फ्रॉग-इंस्पायर्ड ‘ब्रेन-लाइक’ सेंसर

|
भारतीय वैज्ञानिकों ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में ऊर्जा खपत को कम करने के उद्देश्य से मेंढक की जैविक विशेषताओं से प्रेरित होकर एक आर्द्रता-संवेदी न्यूरोमॉर्फिक सेंसर विकसित किया है।
फ्रॉग-इंस्पायर्ड ‘ब्रेन-लाइक’ सेंसर के बारे में
- यह न्यूरोमॉर्फिक, इलेक्ट्रॉनिक्स पर आधारित है, जो मानव मस्तिष्क की तरह एक साथ संवेदन, प्रसंस्करण और सूचना भंडारण की क्षमता का अनुकरण करता है।
- नवाचार: यह एक साथ संवेदन, प्रसंस्करण और सूचना भंडारण को एकीकृत करता है, जो पारंपरिक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए कुशलतापूर्वक करना कठिन होता है।
- जैविक प्रेरणा: यह क्रिकेट फ्रॉग-इंस्पायर्ड है, जो आर्द्रता और प्रकाश के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है।
- कार्यविधि: इसमें सुप्रामॉलिक्यूलर नैनोफाइबर्स का उपयोग किया गया है, जो आर्द्रता में परिवर्तन के प्रति अभिक्रिया करते हैं और सिनेप्स-सदृश विद्युत संकेत उत्पन्न करते हैं।
- सिनैप्टिक-सदृश: यह मस्तिष्क के सिनैप्टिक के समान व्यवहार को दर्शाता है, जहाँ न्यूरॉनों के बीच संकेतों का संचार होता है।
- विशिष्ट विशेषता: यह ब्रेन-लाइक सिनैप्टिक व्यवहार का अनुकरण करने के लिए आर्द्रता को प्रमुख उद्दीपन के रूप में उपयोग करता है।
- प्रकाश संवेदनशीलता: उपकरण की अभिक्रिया प्रकाश से भी प्रभावित होती है, जिससे इसकी पर्यावरणीय अनुकूलन क्षमता बढ़ती है।
- अनुप्रयोग: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), पर्यावरण निगरानी, पहनने योग्य स्वास्थ्य उपकरण और ऊर्जा-कुशल कंप्यूटिंग में उपयोगी है।
क्रिकेट फ्रॉग (cricket frog) के बारे में
- यह एक छोटा उभयचर है, जो अपनी चहचहाने वाली ध्वनि के लिए जाना जाता है, जो झींगुर जैसी प्रतीत होती है।
- आवास: यह तालाब, दलदल और आर्द्रभूमि जैसे मीठे जल के स्रोतों के आस-पास पाया जाता है।
- मुख्य विशेषता: यह आर्द्रता, प्रकाश और तापमान जैसे पर्यावरणीय परिवर्तनों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होता है।
- यह अपनी गतिविधि, दिशा-निर्धारण और व्यवहार को नियंत्रित करने के लिए दिन के प्रकाश पर भी निर्भर करता है।
- अनुकूलन: यह बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों में तीव्र प्रतिक्रिया और जीवित रहने की क्षमता प्रदर्शित करता है।
|
पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच वृद्धि की संभावनाएँ
|
विश्व बैंक ने पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के कारण ऊर्जा आपूर्ति, उपभोग और औद्योगिक गतिविधियों में व्यवधान को देखते हुए भारत की वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) की वृद्धि दर का अनुमान घटाकर 6.6% कर दिया है।
विश्व बैंक रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु
- विकास परिदृश्य में संशोधन: भारत की GDP वृद्धि दर वित्त वर्ष-27 में 6.6% रहने का अनुमान है, जो पहले के 7.2% के अनुमान से कम है।
- वैकल्पिक परिदृश्य: यदि संघर्ष नहीं होता, तो वृद्धि दर 7.2% रहने का अनुमान था, जिसके पीछे कारण हैं:
- वित्त वर्ष-26 की मजबूत गति
- सुदृढ़ घरेलू माँग
