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए नगर-स्तरीय कार्यान्यवन आवश्यक है।

आवश्यक शासन सुधार

  • शक्तियों का स्पष्ट हस्तांतरण: 74वें संविधान संशोधन के अंतर्गत शहरी स्थानीय निकायों की कार्यात्मक स्वायत्तता को सुदृढ़ किया जाए। 
  • समग्र जवाबदेही ढाँचा: केवल तात्कालिक उपलब्धियों के मापदंडों तक सीमित न रहकर दीर्घकालिक लचीलापन संकेतकों को अपनाया जाए।
    • उदाहरण: चीन की लक्षित उत्तरदायित्व प्रणाली से सीख लेते हुए प्रतिकूल प्रोत्साहनों से बचाव सुनिश्चित किया जाए।
  • सामाजिक अंकेक्षण को अनिवार्य बनाना: पारदर्शिता और समावेशिता सुनिश्चित करने हेतु समुदाय-आधारित सामाजिक अंकेक्षण को संस्थागत रूप दिया जाए।
  • प्रशासनिक रिक्तियों की पूर्ति: भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (2021) के अनुसार, शहरी स्थानीय निकायों में लगभग 20% पद रिक्त हैं, जिनमें निर्वाचित पद भी शामिल हैं।
  • विशेष प्रयोजन वाहनों की जवाबदेही सुदृढ़ करना: स्मार्ट सिटी मिशन के पश्चात् भी विशेष प्रयोजन वाहनों को लोकतांत्रिक रूप से उत्तरदायी बनाए रखना सुनिश्चित किया जाए।

आवश्यक राजकोषीय सुधार

  • राजस्व स्वायत्तता में वृद्धि: राज्यों को शहरी स्थानीय निकायों को कराधान संबंधी अधिक अधिकार हस्तांतरित करने चाहिए।
  • नगरपालिका बॉण्ड बाजार को सुदृढ़ करना: नवंबर 2025 तक लगभग 6,000 शहरी स्थानीय निकायों में से केवल 21 ने ही 42 मिलियन डॉलर मूल्य के बॉंण्ड जारी किए हैं।
  • प्रोत्साहन-आधारित वित्तपोषण: केंद्र सरकार के बजट में उन शहरों के लिए ₹100 करोड़ का प्रोत्साहन प्रावधानित है, जो ₹1,000 करोड़ के बॉंण्ड जुटाते हैं।
  • बहुवर्षीय बजट व्यवस्था का प्रावधान: विकास-संबंद्ध वित्तीय नियोजन को सुनिश्चित करने हेतु बहुवर्षीय बजट को वैधानिक रूप से अनिवार्य बनाया जाए।
  • ऋण स्थिरता सुनिश्चित करना: चीन के स्थानीय सरकारी वित्तपोषण वाहनों के उदाहरण (लगभग 9 ट्रिलियन डॉलर के ऋण संचय) की भाँति अत्यधिक ऋण-निर्भरता से बचना आवश्यक है।

निष्कर्ष

शहरी जलवायु-लचीलापन सुनिश्चित करने के लिए सशक्त, जवाबदेह तथा वित्तीय रूप से सक्षम शहरी स्थानीय निकाय अनिवार्य हैं। वित्तीय स्वायत्तता को पारदर्शी शासन, सहभागी सामाजिक अंकेक्षण और सतत् ऋण ढाँचे के साथ संतुलित कर शहरों को समावेशी विकास के प्रेरक केंद्रों में परिवर्तित किया जा सकता है। इससे तीव्र होती जलवायु अनिश्चितताओं के दौर में भारत की शहरी परिवर्तन प्रक्रिया अधिक सुदृढ़ और लचीली बनी रह सकेगी।

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