संक्षेप में समाचार

8 Apr 2026

विश्व स्वास्थ्य दिवस

विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026 के अवसर पर भारत ने विज्ञान, नवाचार और समावेशी सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के माध्यम से स्वास्थ्य क्षेत्र को सुदृढ़ करने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

स्वास्थ्य क्या है?

  • WHO की परिभाषा: स्वास्थ्य केवल रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति नहीं है, बल्कि यह शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्ण कल्याण की अवस्था है।
  • मुख्य चिंताएँ
    • गैर-संचारी रोगों (NCDs) और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बढ़ता बोझ।
    • विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के मध्य स्वास्थ्य सेवाओं तक असमान पहुँच।
    • जलवायु परिवर्तन और महामारी का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर बढ़ता प्रभाव।

विश्व स्वास्थ्य दिवस के बारे में

  • विश्व स्वास्थ्य दिवस प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य वैश्विक स्वास्थ्य मुद्दों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और समन्वित कार्रवाई को बढ़ावा देना है।
  • उद्गम: यह दिवस वर्ष 1948 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की स्थापना की स्मृति में मनाया जाता है।
    • इसे पहली बार वर्ष 1950 में मनाया गया, ताकि वैश्विक स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य चिंताओं को उजागर किया जा सके।
  • 2026 की थीम: “स्वास्थ्य के लिए एकजुट: विज्ञान के लिए समर्थन”
    • यह थीम वैश्विक स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिए वैज्ञानिक सहयोग, अनुसंधान और साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण पर बल देती है।

मुख्य फोकस क्षेत्र (2026)

  • विज्ञान का समर्थन: साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य नीतियों, अनुसंधान और वैज्ञानिक समाधानों पर जनविश्वास को मजबूत करने पर जोर।
  • वन हेल्थ दृष्टिकोण: मानव, पशु, वनस्पति और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के पारस्परिक संबंध को रेखांकित करता है, जिससे जूनोटिक रोगों और पारिस्थितिकी जोखिमों से निपटा जा सके।
  • उभरती चुनौतियों का समाधान: जलवायु परिवर्तन, महामारी और पर्यावरणीय क्षरण जैसी समस्याओं पर ध्यान केंद्रित, जो वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों को प्रभावित करती हैं।
  • सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC): विशेषकर कमजोर वर्गों के लिए सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं की समान पहुँच को बढ़ावा देना।
  • निवारक स्वास्थ्य और जागरूकता: टीकाकरण, मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता और स्वस्थ जीवन शैली को प्रोत्साहित कर रोगों के बोझ को कम करना।

क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन 

हाल ही में जयपुर में आयोजित प्रथम क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन में भारत में क्षेत्र-विशिष्ट कृषि योजना और किसान-केंद्रित सुधारों के लिए एक रूपरेखा प्रस्तुत की गई।

क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन के बारे में

  • क्षेत्रीय कृषि सम्मेलन (2026) कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की एक नई पहल है, जिसका उद्देश्य कृषि-जलवायु परिस्थितियों के आधार पर राज्य-विशिष्ट कृषि रोडमैप तैयार करना है।
  • ये सम्मेलन कृषि क्षेत्र में संरचित संवाद, समीक्षा और भविष्य की योजना के लिए एक महत्त्वपूर्ण मंच प्रदान करेंगे।
  • इस पहल का उद्देश्य केंद्र और राज्य के कृषि मंत्रियों, वरिष्ठ अधिकारियों, वैज्ञानिकों, प्रगतिशील किसानों, किसान संगठनों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), एग्री-स्टार्टअप्स और निजी क्षेत्र के हितधारकों को एक साथ लाकर प्रमुख योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करना तथा जमीनी अनुभवों के आधार पर भविष्य की रणनीतियाँ तैयार करना है।
  • उद्देश्य
    • क्षेत्र-विशिष्ट फसल योजना: मिट्टी, जलवायु और जल उपलब्धता के आधार पर फसल योजना को बढ़ावा देना।
    • किसानों की आय में वृद्धि: तिलहन और दलहन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता और आय वृद्धि सुनिश्चित करना।
    • केंद्र-राज्य समन्वय: कृषि योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए समन्वय को मजबूत करना।
  • नोडल निकाय: यह पहल कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), राज्य सरकारों और अन्य संबद्ध संस्थानों के सहयोग से संचालित की जा रही है।
  • सम्मेलनों की शृंखला: जयपुर (पश्चिमी क्षेत्र), लखनऊ (उत्तरी क्षेत्र) और भुवनेश्वर (पूर्वी क्षेत्र) में सम्मेलन आयोजित किए जा रहे हैं।
    • यह शृंखला आगे हैदराबाद और गुवाहाटी में सम्मेलनों के साथ जारी रहेगी।
    • यह पहल भारत के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों को कवर करेगी।

