Q. भारतीय इस्पात क्षेत्र क्षमता विस्तार और जलवायु प्रतिबद्धताओं के चौराहे पर खड़ा है। इस संदर्भ में 'कार्बन लॉक-इन' की अवधारणा पर चर्चा कीजिए। 'ग्रीन स्टील' की ओर संक्रमण भारत को कार्बन उत्सर्जन नियंत्रण (CBAM) जैसी वैश्विक चुनौतियों से निपटने और अपने कार्बन उत्सर्जन मंदन लक्ष्यों को प्राप्त करने में कैसे मदद कर सकता है? (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • इस्पात क्षेत्र में ‘कार्बन उत्सर्जन न्यूनीकरण (कार्बन लॉक-इन)’ की अवधारणा
  • ‘ग्रीन स्टील’ के माध्यम से सीबीएएम (CBAM) और वि-कार्बनीकरण को समझना

उत्तर

भारत का इस्पात क्षेत्र एक महत्त्वपूर्ण मोड़ पर है, जिसका लक्ष्य अपनी नेट जीरो 2070 प्रतिबद्धताओं का पालन करते हुए वर्ष 2030 तक अपनी क्षमता को दोगुना कर 300 मिलियन टन प्रति वर्ष (MTPA) करना है। इस दोहरी महत्त्वाकांक्षा के लिए पारंपरिक, अत्यधिक कार्बन-सघन उत्पादन विधियों से हटकर “ग्रीन स्टील” की ओर बढ़ने की आवश्यकता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि भारत का बुनियादी ढाँचागत विकास उसकी जलवायु अखंडता या वैश्विक व्यापार प्रतिस्पर्द्धा की कीमत पर न हो।

इस्पात क्षेत्र में ‘कार्बन उत्सर्जन न्यूनीकरण (कार्बन लॉक-इन)’ की अवधारणा

कार्बन लॉक-इन तब होता है जब संस्थागत, तकनीकी और आर्थिक अवरोध के कारण जीवाश्म-ईंधन-गहन प्रणालियाँ स्वयं को बनाए रखती हैं, जिससे स्वच्छ विकल्पों की ओर संक्रमण तेजी से महँगा और कठिन हो जाता है।

  • संपत्ति का दीर्घकालिक जीवन: इस्पात संयंत्रों का जीवनकाल 30-40 वर्ष होता है; आज कोयला-आधारित ब्लास्ट फर्नेस में निवेश करना भारत को दशकों तक उच्च उत्सर्जन में की ओर अग्रसर कर देता है।
  • अवसंरचनात्मक प्रतिबद्धता: स्थापित आपूर्ति शृंखलाएँ, जैसे कोकिंग कोल के लिए रेल लिंक, विकेंद्रीकृत नवीकरणीय ऊर्जा या हाइड्रोजन-आधारित अवसंरचना की ओर संक्रमण कठिन बना देती हैं। 
  • तकनीकी जड़ता : ब्लास्ट फर्नेस-बेसिक ऑक्सीजन फर्नेस (BF-BOF) मार्ग का प्रभुत्व, जो भारत के $CO_2$ उत्सर्जन में लगभग 12% का योगदान देता है, मौलिक नवाचार के लिए उत्साह को सीमित करता है।
  • पूर्व-निवेशित लागत: पारंपरिक संयंत्रों में उच्च पूँजीगत व्यय, कर्ज में डूबी इस्पात कंपनियों के लिए समय से पूर्व सेवानिवृत्ति या “री-प्लेटफॉर्मिंग” को वित्तीय रूप से अव्यवहार्य बनाता है।
  • कौशल-आधारित बाधाएँ: मौजूदा कार्यबल मुख्य रूप से पारंपरिक स्मेल्टिंग में प्रशिक्षित है, जो ग्रीन हाइड्रोजन या इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस (EAF) तकनीकों को अपनाने में एक मानव पूँजी बाधा उत्पन्न करता है।
  • पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ: मौजूदा कोयला-आधारित संयंत्र दशकों के अनुकूलन से लाभान्वित होते हैं, जिससे नई हरित तकनीकें अल्पावधि में अप्रतिस्पर्धी लगती हैं।
    उदाहरण: 2025 में, भारत का 70% से अधिक इस्पात अभी भी कोयला-गहन BF-BOF या कोयला-गैसीकरण मार्गों के माध्यम से उत्पादित किया गया था।