- विकासोन्मुख सुधार।
- क्षेत्रीय एवं संरचनात्मक रुझान: दक्षिण एशिया की वृद्धि दर वर्ष 2026 में 7% से घटकर 6.3% रहने की संभावना है।
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के बारे में
- GDP किसी देश की सीमाओं के भीतर एक निश्चित अवधि में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के कुल मौद्रिक मूल्य को दर्शाता है।
- GDP के प्रकार
- मौद्रिक GDP: वर्तमान बाजार मूल्यों पर मापा जाता है, जिसमें मुद्रास्फीति का समायोजन नहीं होता है।
- यह एक ही वर्ष के भीतर तुलना के लिए उपयोगी है, लेकिन विभिन्न वर्षों के बीच तुलना के लिए विश्वसनीय नहीं है।
- वास्तविक GDP: इसे GDP डिफ्लेटर के माध्यम से मुद्रास्फीति के अनुसार समायोजित किया जाता है।
- यह वस्तुओं और सेवाओं की वास्तविक मात्रा में परिवर्तन को दर्शाता है।
- यह समय के साथ आर्थिक वृद्धि की तुलना को संभव बनाता है।
- गणना
-
- GDP = निजी उपभोग (C) + निवेश (I) + सरकारी व्यय (G) + (निर्यात – आयात)
- निजी उपभोग व्यय (C): परिवारों और गैर-लाभकारी संस्थाओं द्वारा खरीदी गई अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य। इसमें टिकाऊ वस्तुएँ (जैसे- कार), अल्पकालिक वस्तुएँ (जैसे- खाद्य पदार्थ) और सेवाएँ (जैसे आवास, स्वास्थ्य सेवा) शामिल हैं।
- सरकारी उपभोग व्यय (G): सरकार द्वारा वस्तुओं और सेवाओं पर किया गया कुल व्यय, जिसमें सार्वजनिक सेवाएँ और रक्षा शामिल हैं। इसमें अंतरण भुगतान (जैसे- सामाजिक सुरक्षा) शामिल नहीं होते हैं।
- सकल निवेश (I): पूँजी निवेश का कुल मूल्य, जिसमें व्यावसायिक मशीनरी, कारखाने, आवास निर्माण और भंडार में परिवर्तन शामिल हैं। यह भविष्य की उत्पादन क्षमता को दर्शाता है, जिसे प्रायः सकल निजी घरेलू निवेश कहा जाता है।
|
इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट (IADT)
|
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने IADT-02 का सफलतापूर्वक परीक्षण किया, जिससे वर्ष 2027 में प्रस्तावित गगनयान मिशन के लिए क्रू सुरक्षा प्रणालियों को और सुदृढ़ किया गया है।
- गगनयान भारत का पहला मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन है, जिसका उद्देश्य तीन अंतरिक्ष यात्रियों को 400 किमी. की निम्न पृथ्वी कक्षा में लगभग 3 दिनों के लिए भेजना और उसके बाद उन्हें सुरक्षित रूप से हिंद महासागर में उतारना है।
मुख्य उपलब्धियाँ
- IADT-02 परीक्षण की सफलता: दूसरे एयर-ड्रॉप परीक्षण के माध्यम से पैराशूट-आधारित ‘मंदन प्रणाली’ (किसी गतिशील वस्तु के वेग में समय के साथ होने वाली कमी की दर) का सफल सत्यापन किया गया, जिससे क्रू मॉड्यूल की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित होगी।
- मानव अंतरिक्ष उड़ान की दिशा में प्रगति: यह वर्ष 2027 के लिए निर्धारित भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धिहै।
- स्वदेशी क्षमता को सुदृढ़ करना: यह उन महत्त्वपूर्ण अंतरिक्ष प्रौद्योगिकियों में भारत की आत्मनिर्भरता को दर्शाता है, जिन्हें वैश्विक स्तर पर साझा नहीं किया जाता है।
‘इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट’ के बारे में
