संदर्भ
हाल ही में खान मंत्रालय ने खनिज रियायत (द्वितीय संशोधन) नियम, 2026 को अधिसूचित किया, ताकि महत्त्वपूर्ण खनिज अन्वेषण को बढ़ावा दिया जा सके और खनन कार्यों को सुगम बनाया जा सके।
खनिज (परमाणु और हाइड्रोकार्बन ऊर्जा खनिजों के अतिरिक्त) रियायत (द्वितीय संशोधन) नियम, 2026 के बारे में:
- उद्देश्य: महत्त्वपूर्ण, रणनीतिक और गहरे-स्थित खनिजों के अन्वेषण, उत्पादन और कुशल उपयोग को बढ़ाना।
- कानूनी आधार और ढाँचा: खनिज एवं खनन (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (2025 में संशोधित) के अंतर्गत अधिसूचित।
- नोडल मंत्रालय: खान मंत्रालय, जो नीति निर्माण और क्षेत्रीय विनियमन के लिए उत्तरदायी है।
- कार्यान्वयन प्राधिकरण: राज्य सरकारें पट्टे और अनुमोदन प्रदान करती हैं, जबकि तकनीकी पर्यवेक्षण भारतीय खान ब्यूरो (IBM) द्वारा किया जाता है।
- भारतीय खान ब्यूरो (IBM): वर्ष 1948 में स्थापित, मुख्यालय नागपुर में, यह खान मंत्रालय के अंतर्गत एक शीर्ष नियामक निकाय है, जो सतत् और व्यवस्थित खनन प्रथाओं को सुनिश्चित करता है।
- यह वैज्ञानिक विकास, संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देता है (कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस और परमाणु/लघु खनिजों के अलावा)।
नियमों में प्रमुख संशोधन
- सन्निहित क्षेत्रों का समावेशन: खनन पट्टा (ML) धारक क्षेत्र को 10% तक और समग्र लाइसेंस (CL) धारक 30% तक बढ़ा सकते हैं, जिससे गहरे-स्थित खनिजों का कुशल दोहन संभव होता है।
- अतिरिक्त क्षेत्रों के लिए वित्तीय दायित्व: नीलामी आधारित पट्टों के लिए 10% नीलामी प्रीमियम का भुगतान करना होगा, जबकि गैर-नीलामी पट्टों में अतिरिक्त क्षेत्रों से निकाले गए खनिजों पर रॉयल्टी के समतुल्य भुगतान करना होगा।
- संबद्ध खनिजों का समावेशन: राज्य सरकारों को 30 दिनों के भीतर अतिरिक्त खनिजों को शामिल करने की अनुमति देनी होगी, और महत्त्वपूर्ण/गहरे-स्थित खनिजों (सातवीं अनुसूची) पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगेगा।
- लघु खनिज पट्टों में सुधार: भविष्य के पट्टों (रेत को छोड़कर) के लिए G3-स्तरीय अन्वेषण अनिवार्य होगा और प्रमुख खनिजों के अन्वेषण पर उन्हें प्रमुख खनिज ब्लॉक के रूप में नीलाम किया जाएगा।
- कैप्टिव खनन का उदारीकरण: प्रतिबंध हटाने से संयंत्र की आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद अधिशेष खनिजों की बिक्री की अनुमति होगी, जिससे विशेष रूप से ‘सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम’ (MSMEs) के लिए बाजार आपूर्ति बढ़ेगी।
नए प्रावधानों का संभावित महत्त्व
- क्रिटिकल मिनरल आपूर्ति को बढ़ावा: नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और रक्षा क्षेत्रों के लिए आवश्यक खनिजों के उत्पादन को प्रोत्साहित करता है, जिससे आयात निर्भरता कम होती है।
- व्यवसाय सुगमता: समयबद्ध अनुमोदन और सरल प्रक्रियाएँ निवेश वातावरण और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बेहतर बनाती हैं।
- संसाधनों का इष्टतम उपयोग: सन्निहित क्षेत्रों का समावेशन आर्थिक रूप से व्यवहार्य और वैज्ञानिक खनन सुनिश्चित करता है, जिससे अपव्यय कम होता है।
- राज्यों के लिए राजस्व में वृद्धि: अतिरिक्त प्रीमियम/रॉयल्टी भुगतान और अधिक उत्पादन से राज्यों की राजस्व क्षमता बढ़ती है।
ये सुधार आत्मनिर्भर भारत के अनुरूप हैं, जो भारत की खनिज सुरक्षा, औद्योगिक विकास और सतत् संसाधन प्रबंधन को सुदृढ़ करते हैं।