जयपुर सम्मेलन में प्रमुख पहलें

  • किसान आईडी: उर्वरक, बीज, बीमा और मुआवजे के पारदर्शी वितरण हेतु एक एकीकृत डिजिटल पहचान प्रणाली।
  • कृषि-जलवायु क्षेत्रीकरण: भारत को विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में विभाजित कर क्षेत्र-विशिष्ट रणनीतियाँ बनाना।
  • राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन–तिलहन (NEOM–Oilseeds): तिलहन क्षेत्र और उत्पादकता बढ़ाकर आयात निर्भरता कम करना।
  • दलहन मिशन: बीज विस्तार, नई किस्मों, 100% खरीद और दाल मिल अवसंरचना पर ध्यान।
  • डिजिटल कृषि मिशन: प्रौद्योगिकी-आधारित कृषि और डेटा-आधारित निर्णय लेने को बढ़ावा।
  • प्राकृतिक खेती मिशन: सतत् और रसायन-मुक्त खेती को प्रोत्साहन।
  • प्रयोगशाला से भूमि तक पहल: 16,000 वैज्ञानिकों की तैनाती के माध्यम से शोध को सीधे किसानों तक पहुँचाना।
  • नकली संसाधन के खिलाफ कार्रवाई: बीज, उर्वरक और कीटनाशकों के नियमन और ट्रैकिंग को मजबूत करना।

सम्मेलन का महत्त्व

  • क्षेत्र-विशिष्ट कृषि योजना: यह एक समान राष्ट्रीय दृष्टिकोण से हटकर स्थानीय रणनीतियों की ओर परिवर्तन लाता है, जिससे उत्पादकता और जलवायु अनुकूलता बढ़ती है।
  • आत्मनिर्भरता को बढ़ावा: तिलहन और दलहन पर केंद्रित मिशन आयात निर्भरता कम कर खाद्य सुरक्षा को मजबूत करते हैं।
  • किसान कल्याण और पारदर्शिता: किसान आईडी और डिजिटल ट्रैकिंग जैसी पहलें लाभों के लक्षित वितरण को सुनिश्चित करती हैं तथा प्रणाली में रिसाव को कम करती हैं।

भारत के अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान 

भारत ने पेरिस समझौते के तहत अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) को अद्यतन किया है, जो जलवायु कार्रवाई और विकासात्मक आवश्यकताओं के बीच संतुलन को दर्शाता है।

भारत के अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs)

  • उत्सर्जन तीव्रता में कमी: भारत का लक्ष्य वर्ष 2035 तक वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता को 47% तक कम करना है (पहले वर्ष 2030 तक 45%)।
  • स्वच्छ ऊर्जा की उच्च हिस्सेदारी: स्थापित विद्युत क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से प्राप्त करने का लक्ष्य।
  • कार्बन सिंक में वृद्धि: वन और वृक्ष आवरण बढ़ाकर अतिरिक्त 3.5–4 अरब टन CO₂ समतुल्य कार्बन सिंक का निर्माण।
  • क्रमिक और निरंतर प्रगति: भारत की रणनीति अकस्मात् परिवर्तन के बजाय धीरे-धीरे अपने लक्ष्यों को बढ़ाने पर आधारित है।
  • जलवायु न्याय का सिद्धांत: प्रतिबद्धताएँ समानता और “सामान्य लेकिन विभेदित दायित्व” (CBDR) के सिद्धांत के अनुरूप हैं, जो एक विकासशील देश के रूप में भारत की स्थिति को दर्शाता है।

राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDCs) क्या हैं?

