नागोया प्रोटोकॉल के कार्यान्वयन पर भारत की पहली रिपोर्ट

18 Mar 2026

संदर्भ

हाल ही में, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) ने राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) के साथ मिलकर जैव विविधता पर सम्मेलन (CBD) के नागोया प्रोटोकॉल पर भारत की पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट प्रस्तुत की है, जिसमें पहुँच और लाभ साझाकरण के बारे में बताया गया है।

जैव विविधता पर सम्मेलन (CBD) के बारे में 

  • उत्पत्ति एवं कानूनी स्थिति: CBD को पृथ्वी शिखर सम्मेलन में अपनाया गया था और वर्ष 1993 में लगभग सार्वभौमिक सदस्यता वाली एक कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि के रूप में लागू हुआ।
  • मुख्य उद्देश्य (त्रिपक्षीय ढाँचा): यह सम्मेलन तीन मूलभूत लक्ष्यों पर आधारित है-
    • जैव विविधता का संरक्षण
    • इसके घटकों का सतत् उपयोग
    • आनुवंशिक संसाधनों से उत्पन्न ‘एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग’ (ABS)।
  • संप्रभु अधिकार एवं समानता का सिद्धांत: CBD जैविक संसाधनों पर राज्यों के संप्रभु अधिकारों को मान्यता देता है, साथ ही समान लाभ बँटवारे, पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देता है।
  • प्रोटोकॉल-आधारित कार्यान्वयन तंत्र: इसके उद्देश्यों को प्रमुख प्रोटोकॉल- जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल [जीवित संशोधित जीवों (LMO) का सुरक्षित संचालन] और पहुँच एवं लाभ बँटवारे पर नागोया प्रोटोकॉल के माध्यम से कार्यान्वित किया जाता है।
  • वैश्विक जैव विविधता ढाँचा (वर्तमान रोडमैप): CBD की वर्तमान रणनीतिक दिशा CBD COP15 के परिणामों द्वारा निर्देशित है, जिसमें कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढाँचा और 30×30 संरक्षण लक्ष्य शामिल हैं।
  • भारत की भूमिका और घरेलू ढाँचा: भारत एक सक्रिय पक्ष है, जो विकेंद्रीकृत शासन, संरक्षण और लाभ साझाकरण तंत्रों पर जोर देते हुए जैव विविधता अधिनियम, 2002 के माध्यम से CBD को लागू कर रहा है।

संबंधित तथ्य

  • यह NR1 प्रस्तुति भारत के मानक अनुपालन से साक्ष्य-आधारित रिपोर्टिंग की ओर संक्रमण का प्रतीक है, जो वर्ष 2017-2025 की अवधि के दौरान एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (ABS) में ठोस परिणामों को प्रदर्शित करती है।
  • यह भारत की राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (NBSAP) के लक्ष्य 13 में भी योगदान देती है, जो वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों के साथ संरेखण को दर्शाती है।

राष्ट्रीय जैव विविधता संरक्षण कार्यक्रम (NBSAP)

  • भारत का राष्ट्रीय जैव विविधता संरक्षण कार्यक्रम (NBSAP) जैव विविधता पर सम्मेलन के उद्देश्यों के अनुरूप, जैव विविधता संरक्षण, जैविक संसाधनों के सतत् उपयोग को सुनिश्चित करने और समान लाभ बँटवारे को सक्षम बनाने के देश के प्रयासों का मार्गदर्शन करने वाला प्रमुख नीतिगत ढाँचा है।
  • लक्ष्य 13 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जैविक संसाधनों और संबंधित पारंपरिक ज्ञान के उपयोग से प्राप्त लाभों को जैव विविधता पर सम्मेलन और इसके पूरक समझौते, नागोया प्रोटोकॉल के तहत भारत की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप, निष्पक्ष और समान तरीके से साझा किया जाए।

