Q. मध्य पूर्व में द्विपक्षीय संघर्षों का भारत पर भू-राजनीतिक प्रभाव का विश्लेषण कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • भारत पर नकारात्मक प्रभावों का उल्लेख कीजिए।
  • भारत पर सकारात्मक प्रभावों का वर्णन कीजिए।

उत्तर

पश्चिम एशिया में द्विपक्षीय संघर्ष, जो ईरान और अरब देशों के बीच शक्ति असंतुलन में निहित हैं, निरंतर अस्थिरता को जन्म देते हैं। क्षेत्र के साथ भारत के आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को देखते हुए, ऐसे संघर्ष भारत के लिए महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक प्रभाव उत्पन्न करते हैं।

भारत पर नकारात्मक प्रभाव

  • ऊर्जा सुरक्षा जोखिम और मूल्य अस्थिरता: भारत अपने कच्चे तेल का 80% से अधिक आयात करता है जिसमें एक बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आता है। जिस होरमुज़ जलडमरूमध्य से वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20% गुजरता है, उसके आसपास तनाव आपूर्ति में बाधा और आयात बिल में वृद्धि का कारण बनता है।
  • भारतीय प्रवासी समुदाय की संवेदनशीलता: खाड़ी क्षेत्र में लगभग 8–9 मिलियन भारतीय निवास करते हैं। संघर्ष (जैसे ईरान से जुड़े तनाव) उनकी सुरक्षा को खतरे में डालते हैं और प्रेषण (remittances) के प्रवाह को प्रभावित करते हैं, जो भारत की अर्थव्यवस्था में वार्षिक 100 अरब डॉलर से अधिक का योगदान देते हैं।
  • रणनीतिक संतुलन की बाधाएँ: भारत को ईरान, सऊदी अरब और इज़राइल जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों के साथ संबंध बनाए रखने पड़ते हैं, जिससे नीतिगत लचीलापन सीमित होता है और कूटनीतिक दबाव बढ़ता है।
  • व्यापार और संपर्क परियोजनाओं में व्यवधान: ईरान में चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (International North-South Transport Corridor) जैसी परियोजनाएँ प्रतिबंधों और अस्थिरता के कारण प्रभावित होती हैं, जिससे मध्य एशिया तक भारत की पहुँच बाधित होती है।
  • सुरक्षा और कट्टरपंथीकरण की चिंताएँ: प्रॉक्सी संघर्ष और सांप्रदायिक तनाव चरमपंथी विचारधाराओं के प्रसार का जोखिम बढ़ाते हैं, जो भारत के लिए अप्रत्यक्ष आंतरिक सुरक्षा चुनौतियाँ उत्पन्न करते हैं।.

भारत पर सकारात्मक प्रभाव

  • रणनीतिक महत्त्व में वृद्धि: भारत की तटस्थ और संतुलित नीति उसे ईरान तथा खाड़ी देशों जैसे प्रतिस्पर्धी पक्षों के बीच स्वीकार्यता प्रदान करती है, जिससे उसकी कूटनीतिक प्रभावशीलता बढ़ती है।
    • उदाहरण: होरमुज़ जलडमरूमध्य संकट के दौरान भारत ने ईरान से अपने जहाजों के लिए सुरक्षित मार्ग सुनिश्चित किया, जो उसकी कूटनीतिक क्षमता को दर्शाता है।
  • ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण: बार-बार होने वाले व्यवधानों ने भारत को अपने आयात स्रोतों में विविधता लाने के लिए प्रेरित किया है (जैसे अमेरिका और अन्य क्षेत्रों से आयात बढ़ाना), जिससे दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा सुदृढ़ होती है।
  • आर्थिक और सुरक्षा साझेदारियों के अवसर: क्षेत्रीय समीकरणों में बदलाव, विशेषकर खाड़ी देशों और इज़राइल के बीच बढ़ती निकटता, भारत के लिए व्यापार, प्रौद्योगिकी और रक्षा सहयोग के नए अवसर खोलते हैं।

निष्कर्ष

यद्यपि पश्चिम एशिया के संघर्ष भारत की ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी समुदाय और रणनीतिक स्वायत्तता के लिए चुनौतियाँ प्रस्तुत करते हैं, किंतु वे कूटनीतिक संतुलन और विविधीकरण के अवसर भी प्रदान करते हैं। इन परिस्थितियों का प्रभावी रूप से सामना करने के लिए एक संतुलित, हित-आधारित विदेश नीति अत्यंत आवश्यक है।

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