  • परिभाषा: NDCs वे जलवायु कार्रवाई लक्ष्य हैं, जिन्हें देश पेरिस समझौते के तहत उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन के लिए प्रस्तुत करते हैं।
  • राष्ट्रीय रूप से निर्धारित लक्ष्य: प्रत्येक देश अपनी परिस्थितियों, विकास आवश्यकताओं और क्षमताओं के आधार पर अपने लक्ष्य निर्धारित करता है।
  • आवधिक संशोधन: NDCs को हर 5 वर्ष में बढ़ती महत्त्वाकांक्षा के साथ अद्यतन किया जाता है, ताकि वैश्विक तापमान वृद्धि को सीमित किया जा सके।
  • कानूनी प्रकृति: NDCs कानूनी रूप से बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्य नहीं हैं, लेकिन देशों को इन्हें तैयार करने, प्रस्तुत करने और पारदर्शिता के साथ बनाए रखने का दायित्व होता है।

भारत की पवन ऊर्जा में उपलब्धियाँ

हाल ही में भारत ने वित्त वर्ष 2025–26 में 6.05 गीगावाट पवन ऊर्जा क्षमता जोड़कर अब तक की सर्वाधिक बढोतरी दर्ज की, जो वर्ष-दर-वर्ष 46% की वृद्धि को दर्शाता है।

भारत की पवन ऊर्जा में उपलब्धियाँ

  • रिकॉर्ड वार्षिक क्षमता वृद्धि: भारत ने वर्ष 2025–26 में 6.05 गीगावाट क्षमता जोड़ी, जो पिछले उच्चतम स्तर 5.5 गीगावाट (2016–17) से अधिक है।
    • यह वर्ष 2024–25 के स्तर की तुलना में 46% वृद्धि दर्शाता है, जो क्षेत्र में तेज प्रगति को इंगित करता है।
  • कुल स्थापित क्षमता में वृद्धि: कुल स्थापित क्षमता 56 गीगावाट से अधिक हो गई है, जिससे भारत वैश्विक पवन ऊर्जा बाजारों में अग्रणी देशों में शामिल हो गया है।
  • नीतिगत और संस्थागत समर्थन: वृद्धि को वर्ष 2028 तक इंटर-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (ISTS) शुल्क में छूट, प्रतिस्पर्द्धी बोली प्रक्रिया और ग्रीन एनर्जी ओपन एक्सेस से समर्थन मिला है।
    • राष्ट्रीय पवन ऊर्जा संस्थान से तकनीकी सहायता और परियोजना पाइपलाइन में सुधार भी महत्त्वपूर्ण रहे हैं।
  • जलवायु लक्ष्यों में योगदान: पवन ऊर्जा का विस्तार वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता प्राप्त करने के लक्ष्य में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

पवन ऊर्जा उत्पादन परिदृश्य

  • वैश्विक स्थिति: चीन 650 गीगावाट से अधिक क्षमता के साथ अग्रणी है।
    • संयुक्त राज्य अमेरिका के पास लगभग 150–160 गीगावाट क्षमता है, जबकि जर्मनी, यूरोप में अग्रणी है।
    • वैश्विक स्थापना वर्ष 2025 में लगभग 170 गीगावाट के रिकॉर्ड के बाद वर्ष 2026 में लगभग 160 गीगावाट रहने का अनुमान है।
  • भारत की वैश्विक स्थिति: भारत 50+ गीगावाट स्थापित क्षमता के साथ विश्व में चौथे स्थान पर है और भविष्य में उच्च वृद्धि की संभावनाएँ रखता है।
  • भारत के प्रमुख पवन ऊर्जा राज्य: गुजरात > तमिलनाडु > कर्नाटक > महाराष्ट्र।

पवन ऊर्जा भारत में एक उच्च-विकासशील नवीकरणीय क्षेत्र के रूप में उभर रही है, जो विस्तार क्षमता, सततता और ऊर्जा सुरक्षा—तीनों को सुदृढ़ करती है।

टार-बॉल प्रबंधन नियम, 2026

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केंद्र सरकार ने टार बॉल्स प्रबंधन नियम, 2026 (Tar Balls Management Rules, 2026) का प्रस्ताव दिया है, जो तेल के अवशेषों (Weathered oil residues) के प्रबंधन के लिए भारत का पहला समर्पित नियामक ढाँचा तैयार करता है।

