Q. केंद्रीय सचिवों के लिए प्रदर्शन स्कोरकार्ड की शुरुआत प्रबंधकीय शासन की ओर एक बदलाव को दर्शाती है। संसदीय लोकतंत्र में नीति निर्माण और संस्थागत जवाबदेही पर इसके प्रभावों की चर्चा कीजिए। (10 अंक, 150 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • संसदीय लोकतंत्र में नीति निर्माण के निहितार्थों का वर्णन कीजिेए।
  • संसदीय लोकतंत्र में संस्थागत जवाबदेही के निहितार्थों की विवेचना कीजिए।

उत्तर

हाल ही में केंद्रीय सचिवों के लिए ‘परफॉर्मेंस स्कोरकार्ड’ (प्रदर्शन स्कोरकार्ड) की शुरुआत कॉर्पोरेट-शैली के प्रबंधकीय शासन (मैनेजरियल गवर्नेंस) की ओर बदलाव का संकेत देती है। फाइलों के निपटान और परिणाम-आधारित वितरण जैसे मात्रात्मक संकेतकों को प्राथमिकता देकर, यह भारत के संसदीय लोकतंत्र के भीतर नीति-निर्माण और संस्थागत जवाबदेही पर गहरे संवैधानिक प्रश्न खड़ा करता है।

संसदीय लोकतंत्र में नीति निर्माण के निहितार्थ

  • परिणाम-केंद्रित नीतिगत झुकाव: मुख्य प्रदर्शन संकेतक (KPIs) गति, फाइलों के निपटान और व्यय नियंत्रण पर जोर देते हैं, जिससे विचार-विमर्श आधारित नीति निर्माण गौण हो जाता है।
  • निवारक सलाहकार भूमिका का क्षरण: सचिव मंत्रियों को आलोचनात्मक सलाह देने के बजाय अनुपालन को प्राथमिकता दे सकते हैं।
    • उदाहरण: प्रस्ताव प्रशासनिक रूप से व्यावहारिक, वित्तीय रूप से टिकाऊ और राजनीतिक रूप से व्यवहार्य हों, यह सुनिश्चित करने के दायित्व की अनदेखी करना।
  • संस्थागत स्मृति का कमजोर होना: पहलों को अलग-अलग परियोजनाओं के रूप में देखने से नीतिगत निरंतरता को नुकसान पहुँचता है। नीतियाँ इसलिए बनी रहीं क्योंकि प्रशासकों ने समय के साथ उनमें संशोधन किए।
  • नीतिगत चिंतन का केंद्रीकरण: इसका तात्पर्य है कि नीति निर्माण का कार्य बाहरी सलाहकार संरचनाओं की ओर स्थानांतरित हो सकता है।
  • असहमति की संभावना में कमी: जाँच-परख के बजाय गति को प्रोत्साहित करना असुविधाजनक सत्यों को हतोत्साहित करता है।
    • उदाहरण: प्रणालियाँ गति की कमी के कारण विफल नहीं होतीं, बल्कि तब विफल होती हैं जब निर्णय और असहमति को बाधा माना जाने लगता है।

संसदीय लोकतंत्र में संस्थागत जवाबदेही के निहितार्थ

  • संवैधानिक भूमिका का क्षरण: अनुच्छेद 312 के तहत नागरिक सेवाओं (सिविल सेवा) की रूपरेखा राष्ट्रीय चिंतन और निष्पक्षता के लिए बनाई गई थी, न कि केवल सेवा वितरण के लिए।
  • वरिष्ठ नौकरशाही का हाशिए पर जाना: सचिवों को केवल कार्यान्वयन तक सीमित करने से उनकी रणनीतिक भूमिका कमजोर होती है।
  • भर्ती और प्रशिक्षण संरचना को कमजोर करना: सचिवों के महत्त्व को कम करना अप्रत्यक्ष रूप से संवैधानिक भर्ती प्रणाली को छोटा करता है।
    • उदाहरण: वरिष्ठ अधिकारियों के चयन में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की भूमिका की उपेक्षा।
  • संस्थागत जवाबदेही से प्रबंधकीय जवाबदेही की ओर बदलाव: कॉर्पोरेट-शैली के स्कोरकार्ड स्थापित संसदीय निरीक्षण का स्थान ले रहे हैं।
    • उदाहरण: पारंपरिक रूप से जवाबदेही भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), लोक लेखा समिति (PAC) और प्राकलन समिति द्वारा सुनिश्चित की जाती है।
  • नौकरशाही तटस्थता के लिए जोखिम: नकारात्मक मूल्यांकन का डर स्वतंत्र निर्णय के बजाय सुरक्षित अनुपालन को बढ़ावा दे सकता है। 
    • उदाहरण: सचिव सवाल पूछने से पीछे हट सकते हैं और केवल समय सीमा तथा लक्ष्यों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।

निष्कर्ष

कार्य निष्पादन मूल्यांकन में दक्षता और संवैधानिक दायित्व के बीच संतुलन होना चाहिए। स्कोरकार्ड में नीतिगत स्थिरता, भविष्योन्मुखी शासन और परामर्श की अखंडता जैसे गुणात्मक संकेतकों को शामिल किया जाना चाहिए, साथ ही संसदीय प्रहरियों द्वारा निरीक्षण को और मजबूत किया जाना चाहिए। प्रबंधकीय सुधारों को भारत के संसदीय लोकतंत्र के भीतर नागरिक सेवा (सिविल सेवा) की विचार-विमर्श और सलाहकार भूमिका को मजबूत करना चाहिए, न कि सीमित।

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