Q. भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से सख्त तटस्थता के बजाय नैतिक स्थिति और रणनीतिक हितों के बीच विचलित करती रहती है। पश्चिम एशिया में विकसित हो रही भू-राजनीति के संदर्भ में, यह परीक्षण कीजिए कि भारत का दृष्टिकोण इस बदलाव को कैसे दर्शाता है। (150 शब्द, 10 अंक)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • बताइए कि भारत का दृष्टिकोण पश्चिम एशिया की परिवर्तित भू-राजनीति को कैसे प्रतिबिंबित करता है।
  • विकसित हो रही पश्चिम एशियाई भू-राजनीति में भारत के समक्ष चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।

उत्तर

पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताओं के उभार, ऊर्जा परिवर्तन तथा रणनीतिक पुनर्संरेखण के कारण गहरे भू-राजनीतिक परिवर्तन हुए हैं। भारत की नीति भी धीरे-धीरे वैचारिक दृष्टिकोण से आगे बढ़कर एक व्यावहारिक सहभागिता की ओर विकसित हुई है, जिसका उद्देश्य आर्थिक, ऊर्जा तथा प्रवासी भारतीयों के हितों की रक्षा करना है, साथ ही क्षेत्रीय शक्तियों के बीच जटिल प्रतिस्पर्द्धाओं के मध्य संतुलन बनाए रखना है। 

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पश्चिम एशिया की बदलती भू-राजनीति को प्रतिबिंबित करता भारत का दृष्टिकोण

  • विदेश नीति में रणनीतिक व्यावहारिकता: भारत अब क्षेत्रीय संघर्षों का मूल्यांकन वैचारिक पक्षधरता के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर अधिकाधिक करने लगा है।
  • क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताओं की स्वीकृति: भारतीय नीति अब इस क्षेत्र को केवल अमेरिका-अरब या इजरायल-अरब दृष्टिकोण से नहीं देखती, बल्कि क्षेत्र के आंतरिक संघर्षों और प्रतिस्पर्धाओं को भी ध्यान में रखती है।
    • उदाहरण: ऊर्जा और संपर्क परियोजनाओं में खाड़ी अरब देशों और ईरान के बीच कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना।
  • खाड़ी देशों के साथ गहन साझेदारी: परस्पर निर्भरता के बढ़ने के कारण भारत ने खाड़ी राजतंत्रों के साथ आर्थिक और सुरक्षा सहयोग को गहरा किया है।
    • उदाहरण: नवीनतम रिपोर्टों के अनुसार, खाड़ी क्षेत्र के साथ भारत का व्यापार लगभग 200 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है।
  • बहु-संरेखण की रणनीति: भारत तकनीक, ऊर्जा और संपर्क हितों को सुरक्षित रखने के लिए इज़राइल, अरब देशों और ईरान- सभी के साथ समानांतर संबंध बनाए रखता है।
    • उदाहरण: रक्षा और कृषि क्षेत्रों में इजरायल के साथ सहयोग, साथ ही खाड़ी अरब देशों के साथ मजबूत संबंधों को बनाए रखना।
  • प्रवासी भारतीय और आर्थिक प्राथमिकताएँ: नीतिगत निर्णयों में भारतीय श्रमिकों की सुरक्षा और प्रेषण प्रवाह को सुरक्षित रखने की आवश्यकता भी महत्त्वपूर्ण कारक बनती जा रही है।
    • उदाहरण: लगभग 90 लाख भारतीय खाड़ी देशों में निवास और कार्य करते हैं।

विकसित हो रही पश्चिम एशियाई भू-राजनीति में भारत के समक्ष चुनौतियाँ

  • प्रतिस्पर्धी क्षेत्रीय शक्तियों के बीच संतुलन: भारत को प्रतिस्पर्द्धी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखते हुए ऐसा संतुलन स्थापित करना होता है, जिससे किसी भी पक्ष को अलग-थलग महसूस न हो।
    • उदाहरण: ईरान, इजरायल और खाड़ी अरब राजतंत्रों के बीच रणनीतिक संतुलन बनाए रखना।
  • ऊर्जा सुरक्षा की संवेदनशीलता: पश्चिम एशिया से ऊर्जा आयात पर भारत की भारी निर्भरता उसे भू-राजनीतिक अस्थिरताओं के प्रति संवेदनशील बनाती है।
    • उदाहरण: खाड़ी देश भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हैं।
  • भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा: क्षेत्र में होने वाले संघर्ष लाखों भारतीयों की सुरक्षा और उनके संभावित निकासी के लिए चुनौती उत्पन्न करते हैं।
    • उदाहरण: वर्ष 1990 में सद्दाम हुसैन द्वारा कुवैत के अधिग्रहण के बाद उत्पन्न संकट के दौरान हजारों भारतीयों को निकाला गया था।
  • कूटनीतिक रुख की रणनीतिक लागत: किसी एक पक्ष का समर्थन करना या आलोचना में चयनात्मक प्रतीत होना भारत की वैश्विक विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकता है।
    • उदाहरण: वर्ष 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप पर भारत की सीमित प्रतिक्रिया से इस्लामी जगत में उसकी छवि प्रभावित हुई थी।
  • क्षेत्र में महाशक्तियों की प्रतिस्पर्द्धा का प्रबंधन: अमेरिका, रूस और चीन के मध्य बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा भारत की रणनीतिक लचीलापन को जटिल बनाती है।
    • उदाहरण: यूक्रेन संकट के दौरान रूस की स्थिति की भारत द्वारा खुली आलोचना से दूरी।

निष्कर्ष

भारत को संतुलित बहु-संरेखण की नीति को और गहरा करना चाहिए, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण करना चाहिए तथा क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताओं के बीच व्यापक कूटनीतिक संवाद को मजबूत करना चाहिए। प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा के लिए प्रभावी तंत्र को सुदृढ़ करना, आर्थिक साझेदारियों का विस्तार करना और क्षेत्रीय संवाद को प्रोत्साहित करना पश्चिम एशिया के तेजी से जटिल होते भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत को अपने दीर्घकालिक रणनीतिक तथा आर्थिक हितों को सुरक्षित करने में सहायता करेगा।

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