Q. मातृत्व और पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा और संवैधानिक अधिकार के रूप में मान्यता देना समानता और परिवार कल्याण की विकसित होती अवधारणाओं को दर्शाता है। इस संदर्भ में, गोद लेने वाली माताओं पर सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले और भारत में लैंगिक-तटस्थ माता-पिता अवकाश नीतियों की आवश्यकता का विश्लेषण कीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)

प्रश्न की मुख्य माँग

  • माता-पिता के अवकाश को संवैधानिक और सामाजिक सुरक्षा अधिकार के रूप में मान्यता देना।
  • कार्यान्वयन में चुनौतियाँ।
  • आगे की राह।

उत्तर

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णय में दत्तक माताओं के लिए मातृत्व लाभों का विस्तार किया गया है, जो संवैधानिक नैतिकता में हो रहे परिवर्तनों को दर्शाता है। यह निर्णय समानता, गरिमा और बाल कल्याण पर बल देता है, साथ ही लिंग-भेद रहित माता-पिता अवकाश नीतियों की तत्काल आवश्यकता को भी उजागर करता है।

माता-पिता अवकाश को संवैधानिक और सामाजिक सुरक्षा अधिकार के रूप में मान्यता देना

  • अनुच्छेद-14 के तहत समानता: बच्चे की आयु के आधार पर दत्तक माताओं के बीच मनमाने भेदभाव को समाप्त करता है।
    • उदाहरण: सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) को अनुच्छेद-14 का उल्लंघन मानते हुए उसकी व्याख्या को सीमित करना।
  • जीवन और गरिमा का अधिकार: मातृत्व और देखभाल को गरिमा और स्वायत्तता का अभिन्न अंग मानता है।
    • उदाहरण: न्यायालय ने माना कि गोद लेना अनुच्छेद-21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता का हिस्सा है।
  • मातृत्व का जैविक पहलू से परे विस्तार: प्रसव से हटकर देखभाल और भावनात्मक जुड़ाव पर ध्यान केंद्रित करता है।
    • उदाहरण: गोद लिए गए बच्चे की आयु चाहे जो भी हो, 12 सप्ताह का अवकाश दिया जाता है।
  • पितृत्व की भूमिका की मान्यता: प्रारंभिक बाल विकास में पिता की भूमिका को स्वीकार करता है।
    • उदाहरण: न्यायालय ने केंद्र सरकार से पितृत्व अवकाश को सामाजिक सुरक्षा के रूप में लागू करने का आग्रह किया।
  • लैंगिक-तटस्थ परिवार कल्याण दृष्टिकोण: यह साझा पालन-पोषण जिम्मेदारियों की ओर अग्रसर है।
    • उदाहरण: निर्णय में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि पितृत्व अवकाश का अभाव लिंगीय भूमिकाओं को सुदृढ़ करता है।

कार्यान्वयन में चुनौतियाँ

  • पितृत्व अवकाश के लिए कानूनी ढाँचे का अभाव: कोई व्यापक वैधानिक प्रावधान मौजूद नहीं है।
    • उदाहरण: सामाजिक सुरक्षा संहिता के अंतर्गत मातृत्व अवकाश के विपरीत, पितृत्व अवकाश केवल परामर्श के लिए है।
  • कार्यस्थल पर प्रतिरोध और अनौपचारिकता: निजी क्षेत्र और अनौपचारिक कार्यबल अनुपालन का विरोध कर सकते हैं।
    • उदाहरण: अनौपचारिक क्षेत्र के 90% से अधिक कार्यबल के पास सामाजिक सुरक्षा कवरेज नहीं है।
  • नियोक्ताओं/राज्य पर वित्तीय बोझ: विस्तारित लाभों से वित्तीय दायित्व बढ़ सकता है।
    • उदाहरण: लघु एवं मध्यम उद्यमों को सवैतनिक अवकाश की लागत वहन करने में कठिनाई हो सकती है।
  • कार्य संस्कृति में लैंगिक पूर्वाग्रह: गहरी जड़ें जमा चुकी रूढ़ियाँ साझा देखभाल की स्वीकृति को सीमित करती हैं।
  • प्रशासनिक और जागरूकता संबंधी कमियाँ: नए अधिकारों के बारे में स्पष्टता और जागरूकता का अभाव।

आगे की राह

  • पितृत्व अवकाश की वैधानिक मान्यता: लिंग-भेद रहित पितृत्व लाभों को सुनिश्चित करने वाले स्पष्ट कानूनी प्रावधान लागू करना।
    • उदाहरण: पितृत्व अवकाश को शामिल करने के लिए सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में संशोधन करना।
  • सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा कवरेज: अनौपचारिक श्रमिकों को लाभ प्रदान करना।
    • उदाहरण: माता-पिता के लाभों को ई-श्रम पोर्टल से एकीकृत करना।
  • साझा लागत मॉडल: वित्तीय बोझ को राज्य, नियोक्ता और बीमा के बीच वितरित करना।
    • उदाहरण: कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) के समान मॉडल।
  • कार्यस्थल संवेदीकरण: लिंग-समान देखभाल मानदंडों को बढ़ावा दें।
    • उदाहरण: पितृत्व अवकाश के उपयोग को प्रोत्साहित करने वाली कॉरपोरेट नीतियाँ।
  • निगरानी और प्रवर्तन तंत्र: श्रम निरीक्षण और डिजिटल ट्रैकिंग के माध्यम से अनुपालन को मजबूत करना।
    • उदाहरण: प्रवर्तन के लिए श्रम सुविधा पोर्टल का उपयोग करना।

निष्कर्ष

यह निर्णय समावेशी और अधिकार-आधारित पारिवारिक नीतियों की ओर एक परिवर्तन का संकेत देता है। कानूनी, वित्तीय और सामाजिक सुधारों के समर्थन से लैंगिक समानता को संस्थागत रूप देने से समानता को बढ़ावा मिल सकता है, बाल कल्याण मजबूत हो सकता है और भारत के श्रम ढाँचे को परिवर्तित होती सामाजिक वास्तविकताओं के अनुरूप ढाला जा सकता है।

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