- IADT एक सिमुलेशन परीक्षण है, जिसका उद्देश्य पैराशूट-सहायता प्राप्त समुद्री अवतरण प्रणाली के माध्यम से अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करना है।
- कार्यप्रणाली
-
- लगभग 5 टन वजन वाले एक डमी क्रू मॉड्यूल को भारतीय वायु सेना के हेलीकॉप्टर से 3–4 किमी. की ऊँचाई से गिराया गया।
- इसके बाद पैराशूटों की एक शृंखला—एपेक्स कवर पृथक्करण (ACS), वायु प्रतिरोध (ड्रैग), पायलट और मुख्य पैराशूट—स्वचालित रूप से खुलते हैं, जिससे गति लगभग 8 मीटर/सेकंड तक कम हो जाती है।
- अंततः मॉड्यूल समुद्र में उतरा और भारतीय नौसेना तथा तटरक्षक बल द्वारा उसे पुनः प्राप्त किया।
- परीक्षण का महत्त्व
- इसने पुनः प्रवेश (Re-entry) के दौरान अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, जहाँ त्रुटि की कोई आशंका नहीं रहती है।
- यह वास्तविक परिस्थितियों में प्रणाली की विश्वसनीयता को प्रमाणित करता है।
- यह इसरो, भारतीय वायु सेना, DRDO और नौसेना के बीच मजबूत समन्वय को दर्शाता है।
- यह मानवयुक्त मिशन से पहले एक अनिवार्य पूर्व-शर्त के रूप में कार्य करता है।
सफल IADT परीक्षण सुरक्षित मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता सुनिश्चित करते हैं, जो स्वदेशी अंतरिक्ष यात्री वापसी प्रणालियों वाले देशों के विशिष्ट समूह में भारत के प्रवेश का प्रतीक है। |
भारत की वित्तीय आसूचना इकाई और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र के मध्य एमओयू हस्ताक्षरित
|
वित्तीय खुफिया इकाई–भारत (FIU-IND) और भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) ने साइबर धोखाधड़ी और वित्तीय अपराधों से निपटने हेतु सूचना साझाकरण और समन्वय को मजबूत करने के लिए एक व्यापक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए हैं।
संबंधित तथ्य
- उद्देश्य
- राष्ट्रीय स्तर पर धोखाधड़ी पहचान तंत्र को सुदृढ़ करने हेतु मजबूत फीडबैक प्रणाली विकसित करना।
- वित्तीय संस्थानों के लिए दिशा-निर्देश और चेतावनी संकेत विकसित एवं प्रसारित करना ताकि साइबर धोखाधड़ी की रोकथाम को मजबूत किया जा सके।
वित्तीय खुफिया इकाई–भारत (FIU-IND) के बारे में
- FIU-IND संदिग्ध वित्तीय लेन-देन से संबंधित जानकारी के प्रबंधन के लिए केंद्रीय राष्ट्रीय एजेंसी है।
- यह धन शोधन (मनी लॉण्ड्रिंग) और आतंकवाद के वित्तपोषण के विरुद्ध, देश के भीतर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- स्थापना: भारत सरकार द्वारा नवंबर 2004 में स्थापित।
- शासन: यह एक स्वतंत्र निकाय के रूप में कार्य करता है और सीधे आर्थिक खुफिया परिषद (EIC) को रिपोर्ट करता है, जिसकी अध्यक्षता केंद्रीय वित्त मंत्री करते हैं।
भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के बारे में
- यह गृह मंत्रालय की एक पहल है, जिसका उद्देश्य भारत में साइबर अपराध से निपटने के लिए एक समग्र और समन्वित ढांचा प्रदान करना है।
- मुख्य उद्देश्य
- कानून प्रवर्तन एजेंसियों, राज्यों और अन्य हितधारकों के बीच समन्वय स्थापित करना।
- साइबर अपराध जाँच में क्षमता निर्माण को सुदृढ़ करना।
- साइबर अपराध रिपोर्टिंग और प्रतिक्रिया तंत्र को बेहतर बनाना।
मुख्य घटक
- राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल: नागरिकों को ऑनलाइन साइबर अपराध की शिकायत दर्ज करने की सुविधा देता है।
- राष्ट्रीय साइबर फॉरेंसिक प्रयोगशाला (NCFL): जाँच में डिजिटल फॉरेंसिक सहायता प्रदान करती है।
- साइबर अपराध पारितंत्र प्रबंधन इकाई: विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय को सुदृढ़ करती है।
समझौता का महत्त्व
- डिजिटल भुगतान का तीव्र विस्तार: भारत का डिजिटल भुगतान पारितंत्र तेजी से विकसित हुआ है, जिससे नागरिकों को साइबर अपराध और धोखाधड़ी से सुरक्षित रखने के लिए मजबूत सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है।
- जाँच एजेंसियों को समर्थन: यह समझौता दोनों एजेंसियों को परिचालन संबंधी जानकारी विकसित करने में सहायता करेगा, जिससे जाँच एजेंसियाँ वित्तीय अपराधों की रोकथाम, डिजिटल लेन-देन की सुरक्षा और परिसंपत्ति पुनर्प्राप्ति में सक्षम होंगी।
|
तापमान-नियंत्रित नैनो-सामग्री

|
बंगलूरू स्थित नैनो और सॉफ्ट मैटर साइंसेज सेंटर (CeNS) के भारतीय वैज्ञानिकों ने तापमान-नियंत्रित नैनो-सामग्रियों के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है, जिससे संरचना और गुणों को गतिशील रूप से नियंत्रित करना संभव हुआ है।
- CeNS, बंगलूरू विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST), भारत सरकार के अंतर्गत एक स्वायत्त अनुसंधान संस्थान है।
मुख्य उपलब्धियाँ
- तापमान-आधारित संरचनात्मक परिवर्तन: शोधकर्ताओं ने प्रदर्शित किया कि नैनो-सामग्री केवल तापमान परिवर्तन के माध्यम से नैनोडिस्क से नैनोशीट में परिवर्तित हो सकती है, जिससे संरचना पर सटीक नियंत्रण संभव होता है।
- समायोज्य प्रकाशीय और विद्युत गुण: यह सामग्री निम्न तापमान पर काइरोऑप्टिकल सक्रियता और उच्च चालकता प्रदर्शित करती है, जो तापमान बढ़ने पर काफी कम हो जाती है।
- काइरोऑप्टिकल सक्रियता में वृत्ताकार डाइक्रोइज्म (CD) और/या वृत्ताकार पोलराइज्ड ल्यूमिनेसेंस (CPL) जैसे गुण शामिल होते हैं।
- स्वदेशी वैज्ञानिक प्रगति: CeNS और जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च के संयुक्त अनुसंधान ने नैनो-प्रौद्योगिकी और पदार्थ विज्ञान में भारत की बढ़ती क्षमता को रेखांकित किया है।
तापमान-नियंत्रित नैनो-सामग्रियों के बारे में
- ये ऐसी सामग्रियाँ (1–100 नैनोमीटर) हैं, जिनकी संरचना, प्रकाशीय और वैद्युत गुण तापमान के परिवर्तन के साथ बदलते हैं।
- विशेषताएँ
- आकार और संरचना: उच्च आयतन अनुपात के कारण अधिक अभिक्रियाशीलता और विशिष्ट नैनो-स्तरीय व्यवहार प्रदर्शित करती हैं।
- ऊष्मीय और भौतिक गुण: थोक (Bulk) सामग्रियों की तुलना में कम गलनांक, चरण परिवर्तन और उच्च ताप-संवेदनशीलता दर्शाती हैं।
- उद्दीपन-प्रतिक्रियाशील व्यवहार: अणुओं के स्व-संयोजन के कारण तापमान के अनुसार आकार, चालकता और प्रकाशीय गुणों में परिवर्तन होता है।
- संभावित अनुप्रयोग
-
- उन्नत इलेक्ट्रॉनिक्स और सेंसर: ऊर्जा-कुशल उपकरण, स्मार्ट सेंसर और अनुकूलनशील परिपथों के विकास में सहायक।
- फोटोनिक्स और ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक्स: समायोज्य प्रकाशीय गुणों के कारण प्रकाश-आधारित तकनीकों में उपयोगी।