  • ये नियम “पॉल्यूटर पे प्रिंसिपल” (Polluter Pays Principle) को क्रियान्वित करते हैं और तटीय प्रदूषण को राज्य आपदा के रूप में मानते हैं।

मसौदा नियमों की मुख्य विशेषताएँ

  • राज्य आपदा वर्गीकरण: तटीय टार-बॉल जमाव को अनिवार्य रूप से “राज्य आपदा” घोषित किया जाएगा, जिससे ‘राष्ट्रीय तेल रिसाव आपदा आकस्मिक योजना’ (NOS-DCP) के साथ-साथ आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत त्वरित प्रतिक्रिया तथा संसाधन जुटाना संभव हो सके।
  • पॉल्यूटर पे प्रिंसिपल: यह तेल सुविधा स्वामियों पर सख्त दायित्व आरोपित करता है, जिसमें पर्यावरण के प्रतिकूल संचालन के लिए परिवहनकर्ताओं और उपचार संचालकों की जवाबदेही का भी विस्तार किया गया है।
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था दृष्टिकोण: 1500 kcal/kg से अधिक कैलोरी मान वाले टार बॉल्स को राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) की मंजूरी के तहत औद्योगिक ईंधन (जैसे- सीमेंट उद्योग) के रूप में पुन: उपयोग में लाया जा सकता है।
  • संस्थागत निरीक्षण: राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों का मार्गदर्शन करने और कार्यान्वयन की निगरानी के लिए एक बहु-मंत्रालयी संचालन समिति (Steering Committee) की स्थापना की जाएगी।
  • शुरू-से-अंत तक की जिम्मेदारी (Cradle-to-Grave Responsibility): टार-बॉल कचरे के पूरे जीवनचक्र—उत्पत्ति, संग्रह, परिवहन, भंडारण और निपटान—में जवाबदेही सुनिश्चित करता है।

टार बॉल्स (Tar Balls) के बारे में

  • संदर्भ: टार बॉल्स चिपचिपे, गहरे रंग के ढेले होते हैं, जो समुद्री वातावरण में उत्सर्जित कच्चे तेल या ईंधन तेल से बनते हैं।
  • निर्माण प्रक्रिया: जब तेल का रिसाव होता है तो यह “अपक्षय” (Weathering) की प्रक्रिया से गुजरता है—जो सूर्य के प्रकाश, ऑक्सीकरण और लहरों की क्रिया से होने वाले भौतिक और रासायनिक परिवर्तनों का एक संयोजन है।
    • इसके हल्के घटक वाष्पित हो जाते हैं, जिससे पीछे घने, अर्द्ध-ठोस अवशेष बच जाते हैं।
  • संरचना: ये भारी धातुओं, सूक्ष्म तत्वों और ‘स्थायी कार्बनिक प्रदूषकों’ (POPs) सहित खतरनाक पदार्थों को अपने भीतर समाहित कर लेते हैं।
  • प्रभाव: वनस्पतियों और जीवों को होने वाले पारिस्थितिकी नुकसान के अलावा, ये बहकर तटों पर आ जाते हैं—मुख्य रूप से मानसून के दौरान भारत के पश्चिमी तट पर—जिससे पर्यटन उद्योग तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

पॉल्यूटर पे प्रिंसिपल (Polluter Pays Principle- PPP) के बारे में

  • पॉल्यूटर पे प्रिंसिपल (PPP) पर्यावरण कानून की एक मूल अवधारणा है, जो यह अनिवार्य करती है कि प्रदूषण फैलाने वाला व्यक्ति, प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण तथा उपचार सहित इसकी पूरी लागत वहन करेगा।
  • उद्देश्य: पर्यावरणीय बाहरी कारकों को आंतरिक बनाना, यह सुनिश्चित करना कि इसका बोझ समाज या राज्य पर न पड़े, जिससे पर्यावरणीय जवाबदेही और आर्थिक दक्षता को बढ़ावा मिले।
  • विकास और कानूनी आधार
    • पहली बार आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD, 1972) द्वारा स्पष्ट किया गया।
    • रियो घोषणा (सिद्धांत 16) में शामिल किया गया।
    • इस बात पर जोर देता है कि प्रदूषण फैलाने वालों को प्रदूषण की लागत वहन करनी चाहिए।
  • भारतीय कानूनी ढाँचा: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद-21 (जीवन का अधिकार) के तहत मान्यता प्राप्त।
    • प्रमुख निर्णय
      • वेल्लोर सिटीजन्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ – PPP को सतत् विकास के हिस्से के रूप में मान्यता दी गई।
      • इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ – पर्यावरणीय नुकसान के लिए पूर्ण दायित्व स्थापित किया गया।

