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शिवालिक पर्वतपदीय प्रदेश में मीठे जल की मछलियों के जीवाश्म

7 Apr 2026

संदर्भ 

वैज्ञानिकों ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के मोहंड क्षेत्र (ऊपरी शिवालिक) में मीठे जल की मछलियों के जीवाश्म (ओटोलिथ्स) की खोज की है, जो भारत का प्रथम गौरामी (Gourami) जीवाश्म और विश्व स्तर पर केवल दूसरा जीवाश्म है।

संबंधित तथ्य

  • अनुसंधान नेतृत्व: इस अध्ययन का नेतृत्व निंगथौजाम प्रेमजीत सिंह ने वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी से किया।
  • यह अध्ययन, जो स्प्रिंगर नेचर में प्रकाशित हुआ, निम्नलिखित को दर्ज करता है:
    •  भारत में गौरामी (परिवार -ओस्फ्रोनेमिडे) का पहला जीवाश्म प्रमाण।
    •  वैश्विक स्तर पर ऐसा केवल दूसरा प्रमाण है। 

गौरामी जीवाश्म के बारे में

  • वर्गीकरण: ये जीवाश्म ओस्फ्रोनेमिडे परिवार (गौरामी) से संबंधित हैं, जो मीठे जल की मछलियों का एक समूह है, जो अपने लैबिरिन्थ अंग के लिए जाना जाता है।
  • भारत में पहला रिकॉर्ड: यह भारत में गौरामी का प्रथम जीवाश्म प्रमाण है, जो देश के पैलियोन्टोलॉजिकल रिकॉर्ड में एक महत्त्वपूर्ण वृद्धि है।
  • दुर्लभ वैश्विक उपस्थिति: यह वैश्विक स्तर पर केवल दूसरा ज्ञात जीवाश्म रिकॉर्ड है, जो इसके जीवाश्म अभिलेख में दुर्लभता को दर्शाता है।
  • आवास संकेत: गौरामी सामान्यतः शांत, स्थिर मीठे जल के जलाशयों में निवास करती हैं, जो प्लायोसीन काल के दौरान इस क्षेत्र में स्थिर जलीय पारिस्थितिकी तंत्र की उपस्थिति का संकेत देता है।

महत्त्वपूर्ण तथ्य

  • आयु सुनिश्चितता का महत्त्व: जबकि समान जीवाश्म सुमात्रा से प्राप्त हुए हैं, अस्पष्ट स्तरीकरण (स्ट्रेटीग्राफी) के कारण उनकी सटीक आयु का अनुमान अनिश्चित बना हुआ है; इसके विपरीत, मोहंड के जीवाश्मों की आयु लगभग 4.8 मिलियन वर्ष पूर्व निर्धारित की गई है।
  • प्रमाणिक महत्त्व : प्राप्त जीवाश्म प्रमाण यह संकेत देते हैं कि प्लायोसीन काल के दौरान यह क्षेत्र शांत, स्थिर मीठे जल के जलाशय से युक्त था, जो घनी वनस्पतियों से युक्त था। यह निष्कर्ष ओस्फ्रोनेमिडे परिवार की उपस्थिति से प्राप्त हुआ है।
    • ओस्फ्रोनेमिडे परिवार: यह एक ऐसा परिवार है, जिसमें जीवित गौरामी शामिल हैं, जिनसे संबंधित स्नेकहेड (चन्ना) जैसे घात लगाकर शिकार करने वाले शिकारी भी पाए जाते हैं।
  • प्लायोसीन (शिवालिक) से मीठे जल की मछलियों के ओटोलिथ्स का प्रथम प्रमाण: इस अध्ययन में सहारनपुर स्थित शिवालिक समूह के प्लायोसीन निक्षेपों से मीठे जल की मछलियों के ओटोलिथ्स (सुनने और संतुलन के लिए प्रयुक्त ‘ईयर स्टोन्स’) की खोज की की पुष्टि की गई है, जो इस क्षेत्र में इस काल का ऐसा प्राप्त प्रथम प्रमाण है।
  • गौरामी जीवाश्मों की खोज: इन जीवाश्मों में ओस्फ्रोनेमिडे (गौरामी परिवार) के सदस्य शामिल हैं, जो भारत में गौरामी का प्राप्त पहला जीवाश्म प्रमाण और वैश्विक स्तर पर केवल दूसरा है, जबकि सुमात्रा से प्राप्त पूर्व खोजों में सटीक भू-वैज्ञानिक तिथि निर्धारण नहीं किया जा सका था।
  • संबद्ध मछली प्रजातियाँ: जीवाश्म समूह गौरामी, स्नेकहेड (चन्ना वंश) और गोबीज की उपस्थिति को दर्शाता है, जो प्लायोसीन युग के दौरान एक विविध और सुव्यवस्थित मीठे जल की मछली समुदाय की उपथिति का संकेत प्रदान करता है।