‘ग्रीन स्टील’ के माध्यम से सीबीएएम (CBAM) और वि-कार्बनीकरण को समझना 

कोयले के बजाय नवीकरणीय ऊर्जा या ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग करके उत्पादित ग्रीन स्टील, उभरती वैश्विक व्यापार बाधाओं के विरुद्ध एक रणनीतिक ढाल के रूप में कार्य करता है।

  • सीबीएएम (CBAM) प्रभाव को कम करना: ग्रीन स्टील में परिवर्तन कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) या “ग्रीन टैरिफ” से बचने में मदद करता है, जो यूरोपीय संघ (EU) में भारतीय स्टील पर 20-35% कर लगा सकता है।
    • उदाहरण: यूरोपीय संघ ने जनवरी 2026 में निश्चित कार्बन कर वसूली शुरू की, जिसका सीधा प्रभाव उन भारतीय निर्यातकों पर पड़ा, जो अपने शिपमेंट के 15% के लिए यूरोपीय बाजार पर निर्भर हैं।
  • ग्रीन हाइड्रोजन को अपनाना: हाइड्रोजन-आधारित डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (H-DRI) की ओर स्थानांतरित होने से $CO_2$ उत्सर्जन को 2.5 टन प्रति टन स्टील से घटाकर लगभग शून्य किया जा सकता है।
    • उदाहरण: राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन विशेष रूप से इस्पात क्षेत्र में पायलट परियोजनाओं के लिए प्रोत्साहन प्रदान करता है ताकि वर्ष 2030 तक व्यावसायिक व्यवहार्यता हासिल की जा सके।
  • स्क्रैप उपयोग को बढ़ाना: इस्पात स्क्रैप पुनर्चक्रण नीति के माध्यम से चक्रीय अर्थव्यवस्था के सिद्धांतों को बढ़ावा देने से उत्पादन की ऊर्जा तीव्रता 60% तक कम हो जाती है।
  • वैश्विक बाजार पहुँच: ग्रीन स्टील भारतीय कंपनियों को अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे बाजारों में “ग्रीन प्रीमियम” (अतिरिक्त कीमत) प्राप्त करने की अनुमति देता है, जहाँ वाहन निर्माता कम कार्बन आपूर्ति शृंखलाओं की तलाश कर रहे हैं।
  • वित्तीय गतिशीलता: वि-कार्बनिकरण योजनाएँ वैश्विक ईएसजी निवेशकों से ग्रीन बॉण्ड और “सस्टेनेबिलिटी-लिंक्ड लोन” (स्थिरता-संबद्ध ऋण) आकर्षित करती हैं।
    • उदाहरण: टाटा स्टील और जेएसडब्ल्यू (JSW) जैसी प्रमुख कंपनियों ने इलेक्ट्रिक आर्क फर्नेस में अपने संक्रमण को वित्तपोषित करने के लिए वर्ष 2025 में हरित वित्तपोषण हासिल किया है।
  • आंतरिक कार्बन मूल्य निर्धारण: यह संक्रमण कंपनियों को भारत की आगामी कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग योजना (CCTS) के लिए तैयार करने में मदद करता है, जिससे कार्बन दक्षता एक लाभ प्रदान करने के केंद्र में परिवर्तित हो जाती है।
  • ऊर्जा सुरक्षा: घरेलू नवीकरणीय ऊर्जा पर जाकर आयातित कोकिंग कोल (ज्यादातर ऑस्ट्रेलिया से) पर निर्भरता घटाकर राष्ट्रीय ऊर्जा संप्रभुता को सुदृढ़ करता है।”

निष्कर्ष

ग्रीन स्टील केवल एक पर्यावरणीय विकल्प नहीं, बल्कि एक आर्थिक आवश्यकता है। कार्बन लॉक-इन के जाल से बचने के लिए, भारत को अपनी राष्ट्रीय इस्पात नीति में ‘ग्रीन स्टील’ के अधिदेशों को एकीकृत करना होगा। राजकोषीय प्रोत्साहनों को तकनीकी उन्नयन के साथ जोड़कर, भारत सीबीएएम (CBAM) के खतरे को वैश्विक ‘हरित औद्योगिक क्रांति’ का नेतृत्व करने के अवसर में परिवर्तित कर सकता है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि इसका विकास सुदृढ़ और उत्तरदायी दोनों है।

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