प्रथम राष्ट्रीय रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएँ

  • पारदर्शिता और अनुपालन संरचना में वैश्विक नेतृत्व: भारत ने ABS क्लियरिंग-हाउस तंत्र के माध्यम से 3,500 से अधिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अनुपालन प्रमाण-पत्र (IRCC) जारी किए हैं, जो वैश्विक कुल का लगभग 60% है।
    • यह दर्शाता है कि भारत ने विश्व स्तर पर सबसे पारदर्शी, जवाबदेह और सुचारू रूप से संचालित पहुँच-विनियमन प्रणालियों में से एक विकसित की है।

पहुँच और लाभ-साझाकरण क्लियरिंग-हाउस (ABS-CH) के बारे में

  • संस्थागत उत्पत्ति और कानूनी आधार: ABS क्लियरिंग-हाउस, एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग (ABS) प्रावधानों के कार्यान्वयन में सहयोग देने के लिए नागोया प्रोटोकॉल के तहत स्थापित एक सूचना-साझाकरण मंच है।
  • मुख्य उद्देश्य: आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग में पारस्परिक विश्वास, कानूनी निश्चितता और जवाबदेही को बढ़ावा देने के लिए प्रदाता तथा उपयोगकर्ता देशों के बीच सूचना के पारदर्शी आदान-प्रदान को सुगम बनाना।
  • केंद्रीकृत वैश्विक सूचना मंच: ABS-CH एक वेब-आधारित वैश्विक भंडार के रूप में कार्य करता है, जो निम्नलिखित तक पहुँच प्रदान करता है:
    • राष्ट्रीय ABS कानून और विनियम
    • राष्ट्रीय फोकल पॉइंट्स (NFP) और सक्षम राष्ट्रीय प्राधिकरणों (CNAs) के संपर्क विवरण
    • देशों द्वारा जारी परमिट और ABS समझौते।
  • अनुपालन और निगरानी को सुगम बनाना: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त अनुपालन प्रमाण-पत्र (IRCC) प्रकाशित करके, यह प्लेटफॉर्म यह ट्रैक करने में मदद करता है कि क्या आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच पूर्व सूचित सहमति (PIC) और पारस्परिक रूप से सहमत शर्तों (MAT) के अनुसार हुई है।
  • कानूनी निश्चितता और उचित परिश्रम के लिए समर्थन: यह शोधकर्ताओं, कंपनियों और सरकारों को आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँचने से पहले कानूनी आवश्यकताओं को सत्यापित करने में सक्षम बनाता है, जिससे जैव और कानूनी विवादों का जोखिम कम होता है।
  • क्षमता निर्माण और ज्ञान साझाकरण: यह प्लेटफॉर्म ABS से संबंधित सर्वोत्तम प्रथाओं, दिशा-निर्देशों और कार्यान्वयन उपकरणों को साझा करके, विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए, क्षमता निर्माण में भी सहायता करता है।
  • वैश्विक जैव विविधता शासन को सुदृढ़ करने में भूमिका: ABS-CH राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ABS व्यवस्थाओं के बीच एक सेतु का काम करता है, जिससे नागोया प्रोटोकॉल के समन्वय, मानकीकरण और प्रभावी कार्यान्वयन को बढ़ावा मिलता है।

  • संस्थागत विकेंद्रीकरण और जमीनी स्तर पर लोकतांत्रीकरण: ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों में 2.76 लाख से अधिक जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMCs) की स्थापना विकेंद्रीकृत पर्यावरण शासन के अभूतपूर्व पैमाने को दर्शाती है।
    • ये संस्थाएँ सुनिश्चित करती हैं कि जैविक संसाधनों से संबंधित निर्णय गाँवों और पंचायतों के स्तर पर लिए जाएँ, जिससे जैव विविधता शासन का लोकतांत्रीकरण होता है और समुदायों को निष्क्रिय लाभार्थियों के बजाय प्राथमिक हितधारक के रूप में मान्यता मिलती है।
  • लाभ साझाकरण के माध्यम से वित्तीय समावेशन: भारत ने पहुँच और लाभ साझाकरण समझौतों के माध्यम से लगभग ₹216 करोड़ जुटाए हैं, जिसमें से ₹139 करोड़ से अधिक राशि आदिवासी समुदायों, पारंपरिक चिकित्सकों और जैव विविधता के स्थानीय संरक्षकों सहित लाभ प्राप्तकर्ताओं को वितरित की जा चुकी है।
  • जन जैव विविधता रजिस्टर (PBR) क्रांति एक कानूनी सुरक्षा कवच के रूप में: जन जैव विविधता रजिस्टरों (PBR) के व्यापक दस्तावेजीकरण ने स्थानीय जैव विविधता और उससे संबंधित पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों की एक व्यापक सूची तैयार की है।
    • ये रजिस्टर जैव चोरी और गलत पेटेंट दावों के विरुद्ध एक रक्षात्मक कानूनी तंत्र के रूप में कार्य करते हैं। साथ ही जैविक संसाधनों और ज्ञान प्रणालियों पर सामुदायिक स्वामित्व स्थापित करते हैं।