- जैव-चिकित्सा और औषधि वितरण प्रणाली: तापमान-संवेदनशील प्रतिक्रियाओं के माध्यम से लक्षित औषधि वितरण और जैव-इलेक्ट्रॉनिक इंटरफेस में उपयोग।
इस उपलब्धि का महत्त्व
- यह बहु-कार्यात्मक सामग्रियों के निर्माण के लिए एक सरल और विस्तारणीय विधि प्रदान करता है।
- यह अगली पीढ़ी की इलेक्ट्रॉनिक्स और नैनोप्रौद्योगिकी नवाचार में भारत की क्षमता को सुदृढ़ करता है।
- यह मौलिक अनुसंधान और वास्तविक जीवन के अनुप्रयोगों के बीच सेतु का कार्य करता है, विशेषकर स्मार्ट और सतत् प्रौद्योगिकियों के क्षेत्र में।
|
ECOSOC में भारत
|
भारत ने संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक परिषद (ECOSOC) के अंतर्गत प्रमुख निकायों में सर्वसम्मति से (निर्विरोध) चुनाव जीतकर अपनी वैश्विक कूटनीतिक स्थिति को और मजबूत किया है।
चुनाव की प्रमुख विशेषताएँ
- कई निकायों में निर्विरोध जीत: भारत को ECOSOC के चार निकायों में बिना किसी प्रतिस्पर्द्धा के चुना गया, जो अंतरराष्ट्रीय समर्थन और विश्वसनीयता को दर्शाता है।
- CESCR में पुनर्निर्वाचन: आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकार समिति (CESCR) में राजनयिक प्रीति सरन को उनकी व्यक्तिगत क्षमता में पुनः चुना गया।
- प्रमुख कार्यात्मक निकायों में प्रतिनिधित्व: भारत ने निम्नलिखित निकायों में स्थान प्राप्त किया:
- विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास हेतु आयोग
- गैर-सरकारी संगठनों की समिति
- कार्यक्रम और समन्वय समिति।
ECOSOC के बारे में
- ECOSOC संयुक्त राष्ट्र के छह प्रमुख अंगों में से एक है, जो वैश्विक आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय नीतियों का समन्वय करता है।
- उत्पत्ति: वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र चार्टर (अध्याय X) के अंतर्गत स्थापित, जिसका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना है।
- मुख्यालय: न्यूयॉर्क में स्थित है, जबकि इसके प्रमुख सत्र जिनेवा में भी आयोजित होते हैं।
- उद्देश्य: सतत् विकास, मानवाधिकार, उच्च जीवन स्तर और वैश्विक सहयोग को बढ़ावा देना।
- मुख्य संरचना: ECOSOC में 54 सदस्यीय पूर्ण निकाय होता है, जिसे संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा तीन-वर्षीय अवधि के लिए चुना जाता है और यही प्रमुख निर्णय लेने वाली संस्था है।
- सहायक निकाय: यह कार्यात्मक आयोगों, क्षेत्रीय आयोगों और विशेषज्ञ निकायों के माध्यम से कार्य करता है, जो आर्थिक, सामाजिक और विकासात्मक मुद्दों पर विशेषज्ञ सुझाव प्रदान करते हैं।
- निर्णय-निर्माण कार्य: ECOSOC प्रस्ताव और सिफारिशें अपनाता है, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों का समन्वय करता है और गैर-सरकारी संगठनों को परामर्शदाता का दर्जा प्रदान करता है (NGO समिति के माध्यम से)।
- निर्णय प्रक्रिया: निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाते हैं, जिनका केंद्र संवाद, समन्वय और नीतिगत मार्गदर्शन होता है, न कि बाध्यकारी प्रवर्तन।
- मुख्य भूमिकाएँ
-
- संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और कार्यक्रमों का समन्वय करना।
- आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के कार्यान्वयन की निगरानी करना।