दनकुनी-सूरत डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर

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एक संसदीय समिति ने लॉजिस्टिक्स दक्षता बढ़ाने और रेल नेटवर्क पर भीड़ कम करने के लिए दनकुनी-सूरत डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर को समय पर पूरा करने का आग्रह किया है।

दनकुनी–सूरत डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के बारे में

  • दनकुनी-सूरत डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (Dankuni–Surat Dedicated Freight Corridor) भारत के माल ढुलाई नेटवर्क को मजबूत करने के लिए बजट 2026-27 में घोषित एक प्रस्तावित 2,052 किमी. लंबा माल गलियारा है।
  • स्थान: यह दनकुनी (पश्चिम बंगाल) को सूरत (गुजरात) से जोड़ता है।
    • यह पश्चिम बंगाल, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात से होकर गुजरता है।
    • यह ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (EDFC) के साथ एकीकृत होता है।
  • मुख्य विशेषताएं: इसे उच्च-क्षमता और उच्च गति वाले माल परिवहन के लिए डिज़ाइन किया गया है।
    • यह बंदरगाहों, औद्योगिक गलियारों और लॉजिस्टिक्स पार्कों के साथ मल्टीमॉडल एकीकरण पर केंद्रित है।

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFC) के बारे में

  • डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (Dedicated Freight Corridor) मालगाड़ियों के लिए एक समर्पित रेलवे नेटवर्क है, जो माल ढुलाई को यात्री यातायात से अलग करता है।
  • उद्देश्य
    • लॉजिस्टिक्स लागत को कम करना: (लक्ष्य: जीडीपी का <10%)।
    • रेल माल ढुलाई हिस्सेदारी बढ़ाना: वर्ष 2030 तक इसे 45% तक ले जाना।
    • माल की तेज और ऊर्जा-कुशल आवाजाही: इसे सक्षम बनाना।
  • शुरुआत: वर्ष 2006।
  • कार्यान्वयनकर्ता: डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (DFCCIL), जो रेल मंत्रालय के तहत एक ‘विशेष प्रयोजन वाहन’ (SPV) है।
  • वित्तपोषण: घरेलू संसाधनों के साथ-साथ JICA (जापान इंटरनेशनल कोऑपरेशन एजेंसी) और विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा समर्थित।
  • विभिन्न कॉरिडोर
    • परिचालन में: ईस्टर्न डीएफसी (लुधियाना-दनकुनी), वेस्टर्न डीएफसी (दादरी-जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट (JNPT) मुंबई)।
    • प्रस्तावित: ईस्ट कोस्ट, ईस्ट-वेस्ट, नॉर्थ-साउथ और दनकुनी-सूरत कॉरिडोर।

फ्रेट कॉरिडोर का महत्त्व

  • रेलवे पर भार कम करना: समर्पित ट्रैक थोक माल ढुलाई को स्थानांतरित करते हैं, जिससे मौजूदा लाइनें तीव्र यात्री सेवाओं के लिए खाली हो जाती हैं।
  • आर्थिक और औद्योगिक बढ़ावा: ये उत्पादन केंद्रों और बंदरगाहों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ाते हैं, जिससे औद्योगिक गलियारों को समर्थन मिलता है।
  • कम लॉजिस्टिक्स लागत और स्थिरता: ये परिवहन समय, ईंधन के उपयोग और कार्बन उत्सर्जन को कम करते हैं, जिससे एक हरित तथा कुशल लॉजिस्टिक्स प्रणाली को बढ़ावा मिलता है।

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