पहुँच और लाभ साझाकरण (ABS) पर नागोया प्रोटोकॉल के बारे में

  • उत्पत्ति एवं कानूनी स्थिति
    • पूरक समझौता: नागोया प्रोटोकॉल, जिसे वर्ष 2010 में अपनाया गया (CBD COP10) और 2014 में लागू किया गया, जैविक विविधता पर सम्मेलन (1992) का एक कानूनी रूप से बाध्यकारी पूरक समझौता है।
    • ऐतिहासिक विषमता का समाधान: इस प्रोटोकॉल की अवधारणा जैव विविधता से समृद्ध विकासशील देशों में व्याप्त ऐतिहासिक विषमता को दूर करने के लिए बनाई गई थी, जिसके कारण उन्हें अपने आनुवंशिक संसाधनों के व्यावसायिक उपयोग से मिलने वाले लाभों से वंचित रखा गया था।
    • संप्रभु संसाधन परिवर्तन: यह प्रोटोकॉल समान पहुँच और लाभ-साझाकरण के लिए एक नियम-आधारित ढाँचा स्थापित करता है, जिससे जैव विविधता एक खुले वैश्विक साझा संसाधन से एक विनियमित संप्रभु संसाधन में परिवर्तित हो जाती है।
  • मूल उद्देश्य और दर्शन
    • न्यायसंगत बँटवारा: इसका उद्देश्य आनुवंशिक संसाधनों के उपयोग से प्राप्त लाभों का निष्पक्ष और समान बँटवारा सुनिश्चित करना है।
    • सतत् एकीकरण: यह ढाँचा जैव विविधता संरक्षण को सतत् विकास, न्याय और आर्थिक समानता से जोड़ता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि प्रकृति का मूल्य समुदाय की समृद्धि में परिवर्तित हो।
  • प्रमुख परिचालन स्तंभ: प्रोटोकॉल दो मूलभूत साधनों के माध्यम से पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है:
    • पूर्व-सूचित सहमति (PIC): यह स्थापित करता है कि आनुवंशिक संसाधनों तक पहुँच के लिए प्रदाता देश से स्पष्ट अनुमति आवश्यक है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों पर संप्रभु अधिकारों को सुदृढ़ किया जाता है और संप्रभु नियंत्रण सुनिश्चित होता है।
    • पारस्परिक रूप से सहमत शर्तें (MAT): यह सुनिश्चित करता है कि संविदात्मक समझौतों में लाभ-साझाकरण व्यवस्थाएँ परिभाषित हों, जिससे लेन-देन कानूनी रूप से लागू करने योग्य हो और कानूनी निश्चितता प्रदान की जा सके।
  • व्यापक लाभ-साझाकरण तंत्र: प्रोटोकॉल विविध लाभों के साझाकरण को अनिवार्य बनाता है, विशेष रूप से जैव विविधता से समृद्ध विकासशील देशों को लाभ पहुँचाने के लिए:
    • मौद्रिक लाभ: इसमें रॉयल्टी, लाइसेंस शुल्क और लाभ-साझाकरण शामिल हैं।
    • गैर-मौद्रिक लाभ: इसमें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, सहयोगात्मक अनुसंधान और क्षमता निर्माण शामिल हैं।
  • अनुपालन, निगरानी और संस्थागत ढाँचा: सीमा पार अनुपालन प्रवर्तन सुनिश्चित करने के लिए, प्रोटोकॉल विशेष तंत्र स्थापित करता है:
    • नेशनल फोकल पॉइंट (NFP) और घरेलू प्रशासन के लिए सक्षम राष्ट्रीय प्राधिकरण (CNAs)।
    • ABS क्लियरिंग-हाउस: सूचना का आदान-प्रदान, पारदर्शिता और अनुपालन की निगरानी के लिए एक केंद्रीय मंच।
  • पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक अधिकारों का संरक्षण
    • स्वदेशी और स्थानीय समुदाय (ILC): प्रोटोकॉल ILC को जैव विविधता के संरक्षक के रूप में मान्यता देता है और उनकी पूर्व सहमति और लाभ-साझाकरण को अनिवार्य बनाता है।
    • जैविक-सांस्कृतिक अधिकार: यह जमीनी स्तर पर भागीदारी को मजबूत करता है और स्वदेशी लोगों की अमूर्त ज्ञान प्रणालियों का संरक्षण करता है।
  • भारत का कार्यान्वयन ढाँचा: भारत एक मजबूत विकेंद्रीकृत शासन मॉडल के माध्यम से प्रोटोकॉल को लागू करके वैश्विक स्तर पर अग्रणी भूमिका निभाता है:
    • कानूनी आधार: जैविक विविधता अधिनियम, 2002।
    • संस्थागत संरचना: सर्वोच्च स्तर पर राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) और स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMCs) द्वारा प्रबंधित।
    • इसमें तीन स्तरीय संस्थागत संरचना शामिल है:
      • राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण
      • राज्य जैव विविधता बोर्ड/केंद्रशासित प्रदेश जैव विविधता परिषदें
      • स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंधन समितियाँ (BMCs)।