शिवालिक समूह के बारे में

  • भू-वैज्ञानिक आयु: शिवालिक समूह की आयु लगभग 18.3 मिलियन से 0.22 मिलियन वर्ष पूर्व (मायोसीन से प्लाइस्टोसीन) तक है।
  • निक्षेपों की प्रकृति : यह मुख्यतः मीठे जल के अवसादी निक्षेपों से निर्मित है, जो पर्यावरणीय रूप से नदीय और बाढ़ के मैदान (फ्लडप्लेन) के निर्माण को दर्शाते हैं।
  • भौगोलिक विस्तार : यह संरचना पश्चिम में पोटवार पठार (पाकिस्तान) से लेकर पूर्व में असम (भारत) तक हिमालय की तलहटी के साथ विस्तृत है।
  • टेक्टॉनिक महत्त्व : यह हिमालयी उत्थान, अपरदन और फोरलैंड बेसिन के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण साक्ष्य प्रदान करता है।
  • जीवाश्म समृद्धि : यह क्षेत्र कशेरुकी जीवाश्मों की प्रचुरता के लिए वैश्विक स्तर पर प्रसिद्ध है, जिनमें शामिल हैं:
    •  प्राइमेट्स (Primates)
    • कृंतक (Rodents)
    •  बड़े स्तनधारी (जैसे हाथी, बोविड्स, दरियाई घोड़ा)
  • स्थलीय जीवाश्मों का प्रभुत्व: जीवाश्म खोज मुख्यतः स्थलीय स्तनधारियों से संबंधित रही हैं, जबकि जलीय प्रमाण सीमित रहे हैं।

खोज का महत्त्व

  • जीवाश्म अंतराल की पूर्ति: यह खोज शिवालिक समूह के जीवाश्म प्रमाण में एक महत्त्वपूर्ण अंतर को दर्शाता है, जो पहले मुख्यतः स्थलीय स्तनधारी जीवाश्मों से युक्त था तथा वर्तमान समय में यह क्षेत्र में मीठे जल की मछली जैव विविधता का पहला स्पष्ट प्रमाण प्रदान करता है।
  • जैव-भौगोलिक अंतर्दृष्टि: यह निष्कर्ष एनावनटोडी (लैबिरिन्थ मछलियाँ जैसे गौरामी) के विकास और प्रसार को समझने में सहायक हैं तथा दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया (सुमात्रा सहित) के बीच जैव-भौगोलिक संबंध स्थापित करते हैं।
  • जलवायु और पर्यावरणीय संकेत: जीवाश्म प्रमाण दर्शाते हैं कि प्लायोसीन युग के दौरान इस क्षेत्र में आर्द्र जलवायु और स्थिर मीठे जल के पारिस्थितिकी तंत्र मौजूद थे, जो विविध जलीय जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण थे।
  • दुर्लभ जीवाश्म प्रकार का महत्त्व: ओटोलिथ जीवाश्मों की खोज, जो भारतीय उपमहाद्वीप में अत्यंत दुर्लभ हैं, प्रजाति पहचान और पैलियोपर्यावरणीय पुनर्निर्माण की सटीकता और विश्वसनीयता को बढ़ाती है।
  • गौरामी परिवार के इतिहास का विश्लेषण: यद्यपि केवल सीमित संख्या में ओटोलिथ्स प्राप्त हुए हैं, यह अध्ययन अतीत में मीठे जल की मछलियों के वितरण तथा विशेष रूप से गौरामी परिवार के विकासात्मक इतिहास को समझने में महत्त्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।

ओटोलिथ्स के बारे में

  • ओटोलिथ्स छोटे कैल्शियम कार्बोनेट (CaCO₃) संरचनाएँ होती हैं, जो मछलियों के आंतरिक कान में पाई जाती हैं।
  • कार्य: ये मछलियों में श्रवण, संतुलन और स्थानिक अभिविन्यास में सहायता करती हैं।
  • संरचना (Structure): ये सामान्यतः अरागोनाइट (कैल्शियम कार्बोनेट का क्रिस्टलीय रूप) और कार्बनिक पदार्थ से बनी होती हैं।
  • प्रकार: मछलियों में तीन मुख्य प्रकार होते हैं:
    • सैजिटा (Sagitta) (सबसे बड़ा और सर्वाधिक अध्ययन किया गया)
    •  लैपिलस (Lapillus)
    • एस्टेरिस्कस (Asteriscus)
  • वैज्ञानिक महत्त्व
    • विशिष्ट आकार के कारण प्रजाति पहचान में उपयोगी।
    • मछलियों की आयु और वृद्धि के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं।
    • प्राचीन जलीय पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्निर्माण में सहायक।
  • जीवाश्म महत्त्व
    • अत्यधिक सुदृढ़, इसलिए अवसादों में अच्छी तरह संरक्षित रहते हैं।
    • विशेष रूप से तब पैलियोन्टोलॉजिकल अध्ययन में महत्त्वपूर्ण, जब पूर्ण मछली जीवाश्म अनुपस्थित हों।
  • भारत में दुर्लभ
    • भारतीय उपमहाद्वीप में ओटोलिथ जीवाश्म दुर्लभ हैं, जिससे शिवालिक समूह में हाल की खोजें विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण बनती हैं।

शिवालिक पर्वतपदीय प्रदेश में मीठे जल की मछलियों के जीवाश्म

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