- नागरिक समाज और गैर-सरकारी संगठनों के साथ सहभागिता को बढ़ावा देना।
महत्त्व
भारत का यह निर्वाचन वैश्विक शासन और सतत् विकास एजेंडा में उसकी भूमिका को सुदृढ़ करता है तथा बहुपक्षीय निर्णय-निर्माण मंचों में उसके प्रभाव को और बढ़ाता है। |
बॉक्साइट खनन

|
ओडिशा में बॉक्साइट खनन परियोजना को लेकर हुए संघर्ष ने जनजातीय अधिकारों, पर्यावरणीय चिंताओं और औद्योगिक विकास के बीच बढ़ते तनाव को उजागर किया है।
मुख्य मुद्दे
- जनजातीय अधिकार और सहमति: स्थानीय जनजातीय समुदायों ने वास्तविक परामर्श की कमी का आरोप लगाया है, जिससे ग्राम सभा की सहमति और विस्थापन को लेकर चिंताएँ उत्पन्न हुई हैं।
- ग्राम सभा की सहमति भारत में खनन परियोजनाओं के लिए एक अनिवार्य कानूनी प्रावधान है, विशेषकर अनुसूचित क्षेत्रों में पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) तथा वन भूमि के उपयोग परिवर्तन के लिए वन अधिकार अधिनियम, 2006 (FRA) के अंतर्गत।
- पर्यावरण और आजीविका संबंधी चिंताएँ: खनन से वनों, जैव विविधता और जल स्रोतों को खतरा होता है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर पारंपरिक आजीविकाएँ प्रभावित होती हैं।
- कानून-व्यवस्था और विकास संबंधी संघर्ष: पुलिस और ग्रामीणों के बीच हिंसक झड़पें “विकास बनाम अधिकार” की बहस को दर्शाती हैं, जो अक्सर संसाधन-समृद्ध जनजातीय क्षेत्रों में देखी जाती है।
बॉक्साइट के बारे में
- बॉक्साइट एल्युमिनियम का प्रमुख अयस्क है, जो मुख्यतः हाइड्रेटेड एल्युमिनियम ऑक्साइड से निर्मित होता है और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अपक्षय की प्रक्रिया से बनता है।
- गुण: यह नरम, छिद्रयुक्त और लाल-भूरे रंग का होता है, जिसमें एल्युमिनियम की मात्रा अधिक और कठोरता कम होती है।
- उपयोग: एल्युमिनियम उत्पादन (Bayer प्रक्रिया), अग्निरोधक पदार्थ, घर्षक सामग्री तथा रासायनिक उद्योग में उपयोग।
- वितरण
-
- वैश्विक स्तर पर यह गिनी, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील और चीन जैसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है।
- भारत में इसके प्रमुख भंडार ओडिशा, गुजरात, झारखंड, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ में स्थित हैं।
- प्रमुख उत्पादक: वैश्विक स्तर पर गिनी और ऑस्ट्रेलिया प्रमुख उत्पादक हैं।
- चीन विश्व का लगभग 57–60% एल्युमिनियम उत्पादन करता है, जिससे वह सबसे बड़ा उत्पादक है; इसके बाद भारत (द्वितीय) और रूस का स्थान है।
ओडिशा की प्रमुख बॉक्साइट खदानें
- पंचपटमाली (कोरापुट)
- सिजिमाली (रायगढ़ा–कालाहांडी)
- नियमगिरि पहाड़ियाँ (कालाहांडी–रायगढ़ा)
- गंधमर्दन (बरगढ़)।
ओडिशा के बॉक्साइट का महत्त्व
- संसाधन प्रभुत्व: भारत के कुल बॉक्साइट संसाधनों का लगभग 41% और उत्पादन का लगभग 70% ओडिशा से आता है।
- औद्योगिक संबंध: लांजीगढ़ जैसी रिफाइनरियों के निकट होने से एल्युमिनियम उत्पादन और औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलता है।
- रणनीतिक आर्थिक महत्त्व: बॉक्साइट खनन निर्यात, रोजगार और विमानन, निर्माण तथा ऊर्जा जैसे प्रमुख क्षेत्रों के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देता है।
|