नागोया प्रोटोकॉल का महत्त्व

  • स्वदेशी और स्थानीय समुदायों के लिए आर्थिक न्याय: यह प्रोटोकॉल पारंपरिक ज्ञान को एक अपरिचित संसाधन से कानूनी रूप से संरक्षित आर्थिक संपत्ति में परिवर्तित करती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि स्वदेशी समुदायों को उनके योगदान के लिए रॉयल्टी और लाभ प्राप्त हों।
    • यह ऐतिहासिक शोषण को संबोधित करता है और जैव विविधता शासन में वितरणात्मक न्याय को बढ़ावा देता है।
  • संरक्षण के लिए आर्थिक प्रोत्साहन का सृजन: जैव विविधता संरक्षण को आर्थिक लाभों से जोड़कर, ABS तंत्र यह सुनिश्चित करता है कि स्थानीय समुदायों की संरक्षण प्रयासों में प्रत्यक्ष वित्तीय हिस्सेदारी हो।
    • यह एक ऐसे मॉडल को बढ़ावा देता है, जहाँ पर्यावरणीय स्थिरता और आर्थिक तर्कसंगतता एक-दूसरे को मजबूत करती हैं, जिससे वनों की कटाई जैसी विनाशकारी प्रथाओं में कमी आती है।
  • नैतिक वैश्विक अनुसंधान पद्धतियों का मानकीकरण: यह प्रोटोकॉल वैश्विक जैव प्रौद्योगिकी और फार्मास्युटिकल उद्योगों के लिए एक स्पष्ट नियामक ढाँचा प्रदान करती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि अनुसंधान और नवाचार नैतिक और कानूनी रूप से अनुपालन वाले ढाँचे के भीतर संचालित हों।
    • इससे कानूनी अनिश्चितता कम होती है और प्रदाता और उपयोगकर्ता देशों के बीच विश्वास बढ़ता है।

डिजिटल अनुक्रम सूचना (DSI) के बारे में

  • अवधारणा एवं परिभाषा: डिजिटल अनुक्रम सूचना (DSI) से तात्पर्य जैविक संसाधनों से प्राप्त डिजिटल आनुवंशिक डेटा से है, जैसे- DNA/RNA अनुक्रम, प्रोटीन अनुक्रम और संबंधित जैवसूचना डेटा, जिसे भौतिक आनुवंशिक सामग्री की आवश्यकता के बिना इलेक्ट्रॉनिक रूप से संगृहीत, प्राप्त और उपयोग किया जा सकता है।
  • वैश्विक जैव विविधता शासन के संदर्भ में: DSI जैविक विविधता पर सम्मेलन और पहुँच एवं लाभ साझाकरण पर नागोया प्रोटोकॉल के तहत एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बनकर उभरा है, क्योंकि यह भौतिक आनुवंशिक संसाधनों पर आधारित पारंपरिक पहुँच एवं लाभ साझाकरण (ABS) ढाँचे को चुनौती देता है।

जिन चुनौतियों का समाधान करना आवश्यक है

  • डिजिटल अनुक्रम सूचना (DSI) और तकनीकी व्यवधान की चुनौती: जैव प्रौद्योगिकी में प्रगति के साथ, आनुवंशिक सामग्री को डिजिटल अनुक्रम सूचना के रूप में तेजी से डिजिटाइज किया जा रहा है, जिससे कंपनियाँ जैविक संसाधनों तक भौतिक रूप से पहुँचे बिना आनुवंशिक डेटा का उपयोग कर सकती हैं।
    • इससे एक महत्त्वपूर्ण नियामकीय कमी उत्पन्न होती है, क्योंकि मौजूदा ABS ढाँचे डिजिटल उपयोग से होने वाले लाभों को पूरी तरह से शामिल करने में सक्षम नहीं हैं, जिससे संपूर्ण लाभ-साझाकरण व्यवस्था कमजोर हो सकती है।
  • वैध लाभ दावेदारों की पहचान में जटिलताएँ: कई मामलों में, जैविक संसाधन और पारंपरिक ज्ञान कई समुदायों और क्षेत्रों में साझा किए जाते हैं, जिससे सही लाभार्थियों की पहचान करना और समान वितरण सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाता है।
    • इससे लाभ-साझाकरण को लागू करने में प्रशासनिक और नैतिक चुनौतियाँ उत्पन्न होती हैं।
  • मूल्य शृंखलाओं और वैश्विक व्यावसायीकरण की निगरानी में कठिनाइयाँ: एक बार जब किसी आनुवंशिक संसाधन तक पहुँच प्राप्त हो जाती है और बहु-स्तरीय अंतरराष्ट्रीय मूल्य शृंखलाओं के माध्यम से उसका रूपांतरण हो जाता है, तो अंतिम उत्पाद का पता लगाना और रॉयल्टी भुगतान सुनिश्चित करना अत्यंत जटिल हो जाता है।
    • यह मजबूत वैश्विक सहयोग और निगरानी तंत्र की आवश्यकता को उजागर करता है।

ABS शासन की दिशा में भारत की पूर्व पहलें

  • जैव विविधता अधिनियम, 2002: भारत जैव विविधता प्रबंधन के लिए व्यापक घरेलू कानून बनाने वाले पहले देशों में से एक था, जिसने विनियमन और लाभ-साझाकरण के लिए त्रिस्तरीय संस्थागत संरचना स्थापित की।
  • पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय (TKDL): पारंपरिक ज्ञान डिजिटल पुस्तकालय ने आयुर्वेद, यूनानी और सिद्ध ज्ञान प्रणालियों का डिजिटलीकरण किया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय पेटेंट व्यवस्थाओं में पारंपरिक ज्ञान के दुरुपयोग को रोका जा सके।
    • इसने वैश्विक स्तर पर जैव चोरी से निपटने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • विनियमन और नवाचार में संतुलन के लिए हालिया विधायी सुधार: जैविक विविधता (संशोधन) अधिनियम, 2023 का उद्देश्य अनुपालन आवश्यकताओं को सरल बनाना है, विशेष रूप से भारतीय शोधकर्ताओं और आयुष उद्योगों के लिए, साथ ही दुरुपयोग के विरुद्ध सुरक्षा उपायों को बनाए रखना है।
    • यह संरक्षण और आर्थिक एवं अनुसंधान आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास दर्शाता है।

संबंधित वैश्विक पहल और कार्यवाहियाँ

  • कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढाँचा: कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता ढाँचा (2022) वर्ष 2030 तक वैश्विक भूमि और समुद्री क्षेत्रों के 30 प्रतिशत हिस्से की सुरक्षा जैसे महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करता है, जिसमें जैव विविधता संरक्षण के लिए एक प्रमुख वित्तीय तंत्र के रूप में कार्य करती है।
  • राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे जैव विविधता समझौता (BBNJ समझौता): BBNJ (राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे जैव विविधता) समझौता, खुले समुद्र में समुद्री आनुवंशिक संसाधनों तक जैव विविधता सिद्धांतों का विस्तार करता है, जो साझा वैश्विक पारिस्थितिकी संपत्तियों की बढ़ती मान्यता को दर्शाता है।
  • WHO के महामारी समझौते के माध्यम से उभरता वैश्विक स्वास्थ्य शासन: WHO महामारी समझौते के तहत वार्ता का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जैविक नमूने साझा करने वाले देशों को टीकों और प्रौद्योगिकियों तक समान पहुँच प्राप्त हो, जिससे जैव विविधता सिद्धांतों को वैश्विक स्वास्थ्य शासन में विस्तारित किया जा सके।

आगे की राह

  • डिजिटल अनुक्रम सूचना के लिए वैश्विक तंत्र का विकास: भारत को डिजिटल आनुवंशिक डेटा के लिए बहुपक्षीय लाभ-साझाकरण ढाँचे को आकार देने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि तकनीकी प्रगति, समानता के सिद्धांतों की अनदेखी न करे।
  • पारदर्शी और स्वचालित अनुपालन के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना: ब्लॉकचेन-आधारित स्मार्ट अनुबंधों और डिजिटल ट्रैकिंग प्रणालियों का एकीकरण पता लगाने की क्षमता को बढ़ा सकता है और स्वचालित रॉयल्टी भुगतान सुनिश्चित कर सकता है, जिससे ABS ढाँचा मजबूत होगा।
  • क्षमता और कानूनी साक्षरता के माध्यम से स्थानीय संस्थानों को सशक्त बनाना: संस्थागत निर्माण के अलावा, जैव विविधता प्रबंधन समितियों की कानूनी, तकनीकी और वार्ता क्षमता का निर्माण करना आवश्यक है, जिससे समुदाय कॉरपोरेट और अनुसंधान संस्थाओं के साथ प्रभावी ढंग से जुड़ सकें।
  • अंतरराष्ट्रीय कानूनी और निगरानी ढाँचे को मजबूत बनाना: जैविक मूल्य शृंखला की अपारदर्शिता जैसी सीमा पार चुनौतियों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग में वृद्धि, सामंजस्यपूर्ण नियम और मजबूत प्रवर्तन तंत्र आवश्यक हैं।

निष्कर्ष

भारत की पहली राष्ट्रीय रिपोर्ट अनुपालन से कहीं आगे बढ़कर, सशक्त कानूनी और संस्थागत ढाँचों के माध्यम से जैविक संसाधनों पर संप्रभु नियंत्रण स्थापित करती है। नागोया प्रोटोकॉल (पहुँच और लाभ साझाकरण) को क्रियान्वित करके, भारत संरक्षण, समानता और विकास को एकीकृत करने वाला एक अनुकरणीय मॉडल प्रस्तुत करता है, साथ ही पारंपरिक ज्ञान, उचित लाभ साझाकरण और तकनीकी अनुकूलन पर भी बल देता है।

Need help preparing for UPSC or State PSCs?

Connect with our experts to get free counselling & start preparing

Aiming for UPSC?

Download Our App

      
Quick Revise Now !
AVAILABLE FOR DOWNLOAD SOON
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध
Quick Revise Now !
UDAAN PRELIMS WALLAH
Comprehensive coverage with a concise format
Integration of PYQ within the booklet
Designed as per recent trends of Prelims questions
हिंदी में भी उपलब्ध

<div class="new-fform">







    </div>

    Subscribe our Newsletter
    Sign up now for our exclusive newsletter and be the first to know about our latest Initiatives, Quality Content, and much more.
    *Promise! We won't spam you.
    Yes! I want to Subscribe.